You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
दिल्ली पुलिस दंगों में राजनीतिक हस्तक्षेप का शिकार थी? : नज़रिया
- Author, विभूति नारायण राय
- पदनाम, पूर्व आईपीएस अधिकारी
तीन दिनों तक दंगों की आँच में झुलसने के बाद दिल्ली धीरे धीरे सामान्य हो रही है और उम्मीद है कि अगले कुछ ही दिनों मे ज़िंदगी पटरी पर आ जायेगी पर बहुत से ऐसे प्रश्न छोड़ जायेगी जिनके हल ढूंढना इसलिए भी आवश्यक है कि ये अनुभव दोहरायें न जायें.
इस बार शर्मनाक यह था कि दिल्ली का एक बड़ा हिस्सा उस समय सांप्रदायिक हिंसा की चपेट मे आया जब विश्व के सबसे शक्तिशाली राष्ट्राध्यक्ष ट्रम्प शहर में मौजूद थे.
उनकी यात्रा के लिए प्रधानमंत्री मोदी की सरकार ने व्यापक प्रबंध कर रखे थे और देश की राजधानी में दंगे उसकी आख़िरी ख़्वाहिश हो सकती थी.
माना जा सकता है दंगे अचानक हुए पर इसके लिए शहर पिछले कुछ दिनों से इसकी तैयारी कर रहा था और हिंसा के पक्ष में माहौल निर्मित करने में सरकार और सरकारी दल की बहुत बड़ी भूमिका थी.
दिल्ली में दंगों के बाद बड़े सवाल?
पहली प्राथमिकता शांति बहाली के बाद इस सवाल को राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनाने की ज़रूरत है कि क्या कारण है कि एक के बाद एक साम्प्रदायिक दंगों जैसी स्थिति में भारतीय पुलिस असफल हो जाती है?
कोई तो वजह होगी कि हर बार देश के अल्पसंख्यकों के मन में कसक रह जाती है कि दंगों को नियंत्रित करते समय पुलिस ने उनके जान-माल की हिफ़ाज़त के लिए वो सब नहीं किया जिसकी उससे अपेक्षा की जाती है या कई बार तो वो सब कर डाला जो भारतीय संविधान की मूल भावनाओं के ही ख़िलाफ़ था.
दिल्ली की हालिया घटनाओं को समझने के लिए पिछले कुछ महीनों ख़ासतौर से नागरिकता संशोधन क़ानून पारित होने के बाद यहाँ घटित होने वाली कुछ घटनाओं को समझना होगा.
एक जैसी परिस्थिति में कुछ ही किलोमीटर दूर स्थित दो विश्वविद्यालयों में पुलिस ने अलग-अलग कार्यवाहियों द्वारा स्पष्ट कर दिया कि वो शाह-ए-वक़्त को ख़ुश करने के लिये किसी भी हद तक जा सकती है.
एक तरफ़ नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ आंदोलनरत जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के छात्रों के ख़िलाफ़ कैंपस के अंदर घुसकर दिल्ली पुलिस ने कार्रवाई की.
वहीं, फ़ीस वृद्धि को लेकर आंदोलित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार पर पुलिस 'असहाय' खड़ी दिखी. परिसर के भीतर नकबपोशों द्वारा की जाने वाली गुंडागर्दी को रोकने हेतु अंदर जाने के लिये वाइस चांसलर या रजिस्ट्रार की अनुमति की प्रतीक्षा करती दिल्ली पुलिस के विजुअल्स दम साधे पूरे देश ने 5 दिसंबर की देर शाम देखे.
दिल्ली पुलिस की दलीलें
यह क्षण शायद भारतीय पुलिस के सबसे शर्मनाक क्षणों में से एक था जब देश के सबसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में से एक जेएनयू मे मुँह पर कपड़े लपेटे गुंडे महिला छात्रावासों में तोड़फोड़ कर रहे थे, अपने विरोधियों के हाथ-पैर तोड़ रहे थे तथा विश्वविद्यालय की सम्पत्ति को क्षति पहुँचा रहे थे, और तकनीक इन भयावह दृश्यों को पूरी दुनिया के लिए आँखो-देखा बना रही थी.
तब दिल्ली पुलिस के अधिकारी विश्वविद्यालय गेट पर खड़े होकर दलील दे रहे थे कि अंदर घुसकर हिंसा रोकने के लिये उन्हें विश्वविद्यालय अधिकारियों की अनुमति की प्रतीक्षा है.
कोई आश्चर्य नहीं कि यह अनुमति तब आयी जब गुंडे अपना काम ख़त्म कर कैंपस से जा चुके थे.
