दिल्ली चुनाव का राष्ट्रीय राजनीति पर कोई असर पड़ेगा?

    • Author, ज़ुबैर अहमद
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, नई दिल्ली

पिछले एक हफ़्ते में मैंने ये सवाल दिल्ली के कई आम नागरिकों से पूछा कि दिल्ली में होने वाले विधानसभा चुनाव के नतीजों का असर राष्ट्रीय राजनीति पर पड़ेगा. सभी ने मुझसे कहा कि दिल्ली में चुनाव का असर राष्ट्रीय राजनीति पर ज़रूर पड़ेगा.

दिल्ली के केंद्र में मौजूद कनॉट प्लेस की एक ऊंची बहुमंज़िला इमारत में एक सिक्योरिटी गार्ड की हैसियत से काम करने वाले प्रवीण कुमार कहते हैं, "बीजेपी हर चुनाव को, यहाँ तक कि एमसीडी के चुनाव को भी, गंभीरता से लेती है और जी जान से चुनाव लड़ती है. पार्टी की हार हो या जीत इसका असर उसके मनोबल पर ज़रूर पड़ेगा."

न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी के इमाम जाफ़र की राय में "दिल्ली में बीजेपी को हार मिली तो इसका असर अमित शाह और नरेंद्र मोदी की साख पर होगा. और अगर आम आदमी पार्टी की शिकस्त हुई तो पार्टी के भविष्य पर प्रश्न चिन्ह भी लग सकता है."

दिल्ली चुनावों के मद्देनज़र अमित शाह अपनी चुनावी सभाओं में केंद्र सरकार की उपलब्धियां गिना रहे हैं, जिनमें जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 का हटाया जाना, राम मंदिर का उनके पक्ष में आया फ़ैसला जैसी उपलब्धियाँ शामिल हैं.

लेकिन दिल्ली के चुनाव का फ़ैसला राष्ट्रीय मुद्दों पर नहीं होगा. तो फिर ऐसे में इसके नतीजों का असर देश की सियासत पर कैसे और क्यों पड़ेगा? जबकि दिल्ली को एक पूर्ण राज्य का भी दर्जा तक हासिल नहीं है.

दिल्ली के हिस्से में केवल सात लोकसभा सीटें हैं. विधानसभा सीटों की बात करें तो दिल्ली में केवल 70 सीटें हैं. दिल्ली की सरकार के अंतर्गत दिल्ली पुलिस तक नहीं आती क्योंकि सरकार के अधिकार सीमित हैं.

दिल्ली के नागरिक और वरिष्ठ पत्रकार पंकज वोहरा कहते हैं कि दिल्ली के चुनाव नतीजों का असर नेशनल पॉलिटिक्स पर हमेशा पड़ता है.

वो कहते हैं, "सारे नेता मानते हैं कि दिल्ली मिनी इंडिया है. दिल्ली में नेशनल मीडिया उपस्थित है जो दिल्ली के चुनाव को बेहद गंभीरता से कवर करती है जिस कारण इसकी आवाज़ भी दूर-दूर तक गूँजती है."

आम आदमी पार्टी के पूर्व नेता और वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष के अनुसार में दिल्ली का चुनाव एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय घटना है और 8 फ़रवरी को होने वाला दिल्ली विधानसभा चुनाव, केंद्र में सत्ता पर विराजमान भारतीय जनता पार्टी के लिए बेहद अहम है.

वो कहते हैं, "अगर आप रुझान देखें तो 2015 के गुजरात विधानसभा चुनाव में पार्टी बड़ी मुश्किल से जीती थी. कर्नाटक में वो (चुनावी नतीजों के बाद) भी सरकार नहीं बना सकी. छत्तीसगढ़ में बीजेपी हार गई. पंजाब, राजस्थान और मध्यप्रदेश में पार्टी को हार मिली. हरियाणा में अकेले बीजेपी सरकार नहीं बना सकी. महाराष्ट्र में भी वो सरकार नहीं बना सकी."

आशुतोष कहते हैं, "अगर दिल्ली में जीत और हार का मार्जिन ज़्यादा होता है तो बीजेपी का कभी न हारने वाली पार्टी का भ्रम टूट जाएगा."

