अमित शाह से दो बार मिले बाबूलाल मरांडी, लेकिन क्यों?

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- Author, रवि प्रकाश
- पदनाम, रांची से, बीबीसी हिंदी के लिए
बाबूलाल मरांडी कहां हैं? क्या कर रहे हैं? क्या उन्होंने भारतीय जनता पार्टी में वापसी की तैयारी कर ली है?
क्या उनकी पार्टी झारखंड विकास मोर्चा का बीजेपी में विलय हो जाएगा? क्या झारखंड बीजेपी अब उनके नेतृत्व में काम करेगी?
झारखंड की सियासी सर्किल में तैर रहे ऐसे कई सवाल इन दिनों स्थानीय मीडिया की सुर्खियां बन रहे हैं.
इसके बावजूद न तो बीजेपी ने कोई आधिकारिक बात कही है और न झारखंड विकास मोर्चा के नेताओं ने. इस मसले पर दोनों पार्टियों में एक अजीब-सी चुप्पी है.
इस बीच बाबूलाल मरांडी ने बीबीसी से बातचीत की और बताया कि वो झारखंड से बाहर हैं और अपनी सियासी ज़िंदगी के अहम फ़ैसले से पहले कुछ ज़रूरी व्यक्तिगत काम निपटा रहे हैं.
उन्होंने कहा कि अगर उन्हें पार्टी का विलय करना हो, तो बीजेपी से ज़्यादा अनुकूल कोई दूसरी जगह नहीं है.

अमित शाह से मुलाक़ात
अगर पार्टी ने इस संबंधित फ़ैसला लिया, तो झारखंड विकास मोर्चा (प्रजातांत्रिक) का जल्दी ही (इसी महीने) बीजेपी में विलय हो जाएगा.
बाबूलाल मरांडी ने बीबीसी से कहा, "अमित शाह से मेरी पहली मुलाक़ात दिसंबर-2014 में हुई थी. उसके बाद हम सीधे साल 2019 में मिले. तब हमारे साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी थे. मौका था, पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के पार्थिव शरीर के अंतिम दर्शन का. मैं वाजपेयी जी के मंत्रिमंडल का सदस्य रह चुका था. उनसे मेरी आत्मीयता थी. उनके निधन की ख़बर विचलित करने वाली थी."
"मैं दिल्ली में उनके आवास पर गया. वहीं मेरी मुलाक़ात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और तब के बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह से हुई. उस दौरान हमारे बीच कुछ देर तक बातचीत हुई. अमित शाह जी से मेरी सिर्फ यही दो मुलाक़ातें हैं. बाकी के नेताओं से बात-मुलाक़ात होती रहती है. ऐसा सिर्फ बीजेपी में नहीं है. मेरे दोस्त सभी पार्टियों में हैं. राजनीतिक नेताओं का एक-दूसरे से मिलना कोई बड़ी घटना नहीं है."

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कब मिला पार्टी विलय का प्रस्ताव?
बाबूलाल मरांडी ने कहा, "बीजेपी के तत्कालीन अध्यक्ष अमित शाह से साल 2014 में फ़ोन पर बातचीत हुई थी. तब उन्होंने मुझे बीजेपी में वापसी का प्रस्ताव दिया."
"उन्होंने मेरी पार्टी जेवीएम (पी) का बीजेपी में संपूर्ण विलय का प्रस्ताव दिया, लेकिन मैंने तब उस प्रस्ताव को ठुकरा दिया था."
अब विलय पर चर्चा क्यों?
बकौल मरांडी, झारखंड विधानसभा के चुनाव में मुझे अपनी पार्टी के बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद थी लेकिन ऐसा नहीं हो सका.
उन्होंने कहा, "अब कार्यकर्ताओं के एक समूह में पार्टी के भविष्य को लेकर चर्चाएं होने लगी हैं. ऐसे में ज़रूरी है कि मैं उनकी बात सुनूं. एक आम राय बने. इसके बाद ही कोई भी फ़ैसला लिया जा सकेगा. मेरी व्यक्तिगत दृष्टि से बीजेपी हमारे लिए ज़्यादा मुफ़ीद जगह है क्योंकि मैं वहां काम कर चुका हूं."

