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दिल्ली चुनाव: स्कूल तय करेंगे आप और बीजेपी का भविष्य?
- Author, सारिका सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
दिल्ली में चुनावी लड़ाई अपने चरम पर है. बीजेपी और आम आदमी पार्टी दोनों ने अपने तरकश से तीर निकाल लिए हैं.
आम आदमी पार्टी का दावा है कि इस बार चुनाव बिजली, पानी और शिक्षा जैसे मुद्दों पर लड़े जा रहे हैं. कभी असुविधाओं के लिए पहचाने जाने वाले सरकारी स्कूलों में सुधार के नाम पर वोट माँगे जा सकते हैं, कुछ साल पहले तक कोई सोच नहीं सकता था.
दूसरी ओर, बीजेपी इन दावों की पोल खोलने में लगी है. पर आख़िर इन पांच सालों में क्या शिक्षक बदल गए हैं, शिक्षा बदल गई है या फिर व्यवस्था बदली है?
हाल ही में दिल्ली के बीजेपी सांसदों ने कई स्कूलों में स्टिंग ऑपरेशन किया और दिल्ली सरकार के दावों को पलटने की कोशिश की.
लेकिन कैसे दिल्ली के चुनाव अब स्कूलों के दरवाज़े तक पहुंच गए हैं, ये जानने के लिए हम भी स्कूलों तक पहुंचे, वहां मिली 8वीं क्लास में पढ़ने वाली गुनगुन जिनके सपने आसमान से भी ऊंचे हैं और उन्हें लगता है कि उनका सरकारी स्कूल वो सीढ़ी है जिसके ज़रिए वो ऊंचा से ऊंचा मुक़ाम हासिल कर सकती हैं.
उन्हें लगता है कि उनका सरकारी स्कूल भी किसी प्राइवेट स्कूल से कम नहीं है. और ना ही उनके अंदर किसी और से कम काबिलियत है. उनका ये ज़रूर कहना है कि स्कूल की एक क्लास में कम ही बच्चे होते तो अच्छा होता.
एक क्लास में कई बच्चे
उनके स्कूल में एक ही क्लास में लगभग 60 बच्चे होते हैं. अब इतने बच्चे हों तो बेंच भी कम पड़ जाते हैं और सीट के लिए लड़ाई-झगड़े भी होते हैं.
फिर भी वो पूरी शिद्दत से पढ़ाई करती हैं और स्कूल से आकर अपने दो छोटे भाइयों को भी पढ़ाती हैं जो पड़ोस के प्राइवेट स्कूल में पढ़ते हैं.
उनकी मां का कहना है कि सरकारी स्कूल में बेटी की पढ़ाई में पैसे नहीं लगते इसलिए बेटों की फ़ीस भरने के लिए पैसे बच जाते हैं. हालांकि वो ये भी कहती हैं कि बेटे थोड़े बड़े हो जाएं तो उनका भी दाख़िला सरकारी स्कूल में करा देंगी.
गुनगुन के पिता को बेटी से ज़्यादा उम्मीदें हैं उन्हें उस दिन का इंतज़ार है जब उनकी बेटी पढ़ लिखकर उनका नाम रोशन करेगी लेकिन क्या ये सपने सरकारी स्कूल में पढ़कर पूरे होंगे?
हमने यही जानने की कोशिश की पटपड़गंज के सर्वोदय सह शिक्षा उच्चतर माध्यमिक स्कूल में पढ़ने वाले कई बच्चों से.
इनमें से कई बच्चे पढ़ लिखकर दूसरों को पढ़ाना चाहते हैं, कोई शिक्षक बनना चाहता है तो कोई पायलट या पुलिस इंस्पेक्टर. कइयों को स्कूल अच्छा लग रहा है तो कुछ को थोड़ी और सुविधाओं की कमी महसूस होती है.
कई तरह की कक्षाएं
नौवीं में पढ़ने वाले मनीष राज ने हमें बताया कि अब उन्हें कॉम्पिटीशन में हिस्सा लेने में मदद मिलती है और स्पोर्ट्स की क्लासेज़ भी होती हैं और उन्हें 6 हज़ार रुपये की स्कॉलरशिप भी मिलती है.
छठी कक्षा में पढ़ने वाली आरती शर्मा को स्कूल इसलिए अच्छा लगता है क्योंकि पढ़ाई के साथ वो डांस भी सीखती हैं. लेकिन प्रियांश जोशी कहते हैं कि शिक्षक चुनावी ड्यूटी की वजह से पढ़ाने नहीं आ रहे हैं.
