सिनेमा से लेकर खेल, सितारों को क्यों भाती है राजनीति

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- Author, कमलेश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
राजनीति और सितारों का मेल कोई नया नहीं है. इन सितारों में बॉलीवुड सेलिब्रिटीज़ से लेकर खिलाड़ी तक शामिल रहे हैं.
हाल ही में बैडमिंटन खिलाड़ी साइना नेहवाल भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गई हैं.
दिल्ली चुनाव भी नज़दीक है और साइना एक चर्चित खिलाड़ी हैं. हालांकि, साइना ये चुनाव नहीं लड़ रही हैं.
इसी तरह पिछले साल हुए हरियाणा विधानसभा चुनाव में बीजेपी से दादरी से कुश्ती की खिलाड़ी बबीता फोगाट और बरौदा से योगेश्वर दत्त ने चुनाव लड़ा था. हालांकि, दोनों को हार का सामना करना पड़ा. वहीं, हॉकी के खिलाड़ी संदीप सिंह बीजेपी के टिकट पर जीत गए थे.

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मुंबई में अभिनेत्री उर्मिला मतोंडकर कांग्रेस में शामिल हुई थीं लेकिन वो जीत नहीं पाईं. चुनाव के बाद उन्होंने पार्टी छोड़ दी थी.
इन नामों की लिस्टी बहुत लंबी है जिनमें अभिनेता अमिताभ बच्चन, जया बच्चन, हेमा मालिनी, धर्मेंद्र, विनोद खन्ना और गोविंदा जैसे सितारों के नाम भी शामिल हैं. इनमें से कुछ राजनीति में अपनी झलक दिखाकर चले गए तो कुछ ने इसे हमेशा के लिए अपना लिया.
लेकिन, पहले से ही अपने पेशे में नाम और पैसा दोनों कमा लेने के बावजूद भी ये सेलिब्रिटी राजनीति में क़दम क्यों रखते हैं और उनमें से कुछ अचानक ही पर्दे से गायब क्यों हो जाते हैं.

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क्या हैं कारण
सेलिब्रिटीज के राजनीति में क़दम रखने के बारे में 'नेता अभिनेता' किताब लिखने वाले राशिद किदवई कहते हैं कि इसका एक बहुत बड़ा कारण सार्वजनिक जीवन में बने रहने की इच्छा है.
रशिद किदवई बताते हैं, ''सभी नागरिकों का हक है कि वो राजनीति में आएं, तो कुछ सेलिब्रिटी अपने इस अधिकार का भी इस्तेमाल करते हैं. कुछ ऐसे होते हैं जिनका किसी पार्टी की तरफ़ झुकाव होता है इसलिए वो राजनीति में आते हैं.''
''एक बड़ा कारण ये भी होता है कि सेलिब्रिटी का सार्वजनिक जीवन और चाकचौंध बहुत लंबे समय तक नहीं होता है. जब वो चकाचौंध कम होने लगती है तो उसे बनाए रखने के लिए भी सेलिब्रिटी राजनीति में क़दम रखते हैं. ये अलग तरह का दरवाज़ा उनके लिए खोल देती है.''
''अगर वो कम समय के लिए भी प्रचार करने आ रहे हैं तो उन्हें सरकार या पार्टी से परोक्ष रूप से कुछ ना कुछ लाभ होने की उम्मीद होती है. कई बार ये बहुत कमर्शियल फ़ैसला होता है. उन्हें लगता है कि इससे कुछ फायदा हो सकता है या लोकप्रियता बढ़ सकती है.''

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वहीं, राजनीतिक विश्लेषक नीरजा चौधरी कहती हैं कि राजनीतिक दल इन सेलिब्रिटीज तक पहुंच बनाते हैं. जैसे राज्यसभा में जो सदस्य नॉमिनेट होते हैं उनमें पार्टी अपने अनुसार सेलिब्रिटी लाती है. सांसद बनकर सेलिब्रिटी के पास एक नया ओहदा और चर्चा में रहने का मौक़ा भी मिलता है.
लेकिन, पिछले साल लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के लिए दक्षिणी दिल्ली से चुनाव लड़ने वाले बॉक्सर विजेंदर सिंह कहते हैं, ''उन्होंने राजनीति में क़दम समाज और लोगों के लिए बेहतर काम करने के लिए रखा था. सिस्टम में आए बिना आप बहुत ज़्यादा नहीं कर पाते क्योंकि हर काम वहीं से होकर गुज़रता है और आगे भी पार्टी के लिए काम करते रहेंगे.''
विजेंदर सिंह दिल्ली चुनावों में भी कांग्रेस के लिए प्रचार कर रहे हैं.
वहीं, योगेश्वर दत्त बताते हैं कि उनके गांव में पानी से लेकर कई और समस्याएं हैं और जब लोगो उनसे मदद मांगते थे तो वो एक खिलाड़ी रहते ज़्यादा कुछ नहीं कर पाते थे. इसलिए उन्होंने राजनीति में क़दम रखा. उनका कहना है कि आज भी वो लोगों के बीच ही रहकर काम कर रहे हैं.