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कब लेंगे फ़ैसला?
बाबूलाल मरांडी ने कहा, "जल्दी ही. बहुत संभव है यह फ़ैसला फ़रवरी में ही ले लिया जाए."
ये पूछे जाने पर कि आपने बीजेपी की रघुवर दास सरकार का लगातार विरोध किया है, अब अगर बीजेपी में गए, तो कार्यकर्ताओं को कैसे समझाएंगे.
बाबूलाल मरांडी ने कहा, "मैंने उनकी ग़लत नीतियों का विरोध किया था. रही बात कार्यकर्ताओं की, तो हर फ़ैसला उन्हीं कार्यकर्ताओं को करना है."
क्या बीजेपी में वापसी फ़ाइनल है?
वरिष्ठ पत्रकार और मरांडी के राजनीतिक सलाहकार सुनील तिवारी ने बीबीसी से कहा कि यह सबसे अच्छा विकल्प है. इसलिए इसकी संभावनाएं काफी अधिक हैं.
उन्होंने बीबीसी से कहा, "विधानसभा चुनाव के बाद झारखंड विकास मोर्चा (प्र) के टिकट पर जीते दोनों विधायकों ने बाबूलाल मरांडी से पहली ही मुलाक़ात में उन्हें कांग्रेस में पार्टी के विलय की सलाह दी. इनमें से एक विधायक हेमंत सोरेन की सरकार में शामिल भी होना चाहते थे."
"तब मरांडी जी ने उनसे कहा कि वे चाहें तो अपना निर्णय ले सकते हैं, लेकिन मैं (बाबूलाल मरांडी) कांग्रेस में जाकर राजनीति का ककहरा नहीं सीखना चाहता. ऐसे में मेरे लिए बीजेपी में जाना ज़्यादा मुनासिब होगा. ताज़ा सियासी चर्चाओं की मूल वजह यही है."

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पार्टी से निष्कासित हैं दोनों विधायक
उल्लेखनीय है कि मरांडी की पार्टी से जीतकर आए दोनों विधायकों को पार्टी ने अनुशासनहीनता और कथित पार्टी विरोधी गतिविधियों के कारण जेवीएम (पी) से निष्कासित कर दिया है.
बाबूलाल मरांडी ने राज्यपाल को पत्र भेजकर हेमंत सोरेन सरकार से अपना समर्थन भी वापस ले लिया है.
बीजेपी में क्या हलचल है?
झारखंड गठन के बाद ये पहला मौका है जब विधानसभा में बीजेपी विधायक दल का कोई नेता नहीं है.
पिछले विधानसभा चुनाव में 25 सीटें जीतने के बावजूद पार्टी ने अभी तक अपने नेता का चुनाव नहीं किया है.
इस कारण झारखंड विधानसभा में भी प्रतिपक्ष के नेता की सीट खाली है.
विधानसभा के विशेष सत्र के दौरान बीजेपी के विधायकों ने बगैर नेता के ही सदन की कार्यवाही में हिस्सा लिया.
इसी तरह पार्टी अपने प्रदेश अध्यक्ष का भी चुनाव नहीं कर सकी है. बतौर कार्यवाहक अध्यक्ष लक्ष्मण गिलुवा ही ये काम देख रहे हैं.
विधानसभा चुनाव में पार्टी की पराजय के बाद उन्होंने प्रदेश अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा दे दिया था. वे खुद भी चुनाव हार गए थे.
सियासी गलियारे में चर्चा है कि ये दोनों पद बाबूलाल मरांडी की पार्टी के बीजेपी में संभावित विलय के कारण होल्ड पर रखे गए हैं. हालांकि बीजेपी नेता इससे इनकार करते हैं.
झारखंड बीजेपी के प्रवक्ता दीनदयाल वर्णवाल ने बीबीसी से कहा कि बाबूलाल मरांडी को लेकर प्रदेश संगठन में कोई औपचारिक चर्चा नहीं हुई है. संभव है कि उनकी (मरांडी की) बातचीत शीर्ष नेताओं से हो रही हो, क्योंकि वे बड़े कद के नेता हैं और उन्हें बीजेपी में सबलोग जानते हैं. बची बात विधायक दल के नेता और प्रदेश अध्यक्ष के मनोनयन की, तो इसपर जल्दी ही फ़ैसला ले लिया जाएगा.

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मरांडी इतने महत्वपूर्ण क्यों हैं?
62 वर्षीय मरांडी का सियासी कद काफी ऊंचा है. वे राज्य के पहले मुख्यमंत्री बनाए गए थे. केंद्र में मंत्री रहे. लोकसभा का चुनाव पांच बार जीते.
2004 के चुनाव में वे झारखंड के इकलौते ऐसे बीजेपी प्रत्याशी थे, जिन्होंने लोकसभा चुनाव में जीत दर्ज की.
तब यशवंत सिन्हा और रीता वर्मा जैसे केंद्रीय मंत्री भी अपनी सीटें नहीं बचा सके थे. वे दो बार विधानसभा का चुनाव भी जीते हैं.
बीजेपी का झारखंड प्रमुख रहते हुए उन्होंने राज्य की कुल 14 में से 12 लोकसभा सीटें पहली बार बीजेपी के नाम करवा दी थीं.
हालांकि, अर्जुन मुंडा से मनमुटाव के बाद उन्होंने कुछ विधायकों के साथ बीजेपी छोड़ दी.
साल 2006 में उन्होंने झारखंड विकास मोर्चा नाम से पार्टी बनाई और अपने बूते विधायकों को जितवाते रहे. हालांकि, बीते कुछ सालों में वे खुद लगातार चुनाव हारते गए.
विधानसभा चुनाव में ताज़ा जीत के बाद उन्हें कई सालों के बाद किसी सदन में जाने का मौका मिला है.
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