इन बच्चों का कहना है कि उनके स्कूल में हैप्पीनेस क्लास के साथ-साथ देशभक्ति की क्लास भी होती है. हालांकि कई बच्चे ये बताते हैं उनका स्कूल पिछले एक साल में ही बदला है और यही आरोप विपक्ष भी लगा रहा है कि चार साल तक सरकार ने कुछ नहीं किया और चुनाव नज़दीक आते ही स्कूलों का कायाकल्प किया और इसे अपना चुनावी मुद्दा बना लिया.
स्कूलों के राजनीतिक इस्तेमाल का आरोप
जिस इलाक़े में ये स्कूल है उसी विश्वास नगर विधानसभा क्षेत्र से बीजेपी के विधायक ओपी शर्मा का आरोप है कि केजरीवाल सरकार ने स्कूलों का राजनीतिक इस्तेमाल किया है.
वो कहते हैं कि लोगों ने केजरीवाल सरकार से स्कूल मांगा और उन्होनें कमरे बनवा कर दे दिए, पर ना ही वहां फैकल्टी है ना बेंच. साथ ही, उन्होंने स्कूल ड्रॉप आउट्स का भी सवाल उठाया.
आम आदमी पार्टी का दावा
विपक्ष के आरोपों का जवाव देने के लिए मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने ख़ुद ही मोर्चा संभाला. उनका कहना है, "बीजेपी दिल्ली के उन 16 लाख बच्चों का अपमान कर रही है जिन्होंने अपने 32 लाख पेरेंट्स के साथ मिलकर 65 हज़ार शिक्षकों के साथ मिलकर 5 साल तक मेहनत की है."
वैसे साल 2016 में दिल्ली सरकार ने ड्रॉप आउट रेट सुधारने के लिए योजना रखी. लेकिन शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वाली संस्था प्रज्ञा फ़ाउंडेशन का कहना है कि साल 2015-16 में ड्रॉप आउट रेट 3.1 फ़ीसदी था जो 2018-19 में बढ़कर 3.8 फ़ीसदी हो गया.
साल 2015 में जब आम आदमी पार्टी की सरकार बनी तो वादा किया गया कि दिल्ली की शिक्षा व्यवस्था को नज़ीर बना देंगे.
यूरोपीय देशों की तरह दिल्ली के 1000 स्कूलों में हैप्पीनेस क्लास की शुरुआत की गई. प्राइवेट स्कूलों की तर्ज़ पर पेरेंट-टीचर मीटिंग भी होगी. आम आदमी पार्टी ने दावा किया कि शिक्षा पर उनकी सरकार ने बजट में तीन गुना पैसा बढ़ा दिया.
केवल 30 नए स्कूल बने
दिल्ली सरकार ने 500 नए स्कूलों का वादा भी किया था. अब यही वादा चुनावी मुद्दा बन गया. बीजेपी कह रही है कि 2015 से सत्ता में आने के बाद किसी नए स्कूल का निर्माण नहीं हुआ.
आम आदमी पार्टी ने भी अपनी ताज़ा प्रोग्रेस रिपोर्ट में ये माना है कि वो अब तक केवल 30 नए स्कूल का निर्माण करा पाई है. इसके साथ ही 30 अन्य स्कूलों का निर्माण कार्य चल रहा है.
उसने ये भी कहा कि मौजूदा सरकारी स्कूलों में आठ हज़ार अतिरिक्त कमरे बनवाए.
एक तरफ़ दिल्ली सरकार कह रही है कि उसने बिजली और शिक्षा जैसे मुद्दे को चुनावी चर्चा का केंद्र बनाया तो विपक्ष उनके इसी दावे को परत-दर-परत उधेड़ने में लगा है. दिल्ली में बीजेपी के सात सांसदों ने कई स्कूलों में जाकर विडियो बनाया और दावा किया कि स्कूलों की हक़ीक़त वो नहीं है जो दिल्ली सरकार बता रही है.
इसके बाद आम आदमी पार्टी ने तुरंत प्रेस कांफ़्रेंस कर जवाब दिया कि दिल्ली सरकार के स्कूलों की तुलना नगर निगम के स्कूलों की कुव्यस्था से की. आम आदमी पार्टी सरकार का कहना है कि पहली बार कोई सरकार अपने काम को मुद्दा बना रही है पर बीजेपी झूठ की राजनीति कर रही है.
दिल्ली चुनावों में बात तो बच्चों के भविष्य की हो रही है पर स्कूलों तक पहुंची इस लड़ाई से फ़िलहाल दिल्ली का चुनावी भविष्य तय करने की कोशिश हो रही है.
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