दिल्ली में केजरीवाल की जीत का बिहार और बंगाल पर होगा असर?

ममता बनर्जी , नीतीश कुमार

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    • Author, मणिकांत ठाकुर, पटना से
    • पदनाम, प्रभाकर मणि तिवारी, कोलकाता से
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लगातार तीसरी बार आप आदमी पार्टी की जीत के बाद दिल्ली विधानसभा चुनाव संपन्न हुए. चुनावों में आम आदमी पार्टी ने 70 में से 62 सीटों पर जीत हासिल की जबकि बीजपी का खाते में 8 सीटें आई.

इसके बाद अब बिहार में इसी साल के आख़िरी महीनों में और पश्चिम बंगाल में अगले साल के मध्य में विधान सभा चुनाव होने हैं. दोनों ही प्रदेशों में स्थानीय पार्टियों का बड़ा मुक़ाबला बीजेपी से बोना तय है.

जहां बिहार में राष्ट्रीय जनता दल और बीजेपी के साथ गठबंधन में रही जनता दल यूनाईटेड के बीच कड़ा संघर्ष देखा जा सकता है वहीं पश्चिम बंगाल में मैदान में तृणमूल कांग्रेस और बीजेपी मुख्य प्रतिद्विंदी होंगे.

माना जा रहा है कि दिल्ली में केजरीवाल की जीत का कुछ असर इन दोनों प्रदेशों के चुनावों पर भी होगा.

पढ़िए वरिष्ठ पत्रकार मणिकांत ठाकुर का नज़रिया

दिल्ली के चुनावी नतीजे ने आगामी बिहार विधानसभा चुनाव में राज्य के सत्ताधारी गठबंधन की चिंता बढ़ा देने संबंधी कई इशारे दिए हैं.

सबसे बड़ा संकेत यह, कि अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में पाँच साल से चल रही दिल्ली सरकार ने शिक्षा,स्वास्थ्य और बिजली से जुड़े मुद्दों पर जैसा काम कर के दिखा दिया, वैसा नीतीश सरकार चौदह वर्षों में भी नहीं कर पायी.

बिहार में प्राथमिक शिक्षा से ले कर उच्च शिक्षा तक की दुर्दशा किसी से छिपी हुई नहीं है. सरकारी स्कूल कंगाल और प्राइवेट स्कूल मालामाल नज़र आते हैं. निजी स्कूल मालिकों को मनमानी फ़ीस वसूली की छूट-सी मिली हुई है.

यहाँ शिक्षा माफ़िया का इस क़दर बोलबाला है, कि परीक्षाओं में नक़ल और जाली सर्टिफिकेट के बिहारी क़िस्से सुर्ख़ियों में आते रहे हैं.

सरकारी अस्पतालों का तो और भी बुरा हाल है. जन-सुविधाओं के मामले में राज्य के सारे शहरों या क़स्बों की स्थिति नारकीय बनी हुई है.

नीतीश राज में भ्रष्टाचार का ग्राफ़ दिन-ब-दिन बढ़ते जाना, अब कोई आरोप नहीं, सचाई बन कर आम चर्चा में व्याप्त है.

ऐसे में, जब दिल्ली के मुहल्ला क्लिनिक या बड़े निजी स्कूलों से बेहतर बनते जा रहे सरकारी स्कूलों पर आम मतदाता के मोहित होने जैसी ख़बर बिहार पहुँच रही हो, तो यहाँ भी इसका असर होना स्वाभाविक है.

नीतीश कुमार, अमित शाह

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आम जनता की ज़रूरतों से जुड़े बुनियादी मुद्दों पर भावनात्मक मुद्दों को हावी नहीं होने देने वाले इस चुनावी परिणाम से नीतीश सरकार के कान ज़रूर खड़े हुए होंगे.

तो क्या मुफ़्त बिजली-पानी, महिलाओं के लिए फ़्री परिवहन-सेवा और ऐसी ही मुफ़्त या रियायती सेवाओं जैसे प्रलोभनों का सरकारी ऐलान बिहार में भी चुनाव से पहले हो सकता है?

आम आदमी पार्टी (आप) की दोबारा बड़ी जीत ने बिहार के संदर्भ में दूसरा बड़ा संकेत यह दिया है कि भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी), जनता दल युनाइटेड (जेडीयू) और लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी) - तीनों का दिल्ली चुनाव में जो मेल हुआ, वह बुरी तरह फेल कर गया.