लगभग ऐसी ही स्थिति तब पैदा हुई जब 15 दिसंबर 2019 को दिल्ली-नोएडा व्यस्त मार्ग पर कुछ महिलायें और बच्चे सड़क रोक कर प्रदर्शन करने लगे. पहले तो लगा कि यह चंद दिनों की बात है और कुछ दिनों में या तो वे स्वयं ही हट जायेंगे या पुलिस उन्हें ज़बरदस्ती हटा देगी.
पर उन्हीं दिनों दिल्ली के चुनाव होने वाले थे और जल्द ही स्पष्ट हो गया कि भाजपा चुनावों में शाहीन बाग़ का इस्तेमाल साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के लिए कर रही है इसलिये दिल्ली पुलिस से उम्मीद नहीं की जानी चाहिये कि वह उन्हें हटाएगी.
प्रदर्शनकारियों ने कोई एक्ज़िट स्ट्रैटजी बनाई नहीं है और उन्हें पता नहीं कि एक बार बैठने के बाद उठा कैसे जाय? लिहाज़ा एक गतिरोध है और सड़क का इस्तेमाल करने वाले लाखों लोग रोज़ असुविधा के शिकार हो रहे हैं.
दोहरी रणनीति
इसके विपरीत दूसरे तरह की राजनीति तब दिखी जब शाहीन बाग़ का मॉडल जाफ़राबाद में दोहराने की कोशिश की गई. इसका कोई लाभ नहीं मिलने वाला था इसलिये भाजपा के नेता कपिल मिश्रा ने वहाँ आकर धमकी दी कि यदि जाफ़राबाद मेट्रो और सड़क रोककर बैठे लोग जल्द नहीं हटे तो वे अपने समर्थकों के साथ आकर उन्हें ज़बरन उठा देंगे.
यह शायद मुहावरे की भाषा मे ऊँट की पीठ पर आख़िरी आघात था. नागरिकता क़ानून और एनआरसी विरोधी माहौल मे सुलगता शहर साम्प्रदायिक हिंसा की आग में जल उठा.
दिल्ली के हालिया दंगों में दिल्ली पुलिस पूरी तरह से असफल सिद्ध हुई. इस असफलता से एक बार फिर पूरी शिद्दत से पुलिस में व्यापक सुधारों की ज़रूरत महसूस हुई है.
पुलिस तंत्र में भर्ती, प्रशिक्षण, संसाधन जैसे अनगिनत क्षेत्र हैं जो बड़े सुधारों की अपेक्षा करते हैं पर इस बार जिस तथ्य की तरफ़ सबसे ज़्यादा ध्यान आकर्षित हुआ है वो दिल्ली पुलिस के कामकाज में राजनैतिक हस्तक्षेप था.
ऐसा लगता था कि पिछले कुछ दिनों से दिल्ली पुलिस की कमान नॉर्थ ब्लॉक ने संभाल रखी थी, सारे महत्वपूर्ण निर्णय गृह मंत्री अमित शाह ख़ुद ले रहे थे. इसी राजनैतिक हस्तक्षेप के चलते शाहीन बाग़ में सड़क छेंक कर बैठे प्रदर्शनकारियों को पुलिस ने नहीं उठाया.
गृह मंत्री अमित शाह चुनावी रैलियों मे मतदाताओं से अपील करते रहे कि कमल के निशान वाले चुनाव चिन्ह पर बटन ऐसे दबायें जायँ कि करंट शाहीन बाग़ तक महसूस किया जाए.
इसी के तहत कुछ ही किलोमीटर के फ़ासले पर स्थित दो विश्वविद्यालयों में आंदोलनरत छात्रों से निपटने के लिये पुलिस ने दो तरह की रणनीति अपनायी.
इसके अलावा भी भाजपा के मंत्री और नेता भड़काऊ भाषण देते रहे और दिल्ली पुलिस ने उनके ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं की. राजनीतिक हस्तक्षेप से दिल्ली पुलिस का अपना नेतृत्व पूरी तरह से पंगु हो गया था और जब हिंसा शुरू हुई तो शुरुआती घंटों में उसे पता ही नहीं था कि उसे इस स्थिति से निपटने के लिए करना क्या है?
दिल्ली हिंसा थमने के बाद पुलिस में व्यापक सुधारों पर गंभीर विमर्श होने ही चाहिए अन्यथा इसी तरह की असफलता की गाथाएँ दोहराई जाती रहेंगी.
( आलेख में व्यक्त विचार निजी हैं.)
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)