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दिल्ली हिंसा: बच्चों के लिए दूध लेने गए इरफ़ान ख़ुद ही लाश बनकर आए
- Author, चिंकी सिन्हा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
दिल्ली में जाफ़राबाद इलाक़े की गली नंबर 37 में महिलाएं और पुरुष एक युवक की अंतिम यात्रा में शामिल होने के लिए जमा हुए हैं. युवक का शव कमरे में रखा है.
बच्चों के लिए दूध लेने घर से बाहर निकले मोहम्मद इरफ़ान की हत्या के तीन दिन बाद उनकी लाश जाफ़राबाद लाई गई. पुलिस ने परिवार से कहा था कि अगर इरफ़ान का शव करतार नगर अपने घर ले जाएंगे तो वहां हिंसा भड़क सकती है.
परिवार के लोग बताते हैं कि पहले उन्हें नहलाया जाएगा और फिर नमाज़ होगी और फिर शव को शाम पांच बजे दफनाया जाएगा.
एक महिला कहती है, ''उसका चेहरा देखो, ऐसा लगता है जैसे कुछ चमक रहा है.''
मौत के मातम में लोग ख़ामोश हो जाते हैं. एक शख़्स ने मुझे उनकी तस्वीर पीछे से लेने के लिए कहा.
वो कहते हैं, ''देखिए उन्होंने इसके साथ क्या किया है. उन्होंने इस पर तलवार से हमला किया है.''
वो सफ़ेद चादर में लिपटे हुए थे. उन्होंने मुझे बताया कि सफ़ेद कोई रंग नहीं है. यह रंगों की कमी है. ये वो रंग है जो आपकी सारी उम्मीदें दूर ले जाता है.
बहन की शादी के लिए लिया था लोन
जिस कमरे में शव रखा है वो स्टोररूम जैसा संकरा है. उसमें लोहे के दरवाज़े लगे हैं. ये शायद पहले लगाए गए होंगे. किनारे से पानी बह रहा है. उन्होंने इरफ़ान का शरीर अभी-अभी साफ किया है. धूप की खुशबू हर तरफ़ फैली है.
इस कमरे में एक ट्यूबलाइट है, रोती बिलखती महिलाएं और पुरुष हैं और एक शव जिसके सिर पर गहरे जख़्मों के निशान हैं. मैं बस इतना ही देखना बर्दाश्त कर पाई. रिपोर्टिंग आसान काम नहीं है. शोक मनाने को आप क्या कहेंगे? बयान, विचार, प्रतिक्रिया.
एक महिला कहती है, ''26 फ़रवरी की शाम वो अपने बच्चों के लिए दूध लेने गया था. वो कहते हैं हालात काबू में हैं. राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल यहां आए थे और उन्होंने कहा कि डरने की ज़रूरत नहीं है.''
हिंसा में मारे गए मोहम्मद इमरान महज़ 27 साल के थे. वो मजदूरी करते थे और स्कूल बैग बनाने के लिए कपड़े काटने का काम करते थे. छह महीने पहले उन्होंने अपनी छोटी बहन की शादी के लिए काफ़ी क़र्ज़ लिया था. वो अपनी पत्नी, दो बच्चों और बूढ़े माता-पिता के साथ रहते थे. वो उस्मानपुर इलाक़े में एक कमरे में किराए पर रहते थे.
पड़ोस में रहने वाले ज़ाकिर नबी मिराज बताते हैं, ''बुधवार शाम घर से करीब 300 मीटर की दूरी पर उनका शरीर मिला था. शरीर को बुरी तरह कुचला और काटा गया था. उनका सिर फटा हुआ था.''
इरफ़ान को पास में ही स्थित जग परवेश हॉस्पिटल ले जाया गया और फिर जीटीबी अस्पताल में भर्ती कराया गया जहां उसी दिन उनकी मौत हो गई.
नकाब पहनी एक महिला के साथ दो अन्य महिलाएं कमरे में घुसती हैं. वो लड़खड़ा रही हैं. ये इरफ़ान की पत्नी गुलिस्तां हैं. वो आख़िरी बार अपने पति को देख रही हैं, जो अब ख़ून से सनी हुई लाश बन चुका है.
उनके 37 वर्षीय चचेरे भाई गुलज़ार अहमद बताते हैं कि वो तीन दिन से शव मिलने का इंतज़ार कर रहे थे. शनिवार दोपहर एक बजे वो पुलिस से काफ़ी बहस करने के बाद शव लेकर चाची के घर आए. पुलिस का कहना था कि करतार नगर में इरफ़ान का शव जाने से हिंसा भड़क सकती है.