जेडीयू के नीतीश कुमार और एलजेपी के रामविलास पासवान इसबार दिल्ली में न सिर्फ़ कुछ सीटों पर चुनाव लड़ने, बल्कि अपने दलबल के साथ बीजेपी को मज़बूती देने के लिए प्रचार में भी उतरे थे.

नागरिकता क़ानून विवाद पर भी नीतीश कुमार ने अपना पुराना रुख़ बदलते हुए बीजेपी का साथ दिया. यहाँ तक कि अपने निकट सहयोगी प्रशांत किशोर और पवन वर्मा को भी इसी सवाल पर दरकिनार कर दिया.

शाहीनबाग़ से उठे बवाल और राष्ट्रीयता को मुद्दा बना कर दिल्ली में जीत के लिए बीजेपी ने जी-जान तो लगाया, पर नरेंद्र मोदी और अमित शाह जैसे चतुर चुनावी दिग्गजों की भी चतुराई नहीं चली.

यही कारण है कि 'आप' की बड़ी जीत पर नीतीश कुमार अपनी मायूसी भरी पहली प्रतिक्रिया में सिर्फ़ इतना ही कह पाए कि "जनता ही मालिक."

इसलिए ज़ाहिर है कि पराजय की यह गूँज आठ-नौ महीने बाद बिहार में होने वाले चुनाव तक बीजेपी-जेडीयू का पीछा नहीं छोड़ेगी.

हालाँकि यह तर्क ज़रूर दिया जाएगा कि बिहार जैसे बड़े राज्य के चुनावी मुद्दे, सियासी हालात और सामाजिक अपेक्षाओं की तुलना दिल्ली जैसे छोटे/अपूर्ण राज्य से करना सही नहीं है.

इस तर्क में दम ज़रूर है, क्योंकि जातीय जनाधार की बुनियाद पर होने वाली सियासत जहाँ प्रबल हो, वहाँ बिजली, स्कूल , अस्पताल, सड़क, महंगाई और भ्रष्टाचार के मुद्दे मंद पड़ जाते हैं. जेपी आंदोलन जैसा जनउभार तो अपवाद ही है.

यह भी ग़ौरतलब है कि बिहार से दिल्ली जा बसे मतदाताओं की बड़ी तादाद ने आरजेडी, जेडीयू और एलजेपी के बजाय 'आप' के लिए मतदान करना ठीक समझा. आरजेडी के चारों प्रत्याशियों की ज़मानत ज़ब्त हो गयी. मतलब तेजस्वी, नीतीश, रामविलास समेत तमाम बिहारी नेता वहाँ बेअसर हो गए.

बिहार

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इमेज कैप्शन, बिहार में पटना में इसी साल फरवरी 4 को छात्रों ने परीक्षा के पेपर लीक होने को लेकर विरोध प्रदर्शन किया था.

लेकिन, जो दिल्ली में चुनावी नतीजा आया है, वह सत्ता में रह चुके बिहारी नेताओं को चिंता में डाल देने वाला जनादेश तो है ही. ऐसा इसलिए, क्योंकि दिल्ली के मतदाताओं ने मुख्यत: जिस काम के आधार पर वोट डाले, वैसा काम कर दिखाने की न तो यहाँ के सत्ताधारियों में आदत रही, या ज़रूरत समझी गयी.

वैसे, यह शुभ संकेत ही है कि भ्रष्टाचार विरोधी जन-अपेक्षाओं को दरकिनार कर देने वाले अरविंद केजरीवाल का कोई काम एक मायने में मतदाताओं का नज़रिया बदलने का ज़रिया तो बना !

दिल्ली के चुनावी परिणाम का प्रभाव कुछ हद तक बिहार के मौजूदा विपक्षी गठबंधन पर भी पड़ेगा.

राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी), कांग्रेस और कुछ छोटे दलों के 'महागठबंधन' में जो पिछले कुछ समय से बिखराव या अलगाव घर किये हुए था, उसमें फिर से एकजुटता की ललक पैदा हो सकती है.

ललक इसलिए, क्योंकि बीजेपी-जेडीयू के मनोबल पर 'आप' की जीत से पहुँची चोट के कारण बिहार में आरजेडी और उसके सहयोगी दलों के प्रति जन-रुझान बढ़ने का माहौल बन सकता है.

