#Corona: कोलकाता के बाज़ार में चिकन और अंडों की बिक्री धड़ाम, करोड़ों का नुक़सान

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- Author, प्रभाकर मणि तिवारी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए, कोलकाता से
कोरोना वायरस को लेकर फैली अफ़वाह की वजह से कोलकाता में चिकन की बिक्री घटकर आधे से भी कम रह गई है.
पहले यहां रोज़ाना औसतन 8.6 लाख किलोग्राम चिकन बिकता था लेकिन अब यह घटकर 3.5 लाख किलो रह गया है.
पश्चिम बंगाल पोल्ट्री फ़ेडरेशन के मुताबिक़ चिकन की क़ीमतों में भी 30-40 फ़ीसदी गिरावट आई है और जनवरी के मुक़ाबले फ़रवरी में बिक्री घटकर आधी रह गई है.
कोलकाता और चीन के बीच व्यापारिक रिश्ते काफ़ी मज़बूत रहे हैं लेकिन चीन से विभिन्न चीज़ों का आयात बंद हो जाने की वजह से यहां चीनी सामान बेचने वाले खुदरा दुकानदार परेशान हो रहे हैं.
ऐसी कई दुकानों में स्टॉक लगभग ख़त्म हो गया है. आयात कब शुरू होगा, यह भी ठीक नहीं है.

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आधी रह गई है चिकन की मांग
पश्चिम बंगाल पोल्ट्री फ़ेडरेशन के महासचिव मदन मोहन माइती ने बीबीसी से बताया, "कोरोना के आतंक की वजह से चिकन की बिक्री में जहां 40 फ़ीसदी गिरावट आई है वहीं इसकी क़ीमतें भी 40 से 50 फ़ीसदी तक घट गई हैं. दो महीने पहले जनवरी में 150 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से बिकने वाले चिकन की क़ीमत अब घट कर 100 रुपये प्रति किलोग्राम से भी नीचे आ गई है."
माइती बताते हैं कि सोशल मीडिया पर इस वायरस के बारे में रोज़ाना फैलने वाली नई-नई अफ़वाहों की वजह से पोल्ट्री उद्योग की कमर टूट गई है. इसे अब तक लगभग 350 करोड़ का नुक़सान हो चुका है.
कोरोना के आतंक का असर अंडों की बिक्री पर भी पड़ा है. बंगाल के आम लोगों में मछली के साथ ही अंडे रोज़मर्रा के खाने में शामिल हैं.
शहर के लेक मार्केट इलाक़े में एक मुर्गा व्यापारी सुधीर बताते हैं कि बिक्री लगातार कम हो रही है और मांग में गिरावट की वजह से क़ीमतें भी घट रही हैं.

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दुकानों से ख़रीदार ग़ायब
मानिकतला बाज़ार में एक मुर्गी विक्रेता सत्यजित दोलोई ने बताया, "फ़रवरी के पहले हफ़्ते तक मैं रोज़ाना औसतन 400-500 किलोग्राम मांस बेचता था लेकिन अब मुश्किल से 30-35 किलोग्राम तक ही बिक्री होती है."
दोलोई कहते हैं कि पहले उनकी दुकान पर लंबी लाइन लगती थी लेकिन अब तो ख़रीदार ही नज़र नहीं आते.
उन्होंने बताया, "चिकन से अब तक कोरोना वायरस फ़ैलने का कोई मामला सामने नहीं आया है लेकिन लोग आतंक के चलते दुकानों का रुख़ नहीं कर रहे हैं."
आम लोगों में कोरोना का आंतक कम होने की बजाय बढ़ता ही जा रहा है. इसकी एक वजह यह भी है कि चीन में पढ़ने और नौकरी या कारोबार करने वाले कई लोग हाल में वहां से लौटे हैं और उनको अलग-थलग रखा गया है.
एक सेवानिवृत्त सरकारी अधिकारी सुनील मजुमदार कहते हैं, "जान है तो जहान है. कुछ दिन मुर्गा या अंडा नहीं भी खाएंगे तो कुछ नही बिगड़ेगा. इसकी बजाय मछली और सब्ज़ी का विकल्प तो है ही."

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चीनी सामानों के कारोबारियों पर भी मार
सिर्फ़ मुर्गी बिक्रेता ही नहीं बल्कि कोलकाता में चीनी सामान बेचने वाले व्यापारी भी कोरोना की मार से कराह रहे हैं.
महानगर में फ़ैंसी मार्केट समेत कई बाज़ारों में ऐसी हज़ारों दुकानें हैं जहां चीन में बने सजावट के सामान, खिलौने, कपड़े और दूसरी चीज़ें बिकती हैं. लेकिन अब कोरोना की वजह से आयात बंद होने की वजह से जहां इन चीज़ों का स्टॉक घटा है और बिक्री भी प्रभावित हुई है.
एक अनुमान के मुताबिक़ अकेले कोलकाता में चीनी सामानों की बिक्री का आंकड़ा हर महीने 100 करोड़ से ज़्यादा का है.
चीनी खिलौने बेचने वाले रज़ा कहते हैं, "चीन में बनी चीज़ों की क़ीमतें बढ़ने की वजह से मुनाफ़ा तो पहले ही कम हो गया था. अब आयात कम होने की वजह से स्थानीय स्टॉकिस्ट ऊंची कीमतों पर सामान दे रहे हैं. नतीजतन हमारी बिक्री लगभग ठप हो गई है."
चीन में बने बल्ब और बिजली के दूसरे सामान बेचने वाले एसपी अग्रवाल बताते हैं, "आयात बंद हो जाने की वजह से दिल्ली और मुंबई के स्टॉकिस्ट्स ने मौजूदा स्टॉक की क़ीमतें बढ़ा दी हैं. नतीजतन बिक्री के साथ ही मुनाफ़ा भी बहुत घट गया है."

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'तो रोज़ी-रोटी के लाले पड़ जाएंगे...'
कोलकाता के चांदनी चौक इलाक़े में फुटपाथ पर दुकान लगाने वाले मुख्तार हुसैन ने कहा, "मैं अब स्थानीय स्टॉकिस्ट्स से सामान ख़रीद रहा हूं. लेकिन इसकी लागत ज़्यादा होने से मुनाफ़ा नहीं के बराबर है."
उनका कहना है कि कोरोना के आतंक की वजह से छोटे और मझौले व्यापारी पिस रहे हैं. बड़े व्यापारियों और स्टॉकिस्ट तो क़ीमतें बढ़ा कर नुक़सान की भरपाई कर रहे हैं.
रज़ा, अग्रवाल या मुख़्तार जैसे व्यापारियों को इस बात की चिंता खाए जा रही है कि एक बार स्थानीय स्टॉक ख़त्म हो गया तो उनकी दुकान कैसे चलेगी.
रज़ा कहते हैं, "पता नहीं ऐसी स्थिति कब तक रहेगी. अगर दो-तीन महीने तक हालात में सुधार नहीं हुआ तो रोजी-रोटी के लाले पड़ जाएंगे."
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