उनके अनुसार बीजेपी की अगर हार होती है तो विपक्ष का मनोबल बढ़ेगा, "इससे विपक्ष का आत्मविश्वास बढ़ेगा कि अगर हम साथ चुनाव लड़ते हैं, तो मोदी को हराया जा सकता है. न ही वो अजेय हैं और न ही अमित शाह चाणक्य हैं."

लेकिन क्या आम आदमी पार्टी एक बार फिर सत्ता पर लौटेगी?

दिल्ली चुनावों में बीजेपी काफ़ी ज़ोर ज़रूर लगा रही है लेकिन आम धारणा ये है कि जीत 'आम आदमी पार्टी' की होगी.

इसका एक कारण ये है कि बीजेपी में अरविंद केजरीवाल के मुक़ाबले में मुख्यमंत्री पद का कोई उमीदवार मैदान में नहीं है.

कांग्रेस अब भी काफ़ी कमज़ोर है और इस दौड़ में काफी पीछे है. इसका एक और कारण है दिल्ली बीजेपी के भीतर फूट और पार्टी के अंदर के लोग इसकी पुष्टि भी करते हैं. बीजेपी से जुड़े कई नेता जिनसे मैंने बात की, उन्होंने इस बात को स्वीकार किया.

लेकिन अगर केजरीवाल इस दौड़ में आगे निकल जाते हैं तो इसका मुख्य कारण होगा उनकी सरकार का रिपोर्ट कार्ड. ऐसा समझा जाता है कि सत्ता में आने के बाद शुरुआती दौर में केजरीवाल ने काम पर ध्यान कम दिया और प्रधानमंत्री मोदी पर हमले अधिक किए.

इस दौरान दिल्ली के एलजी के साथ कई बार टकराव की स्थिति बनी.

दो साल पहले सुप्रीम कोर्ट के एक फ़ैसले के बाद उन्होंने अपना ट्रैक बदला. 2016 फरवरी में उच्चतम न्यायालय ने दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार के बीच ज़िम्मेदारियों का स्पष्ट बंटवारा किया और इसके बाद केजरीवाल ने अपनी सरकार की योजनाओं पर तेज़ गति से काम करना शुरू किया.

आशुतोष कहते हैं पिछले दो सालों से केजरीवाल लगातार बिना प्रचार किए दौरा कर रहे हैं और अपनी सरकार की योजनाओं को लागू करने पर ज़ोर दे रहे हैं. इससे भी बढ़ कर वो अपने काम के प्रचार पर भी पूरा ध्यान दे रहे हैं

वो कहते हैं, "पार्टी का रिपोर्ट कार्ड भी जनता के सामने है और इस पर आम लोगों की प्रतिक्रियाएं मिली-जुली हैं."

"कच्ची आबादियों में जाएँ तो लोग केजरीवाल सरकार की तारीफ करते हैं. अमीर सोसायटियों और कोठियों में रहने वाले उनकी आलोचना करते नहीं थकते. इसीलिए केजरीवाल की चुनावी मुहिम कच्ची आबादियों और झोपड़पट्टियों में केंद्रित है."

"आम आदमी पार्टी लगातार अपनी सरकार की कामयाबियों में मोहल्ला क्लीनिक, बेहतर स्कूल प्रदर्शन और उम्दा शिक्षा, सस्ती बिजली, हर मोहल्ले में अच्छी गलियां और सड़कें बनवाने जैसी सफलताओं को गिना रही है."

झोपड़पट्टियों में लोग इस बात को स्वीकार करते हैं कि दिल्ली में स्वास्थ्य, बिजली, पानी और शिक्षा का स्तर बेहतर हुआ है. कुछ विशेषज्ञों का तर्क ये है कि नागरिकता संशोधन क़ानून जैसे मुद्दे पर अरविंद केजरीवाल की चुप्पी आम आदमी पार्टी के लिए भारी पड़ सकती है.

शुरू में मुसलमान वोटर 'आप पार्टी' से मायूस ज़रूर हुआ था लेकिन अब मुसलमान समुदाय के बीच ये धारणा बनी है कि बीजेपी को हारने के लिए केजरीवाल को वोट देना उनकी मजबूरी होगी.

