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जम्मू-कश्मीर में पाबंदियों की एक हफ़्ते में समीक्षा करे सरकार: सुप्रीम कोर्ट
जम्मू-कश्मीर में लगे प्रतिबंधों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर फ़ैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सभी प्रतिबंधों की समीक्षा करने का निर्देश दिया है.
सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश देते हुए कहा कि जम्मू-कश्मीर सरकार एक हफ़्ते के अंदर प्रतिबंध के सभी आदेशों की समीक्षा करे.
जस्टिस एन.वी. रमना ने कहा, ''जम्मू-कश्मीर प्रशासन को सीआरपीसी की धारा 144 के तहत जारी प्रतिबंध के सभी आदेश प्रकाशित करने हैं ताकि प्रभावित लोग इन्हें चुनौती दे सकें.''
सुप्रीम कोर्ट ने ये भी कहा कि बिना किसी निर्धारित अवधि के या अनिश्चितकाल के लिए इंटरनेट बंद करना टेलिकॉम नियमों का उल्लंघन है.
जस्टिस एनवी रमना, जस्टिस आर सुभाष रेड्डी और जस्टिस बीआर गवई की तीन जजों की बेंच ने कश्मीर में लॉकडाउन की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिकाओं के एक समूह पर 27 नवंबर को फ़ैसला सुरक्षित रख लिया था.
प्रकाशित करने होंगे आदेश
पिछले साल पाँच अगस्त को केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर राज्य को संविधान के अनुच्छेद 370 के तहत मिलने वाले विशेष दर्जे को ख़त्म कर दिया था और साथ ही राज्य में कई तरह की पाबंदियां लगा दी थीं.
जम्मू-कश्मीर में संचार माध्यमों, इंटरनेट पर और कई दूसरे प्रतिबंध लगाए गए हैं. कश्मीर की वरिष्ठ पत्रकार अनुराधा भसीन, कांग्रेस नेता ग़ुलाम नबी आज़ाद और कुछ अन्य लोगों ने इसके ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया था.
याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत में पेश होने वालीं वकील वृंदा ग्रोवर ने आदेश आने के बाद कहा, ''जब किसी राज्य में सुरक्षा और आज़ादी का संतुलन बनाने की ज़रूरत होती है तब आप संविधान के कुछ सिद्धांतों के अनुसार स्वतंत्रता पर रोक लगा सकते हैं. कश्मीर में भी जब आप सुरक्षा और आज़ादी का संतुलन बनाएंगे तो इन बातों का ध्यान रखना होगा. मगर राज्य ने इंटरनेट और संचार माध्यमों पर प्रतिबंध लगाने और धारा 144 लगाने से जुड़े आदेश न तो प्रकाशित किए और न ही कोर्ट के सामने रखे."
वृंदा ग्रोवर ने कहा, "सुप्रीम कोर्ट ने धारा 144 के तहत पाबंदियां लगाने के आदेशों को प्रकाशित न करने को ग़लत बताया है और इन्हें प्रकाशित करने का राज्य को निर्देश दिया गया है. आगे भी सारे आदेश हमेशा प्रकाशित किए जाएंगे. लोग उस आदेश को चुनौती दे सकेंगे. उस आदेश में ये बात होनी चाहिए कि किस कारण से स्वतंत्रता पर रोक लगाई जा रही है.''
उन्होंने बताया, ''कोर्ट ने ये भी कहा कि आज की तारीख़ में इंटरनेट अनुच्छेद 19(1) के तहत अभिव्यक्ति की आज़ादी का हिस्सा है. सुप्रीम कोर्ट ने आज बेहद महत्वपूर्ण बात कही है. इसलिए अगर सरकार कभी भी इंटरनेट पर रोक लगाएगी तो उसे सीमाओं को पूरा ख़्याल रखना होगा.''
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