ख़ासकर नागरिकता संबंधी क़ानून (सीएए) और नेशनल रजिस्टर (एनआरसी) का प्रतिरोध कर रहा बिहारी मुस्लिम समाज भी दिल्ली के चुनावी नतीजे से बहुत उत्साहित है.

समझा जाता है कि आगामी बिहार विधानसभा चुनाव में बीजेपी-जेडीयू गठबंधन की पराजय सुनिश्चित करने के लिए दिल्ली की ही तरह मुस्लिम समाज मतविभाजन रोकने वाली रणनीति अपना सकता है.

अरविंद केजरीवाल

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दिल्ली विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की हार को रणनीति का हिस्सा मानने वाले यह भी मानते हैं कि बिहार में कांग्रेस के बजाय आरजेडी को इसलिए ताक़त दी जाएगी, क्योंकि उसके साथ एक बड़ा यादव-जनाधार जुड़ा रह सकता है.

लेकिन फिर वही बात, कि बिहार की सियासत को जातीय समीकरण से मुक्त रख पाना कठिन है.

यानी सवाल घूम फिर कर वहीं लौट आता है कि जन सरोकार से जुड़े बुनियादी मुद्दे क्या बिहार के अगले चुनाव में मतदाताओं की प्राथमिकता वाली सूची में शामिल होंगे?

पढ़िए वरिष्ठ पत्रकार प्रभाकर मणि तिवारी का नज़रिया

दिल्ली विधानसभा चुनावों के नतीजों की गूंज सुदूर पश्चिम बंगाल तक पहुंचना तय है. आने वाले समय में जो राज्य भाजपा के लिए साख और नाक का सवाल हैं उनमें बंगाल शीर्ष तीन में शुमार है.

यहां इस साल अप्रैल-मई में कोलकाता नगर निगम के अलावा सौ से ज्यादा स्थानीय निकायों के चुनाव होने हैं. उसके बाद अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं जिसे भाजपा नेतृत्व फाइनल मानता और कहता रहा है.

लेकिन दिल्ली विधानसभा के चुनावी नतीजों ने पश्चिम बंगाल की गद्दी पर काबिज होने का सपना देख रही भाजपा को करारा झटका दिया है.

इस नतीजों ने मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस अध्यक्ष ममता बनर्जी को भाजपा के ख़िलाफ़ एक ठोस मुद्दा दे दिया है. ममता कहती हैं, "अगले साल बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजे भाजपा के ताबूत में आखिरी कील साबित होंगे. हम यहां उसका अंतिम संस्कार कर देंगे."

ममता बनर्जी

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स्थानीय निकायों में ख़ासकर कोलकाता नगर निगम को मिनी विधानसभा चुनाव कहा जाता है. यह माना जाता है कि इस चुनाव में जीतने वाला ही साल भर बाद होने वाले विधानसभा चुनाव में जीत कर राज्य की सत्ता पर काबिज होता है.

भाजपा नेतृत्व ने बंगाल को अपनी नाक और साख का सवाल बनाते हुए यहां अपनी पूरी ताकत झोंक दी है. पार्टी खासकर राज्य के विभिन्न आदिवासी गुटों में अपनी पैठ मजबूत बनाने में जुटी है.

बीते लोकसभा चुनावों के नतीजों से साफ है कि इन आदिवासी गुटों के समर्थन ने ही उसकी सीटों की तादाद दो से 18 तक पहुंचाई थी.

प्रदेश भाजपा के एक वरिष्ठ नेता मानते हैं कि राष्ट्रीय मुद्दों पर दिल्ली का चुनाव लड़ने की रणनीति गलत साबित हो गई है. उनका कहना है कि पाकिस्तान, आतंकवाद, हिंदुत्व और देशभक्ति या देशद्रोह जैसे मुद्दे बंगाल में बेअसर ही साबित होंगे.

ऐसे में बंगाल के मामले में चुनावी रणनीति पर नए सिरे से विचार करना जरूरी है. वैसे, भाजपा तृणमूल कांग्रेस में भ्रष्टाचार, सिंडीकेट और बांग्लादेश से घुसपैठ जैसे मुद्दे पहले भी उठाती रही है. लेकिन ममता के ख़िलाफ़ उसके यह मुद्दे ज्यादा कारगर नहीं साबित हुए हैं.