ऐसा लगता है कि बीजेपी के ख़ेमे में इस बात का अहसास है कि केजरीवाल का जवाब उनके पास नहीं है. इसीलिए प्रधानमंत्री मोदी की जगह दिल्ली में अमित शाह चुनावी सभाएं कर रहे हैं. राम लीला मैदान की रैली प्रधानमंत्री की पहली रैली थी और उसके बाद से ये काम अमित शाह को सौंप दिया गया है.

दिल्ली विधानसभा चुनाव में जीत जिसकी भी हो इसमें कोई दो मत नहीं है कि इसका असर राष्ट्रीय राजनीति पर असर पड़ेगा.

दिल्ली में सालों से रह रहे असम के एक डिजिटल मीडिया के एग्जीक्यूटिव अनिल कोलिता कहते हैं कि दिल्ली विधानसभा चुनाव के नतीजे बहुत महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं.

वो कहते हैं, "बीजेपी की जीत से अमित शाह का रुतबा और बढ़ेगा जबकि पार्टी की हार से उन्हें धक्का लगेगा क्योंकि वो हारना पसंद नहीं करते. मोदी जी रैलियां करेंगे और इसके बावजूद पार्टी हारेगी तो ये समझा जाएगा कि लोगों ने उनकी नहीं सुनी, जैसा 2015 में हुआ था."

वो कहते हैं, "अगर आप पिछले कुछ सालों में देखें तो राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी 2014 और 2019 में दिल्ली की सभी सातों सीटें पर जीती थी जबकि 2015 के विधानसभा चुनाव में इसे केवल तीन सीटें मिली. हाल के सालों में देखें को विधानसभा चुनावों के मामले में भाजपा का ग्राफ़ नीचे जा रहा है. पंजाब, कर्नाटक, बिहार, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में इसे शिकस्त हुई जबकि महाराष्ट्र में सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरने के बावजूद वो सरकार नहीं बना सकी. यहां पिछले चुनाव की तुलना में इसे भारी नुक़सान उठाना पड़ा."

दिल्ली के चुनाव के नतीजों से कई सवालों के जवाब भी मिलने की उम्मीद है. जैसे क्या आम आदमी पार्टी का उभरना केवल एक अस्थायी घटना थी या फिर वो एक निरंतर शक्ति बन कर उभरने वाली एक पार्टी है? क्या दिल्ली में बीजेपी आएगी? या फिर पिछली बार की तरह मतदाता फिर से राज्य और राष्ट्रीय चुनावों में अंतर करेंगे? क्या शीला दीक्षित की मृत्यु के बाद कांग्रेस दिल्ली में फिर से उभर सकेगी? और क्या नागरिकता (संशोधन) क़ानून और उसके बाद के विरोध प्रदर्शनों का चुनावी नतीजों पर कोई प्रभाव पड़ेगा?

इसके इलावा शायद दिल्ली विधानसभा चुनाव इन सवाल का भी जवाब दे सके कि क्या नरेंद्र मोदी अपने बल पर पार्टी को विधानसभा चुनाव जितवा सकते हैं?

कांग्रेस और आम आदमी पार्टी से भी कहीं ज़्यादा ये चुनाव बीजेपी के लिए अहम हैं. जहाँ बीजेपी को लोकसभा में भारी बहुमत हासिल है वहीं राज्यसभा में इसके पास बहुमत नहीं है.

अगर इसे आने वाले समय में धर्मांतरण विरोधी जैसे विवादास्पद बिल पारित कराने हैं तो राज्यसभा में बहुमत होने से इसमें उसे आसानी होगी. इसके लिए आने वाले समय में राज्यों में चुनाव जीतना बेहद ज़रूरी है.

दिल्ली में चुनाव कौन जीतेगा ये सवाल भी मीडिया और मोहल्लों में पूछा जा रहा है. अधिकतर विषेशज्ञ ये मान रहे हैं कि आम आदमी पार्टी को एक बार फिर बहुमत प्राप्त होगा.

बीजेपी के ख़ेमे में भी ये माना जा रहा है कि दिल्ली में इसकी हार हो सकती है. जहाँ तक कांग्रेस का सवाल है तो आशुतोष कहते हैं कि अगर पार्टी ने अपना खाता भी खोल लिया तो उन्हें आश्चर्य होगा.

लेकिन जनता किसे चुनती है इसका पता नतीजे आने के बाद ही चलेगा?

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)