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क्यों ग़ायब हो जाते हैं सेलिब्रिटी
कई ऐसे बड़े सेलिब्रिटी रहे हैं जो राजनीति में कुछ वक़्त के लिए दिखाई गए और फिर वापस अपने पेशे में लौट गए.
जैसे अमिताभ बच्चन ने 1980 के दशक में राजनीति में हाथ आजमाया था. उन्होंने इलाहाबाद से लोकसभा चुनाव लड़ा और यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री एचएन बहुगुणा को हराकर ऐतिहासिक जीत दर्ज की थी. लेकिन, विवादों में नाम के बाद वो राजनीति से दूर हो गए.
इसी तरह गोविंदा 2004 में कांग्रेस के टिकट पर मुंबई से लोकसभा चुनाव में जीतकर सांसद बने लेकिन उनका कार्यकाल विवादों में घिरा रहा. उसके बाद वो भी राजनीति से दूर चले गए. कुछ ऐसी ही स्थिति राजस्थान के बीकानेर से संसदीय चुनाव लड़ने वाले धर्मेंद्र की भी रही.
हाल ही में कांग्रेस में शामिल हुईं उर्मिला मतोंडकर भी चुनाव के बाद पार्टी से अलग हो गई थीं.

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इसे लेकर राशिद किदवई कहते हैं, ''राजनीतिक जीवन और खेल-सिनेमा के जीवन में बहुत अंतर होता है. खेल और सिनेमा में आप अपनी विशेषज्ञता वाले क्षेत्र में प्रदर्शन करते हैं और आपको पूरे देश या दुनिया का भी समर्थन और प्यार मिलता है. लेकिन, राजनीति में चीजें बहुत अलग होती हैं. यहां ऐसे विवाद होते हैं जिनका कई बार सेलिब्रिटी को भी अंदाज़ा नहीं होता. साथ ही उन्हें मिलने वाला समर्थन दल विशेष के अनुसार होता है. ये किसी भी खिलाड़ी या कलाकार के लिए बहुत बड़ी चुनौती होती है. गौतम गंभीर इसमें ताज़ा उदाहरण हैं.''
राशिद किदवई कहते हैं कि फिर कई बार हारने के बाद उनका महत्व भी पार्टी में पहले जितना नहीं रहता तो भी वो धीरे-धीरे उससे हट जाते हैं. हालांकि, कुछ सेलिब्रिटी लगातार पार्टी की बैठकों, चुनाव प्रचार और अन्य कामों में लगे रहते हैं.
उन्होंने बताया कि इसकी कोई तय वजह नहीं है. जिन लोगों की राजनीति में समझ व पकड़ थी और वो कुछ काम करने के लिए उसमें आए थे, वो राजनीति में अपने पैर जमा ही लिए.
दक्षिण भारत तो ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है और उत्तर भारत में राज बब्बर, जया बच्चन, स्मृति इरानी, हेमा मालिनी, शत्रुघ्न सिन्हा, कीर्ति आज़ाद और नवजोत सिंह सिद्धू जैसे सेलिब्रिटीज ने राजनीति में अपनी पहचान बनाई है और वो आज भी सक्रिय हैं.