दूसरी ओर, ममता ने जिस तरह नेशनल रजिस्टर आफ सिटीजन्स (एनआरसी) और नागरिकता संशोधन क़ानून (सीएए) के खिलाफ जबरदस्त मुहिम छेड़ी है उसका तृणमूल कांग्रेस को फ़ायदा मिलता नजर आ रहा है.

बीते साल के आखिर में विधानसभा की तीन सीटों के लिए हुए उपचुनाव के नतीजों से यह बात साफ है. इन सीटों में प्रदेश अध्यक्ष की वह खड़गपुर सदर सीट भी शामिल है जिसे वर्ष 2016 के चुनाव में उन्होंने जीता था. घोष के लोकसभा के लिए चुने जाने की वजह से खाली हुई वह सीट उपचुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने जीत ली थी.

दिलीप घोष

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यही नहीं, महज छह महीनों के भीतर हुए उपचुनाव के दौरान भाजपा को मिलने वाले वोटों में भी भारी गिरावट आई थी. लोकसभा चुनाव में जहां पार्टी को 57.23 फीसदी वोट मिले थे वहीं उपचुनाव में यह आंकड़ा गिर कर 33.9 फीसदी तक पहुंच गया.

भाजपा नेतृत्व एनआरसी और सीएए के ख़िलाफ़ ममता की कड़ी मोर्चाबंदी की काट भी अब तक नहीं तलाश सका है.

यह बात दीगर है कि भाजपा का प्रदेश नेतृत्व अब भी दावा कर रहा है कि दिल्ली के नतीजों का बंगाल में कोई असर नहीं होगा. प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष कहते हैं, "दीदी चाहे कुछ भी कहें, आम लोग उनकी पार्टी की हकीकत समझ गए हैं. अब सत्ता से तृणमूल की विदाई का समय आ गया है."

दूसरी ओर, दिल्ली के नतीजों ने ममता को भाजपा के खिलाफ एक ठोस हथियार दे दिया है. नतीजे सामने आने के बाद बांकुड़ा में मंगलवार शाम को अपनी एक रैली में उन्होंने भगवा पार्टी की जमकर खिंचाई की.

ममता का कहना था, "भाजपा अब धीरे-धीरे राज्यविहीन पार्टी बनती जा रही है. अब बंगाल उसके ताबूत में आखिरी कील ठोकेगा. वर्ष 2021 के विधानसभा चुनावों में हम उसका अंतिम संस्कार कर देंगे."

तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ने कहा कि अब पैसों की ताकत भाजपा को नहीं बचा सकती. ममता ने सीएए का जिक्र करते हुए कहा कि देश में बेरोजगारी, अर्थव्यवस्था, विकास, उद्योग और मूल्यवृद्धि जैसे कई दूसरे अहम मुद्दे हैं.

उन्होंने भाजपा पर कथित गैर-सरकारी और धार्मिक संगठनों के जरिए झूठ फैलाने का भी आरोप लगाया है ताकि दो समुदायों को धर्म के आधार पर बांटा जा सके.

नागरिकता क़ानून के विरोध में रैली

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राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि ममता बनर्जी की एनआरसी और सीएए-विरोधी मुहिम की वजह से पहले से ही मुश्किल में पड़ी भाजपा की मुश्किलें दिल्ली के नतीजों ने बढ़ा दी हैं. अब पार्टी को अपनी रणनीति पर नए सिरे से विचार करना होगा.

राजनीतिक विश्लेषक प्रोफेसर समरेश गुहा कहते हैं, "भाजपा नेतृत्व भले कबूल नहीं करे, दिल्ली के नतीजों से उसे सदमा तो लगा ही है. पार्टी ने वहां अपनी पूरी ताकत और मशीनरी झोंक दी थी. उसे अब बंगाल की चुनावी रणनीति पर दोबारा विचार करना होगा. इसकी वजह यह है कि राज्य के वोटरों पर ममता की पकड़ अब भी मजबूत है."

समरेश का कहना है कि लोकसभा और विधानसभा चुनावो में काफी फर्क है. ममता वोटरों की नब्ज बेहतर पहचानती है. ऐसे में भाजपा की राह कुछ मुश्किल ज़रूर हो गई है.

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