बाहर दंगा नियंत्रण वाहन खड़ा है. खाकी वर्दी में पुलिस और अर्द्ध सैनिक बल के जवान दंगा रोकने में इस्तेमाल होने वाले हथियारों से लैस होकर हर तरफ़ खड़े नज़र आ रहे हैं. मीडिया की रिपोर्ट्स के मुताबिक हालात अब सामान्य हो चुके हैं लेकिन जिस तरह पुलिस और सुरक्षाबलों की तैनाती है ,उससे लगता है कि ये न्यू नॉर्मल है.
शाम पाँच बजे तीन महिलाएं गली नंबर 37 के बाहर खड़ी नज़र आती हैं. उनमें से एक रो रही है.
वो कहती हैं, ''वे लोग उसे दूर ले गए. आपको पता है हमने इस तरह की हिंसा कभी नहीं देखी. यहां हम दिवाली भी ईद की तरह मनाते थे. वो बाहर से आए थे. उन्होंने कई से लोगों को मार डाला. ''
वेलकम क़ब्रिस्तान में शव को दफ़ना दिया गया. कुछ ही मिनटों में वहां एक नई क़ब्र तैयार हो चुकी थी. ताजा क़ब्र रेगिस्तान की तरह दिखती है. उस पर कुछ नहीं उगता. न ही उसके आस-पास. कुछ देर के लिए भी नहीं. यह रेगिस्तान ही रहेगा, ज़मीन के एक बंज़र टुकड़े की तरह, जब तक यहां खरपतवार नहीं उग आते.
एक आदमी ने कहा, ''क़ब्रिस्तान में महिलाएं नहीं आतीं.''
इन सब के बीच इरफ़ान की मां क़ुरैशा के चेहरे पर ख़ालीपन साफ़ दिखता है. इरफ़ान की मां एक छोटे से हॉल में दूसरी महिलाओं से घिरी बैठी हैं. इरफ़ान के दोनों बच्चे दरवाज़े के पास खड़े हैं. बड़ा बच्चा मोबाइल में कुछ खेल रहा है. दोनों की उम्र पाँच और तीन साल है. उन्हें मौत का अंदाज़ा नहीं है. उन्हें इस तरह की मौत का बिल्कुल अंदाज़ा नहीं है.
वो कहती हैं, ''हम दंगा नहीं चाहते, हम इंसाफ़ चाहते हैं.''
शुक्रवार को उस्मानपुर पुलिस स्टेशन में परिवार ने शिकायत दर्ज करवाई. लेकिन उन्हें किसी तरह की उम्मीद नहीं है.
क़ुरैशा के पाँच बेटे और दो बेटियां हैं. लेकिन आवाज़ें दब गईं. अब यहां सिसकियां हैं और रोना.
क़ुरैशा कहती हैं, ''उन्होंने उसका सिर कुचल दिया. उसकी क्या ग़लती थी.''
बहन सलमा लगातार रोए जा रही हैं. उनके बगल में इरफ़ान की पत्नी बैठी हैं. वो कहीं खोई हुई हैं. ऐसा लगता है उनकी आंखें पत्थर हो चुकी हैं.
एक शख़्स कमरे में आता है और एक महिला से वक़्त रहते घर जाने को कहता है, इससे पहले कि अंधेरा हो जाए.
वो कहते हैं, ''हालात ठीक नहीं हैं. अब जाओ क्योंकि हम नहीं जानते क्या होने वाला है.''
महिलाएं बैठी रहती हैं और मौत के दुख में खोई हैं.
वो बार-बार उस रात के ख़ौफ़ को याद करती हैं. शाम के साढ़े सात बज रहे थे जब वो दूध लेने बाहर गए थे.
भीड़ ने उन पर हमला कर दिया. परिवार ने बाहर शोर सुना और जब तक कुछ कर पाते बीच सड़क पर इरफ़ान औंधे मुंह पड़े हुए थे. भीड़ वहां से भाग चुकी थी.
वो उस शाम के वाक़ये को बार-बार दोहराते हैं. वो कहते हैं, ''सच लिखना. लिखना कि एक बेकसूर को मार डाला गया. इरफ़ान के पिता दिल के मरीज़ हैं.''
इरफ़ान अपने परिवार में रोज़ी-रोटी कमाने वाले इकलौते शख़्स थे.
क़ुरैशा कहती हैं, ''अब हम क्या करेंगे.''
बाहर अंधेरा छा रहा है. सूरज ढल चुका है. एक शख़्स मुझे कार तक छोड़ने आते हैं.
वो कहते हैं, ''वापस जाइए. ये वक़्त सड़कों पर अकेले घूमने का नहीं है. पड़ोस के इन इलाक़ों में हालात बेहद ख़राब हैं.''
एक महिला कंधे पर हाथ रखती है. वो आने के लिए शुक्रिया कहती है. उनकी आंखें नम हैं.
वो भर आती हैं. वो बस यही कह पाईं.
वो डबडबा गईं. उन्हें बस यही कहना था. मासूमों का ख़ून बहाया गया है और भगवान आज रात रो रहा है.
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