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दक्षिण भारत अलग क्यों
दक्षिण भारत में अभिनेता जिस तरह सक्रिय राजनीति में आए और पार्टी से लेकर सरकार तक बनाई वैसा उदाहरण उत्तर भारत में नहीं मिलता है.
दक्षिण भारतीय अभिनेताओं की मुख्य पहचान ही राजनीति से बन गई.
तमिलनाडु में करुणानिधि ने द्रविड़ आंदोलन से राजनीति में क़दम रखा. डीएमके का हिस्सा बनने के दौरान ही वो फ़िल्मी दुनिया से जुड़ गए थे. करुणानिधि का पार्टी में क़द और लोगों के बीच लोकप्रियता इस तरह बढ़ी कि वो पांच बार तमिलनाडु के मुख्यमंत्री रहे.
इसी तरह तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री एमजी रामचंद्रन भी फ़िल्मी दुनिया से होते हुए राजनीति में आए और डीएमके से जुड़े. बाद में उन्होंने एआईएडीएमके बनाई और फिर इस पार्टी से जयललिता जैसी क़द्दावर नेता उभरीं. जयललिता भी ने भी फ़िल्मों से राजनीति में क़दम रखा था. राजनीति में उनकी पहचान और काम उन्हें मुख्यमंत्री के पद तक ले गया.
अभी की बात करें तो कमल हासन अपनी राजनीतिक पार्टी बना चुके हैं और रजनीकांत भी राजनीति से जुड़े रहे हैं.

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आंध्र प्रदेश में देखें तो पूर्व मुख्यमंत्री एनटी रामाराव अभिनेता और फ़िल्म निर्माता रहे हैं, अभिनेता चिरंजीवी ने भी अपनी पार्टी बनाई और फिर कांग्रेस में शामिल हो गए. उनके भाई पवन कल्याण ने भी अपनी पार्टी बनाई है.
इन सभी नेताओं की राजनीति में लोकप्रियता किसी उत्तर भारतीय नेता से कम नहीं है.
इसके पीछे राशिद किदवई दक्षिण भारत की समाजिक स्थिति को एक बड़ी वजह मानते हैं.
वह कहते हैं, ''वहां आंदोलनों से भी अभिनेता राजनीति में आए. उन्होंने जातिगत भेदभाव और ग़रीबी के ख़िलाफ़ लंबी लड़ाई लड़ी है. जिस तरह वो एक हीरो की तरह फ़िल्मों में दिखे वही उन्होंने राजनीति में भी करने की कोशिश की. इसलिए लोगों ने उन्हें सराहा और आगे बढ़ाया. उन्होंने राजनीति में बहुत मेहनत और समय दिया है.''
''कोई भी राजनीति में कितने समय तक टिक सकता है ये उस व्यक्ति की अपनी सोच, पृष्ठिभूमि और राजनीति में दिलचस्पी पर निर्भर करता है. हर कोई राजनीतिक नहीं होता और ये बात कई बार राजनीति में उतरने पर पता चलती है. जो राजनीतिक सोच रखता है वो किसी भी क्षेत्र से आए अपना रंग जमा देता है.''
नीरजा चौधरी कहती हैं कि राजनीतिक दल भी सेलिब्रिटीज को सिर्फ़ प्रचार के मकसद से नहीं देखते. उन्हें लाने का एक ही कारण होता है कि भीड़ इकट्ठा करना और फिर उस भीड़ के सामने पार्टी की बात रखना. इसलिए चुनाव ख़त्म होने के बाद पार्टी उन पर ज़्यादा ध्यान नहीं देती.

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लोगों पर प्रभाव
नीरजा चौधरी कहती हैं कि सेलिब्रिटी का जादू तब चल सकता है जब पार्टी मज़बूत हो.
वह कहती हैं कि जैसा कि कांग्रेस के साथ लोकसभा चुनाव में हुआ, उसी तरह अगर पार्टी कमज़ोर है तो सेलिब्रिटी अपने बूते नहीं जीत सकता. लोग उन्हें सुन लेंगे लेकिन वोट देंगे ये ज़रूरी नहीं. उन्हें लेकर उत्साह रहता है पर अब लोग ये भी सोचने लगे हैं कि वो फ़िल्म और खेल छोड़कर कितना समय उन्हें दे पाएंगे.
हां, अगर सेलिब्रिटी कमिटमेंट दिखाता है तो धीरे-धीरे लोग उस पर भरोसा करने लगते हैं. उसे फ़िल्म में अपनी हीरो या हीरोइन की छवि का फ़ायदा तो मिलता ही है. कुछ कलाकार लोगों की इसी उम्मीद के चलते जीतते भी रहे हैं, लेकिन जब लोगों की उम्मीद टूट गई तो उन्होंने राजनीति से बाहर का रास्ता भी दिखाया है.
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