आख़िर 'ला इलाहा इल्लल्लाह' नारे से क्या परेशानी है? :नज़रिया

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- Author, अजित साही
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए, वाशिंगटन डीसी से
नागरिकता संशोधन क़ानून (सीएए) और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) के विरोध के दौरान कथित तौर पर "ला इलाहा इल्लल्लाह" के नारे लगाए जा रहे थे. इसका एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ है जिसके बाद कुछ लोग इसे इस्लामोफ़ोबिया भी करार दे रहे हैं.
इस्लामोफ़ोबिया शब्द को देखें तो, ये दो शब्दों की संधि से बना है: इस्लाम और फ़ोबिया. फ़ोबिया यानी भय, आशंका, आतंक.
कांग्रेस पार्टी के सांसद शशि थरूर ने इस्लाम के बारे में हाल ही में एक ट्वीट किया था वो इस्लामोफ़ोबिया का स्पष्ट नमूना है.
थरूर ने अंग्रेज़ी में ट्वीट किया कि "ला इलाहा इल्लल्लाह" इस्लामी अतिवाद का उदाहरण है.
उन्होंने लिखा, "हिंदू चरमपंथ के ख़िलाफ़ हमारी लड़ाई के चलते इस्लामी चरमपंथियों को ये नहीं लगना चाहिए कि हम उनके साथ हैं. हम दोनों तरह के चरमपंथ से लड़ रहे हैं. हम धार्मिक कट्टरता को बहुलता और विविधता की जगह नहीं लेने देंगे."
थरूर ने आगे लिखा, "हम समावेशी भारत को बचा रहे हैं."
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इसमें 'चरमपंथी' या 'अतिवादी' जैसा क्या है?
"ला इलाहा इल्लल्लाह" का शाब्दिक अर्थ है "अल्लाह के अलावा कोई दूसरा भगवान नहीं है".
इसकी अगली पंक्ति है "मुहम्मदूं रसूल अल्लाह" यानी मुहम्मद अल्लाह के पैगंबर हैं.
इसमें चरमपंथ क्या है? क्या ईसाई इसलिए चरमपंथी माना जाए क्योंकि वो ईसा मसीह को भगवान का पुत्र मानता है या हिंदू को इसलिए चरमपंथी मान लिया जाए क्योंकि वो विष्णु या शिव का उपासक है?
आख़िर क्यों थरूर को "ला इलाहा इल्लल्लाह" इंन्क्लूज़िव नहीं लगता है? क्यों उनको लगता है कि ये नारा नागरिकता संशोधन क़ानून के विरोध में चल रहे आंदोलन को धार्मिक चरमपंथ की ओर ले जाएगा?
पृथ्वी की सात अरब आबादी का हर चौथा इंसान मुसलमान है.
आख़िर क्या वजह है कि दुनिया के पौने दो अरब मुसलमानों के दीन में थरूर को शांति और पवित्रता नहीं दिखती? शील और विवेक नहीं दिखता? थरूर को ये भी तो लग सकता था कि इस नारे से यह जन आंदोलन अधिक उदार, सहिष्णु और दयालु बनेगा?
थरूर के इस ट्वीट को सोशल मीडिया पर भारतीय लिबरल-सेक्युलर वर्ग का ख़ासा समर्थन मिल रहा है, ख़ास तौर से ग़ैर-मुसलमानों का.
ये वो वर्ग है जो दिल से हिंदुत्व का विरोधी है और मुसलमानों का हिमायती भी है, लेकिन इस्लाम के बारे में थरूर जैसी ही सोच रखता है.
ये वर्ग कह रहा है कि यदि सड़क के इंक़लाब को इस्लामी अस्मिता का रंग दे दिया तो ग़ैर-मुसलमान छिटक जाएंगे और आंदोलन कमज़ोर हो जाएगा.
ये वर्ग ये भी तर्क दे रहा है कि यदि आंदोलनकारी मुसलमान मज़हबी पहचान सामने लाएंगे तो सरकार उनको धार्मिक कट्टरपंथी करार देकर आंदोलन को कुचल देगी.

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जय भीम कह सकते हैं तो ला इलाहा इल्ललाह क्यों नहीं?
ध्यान देने की बात है कि यही वर्ग जो मुसलमानों को अपनी अस्मिता की अभिव्यक्ति से रोकना चाहता है दलित संघर्ष में दलित अस्मिता को और आदिवासी संघर्ष में आदिवासी अस्मिता को मुखर करने का समर्थक है.
जब सेक्युल-लिबरल लोग दलित आंदोलनकारियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर "जय भीम" का नारा लगा सकते हैं तो मुसलमानों के साथ खड़े होकर "ला इलाहा इल्लल्लाह" का नारा क्यों नहीं लगा सकते हैं?
भारत में 'इस्लामोफ़ोबिया' पर सार्वजनिक चर्चा नगण्य है इसलिए बहुत लोगों को ये समझ ही नहीं है कि वो बिना वजह पूर्वाग्रह का शिकार हो रहे हैं.
अफ़सोस की बात है कि भारत का लिबरल-सेक्युलर समाज इस्लाम पर बौद्धिक विचार-विमर्श भी नहीं करता है.
भारत के सेक्युलर-लिबरल लोगों को मालूम होना चाहिए कि दशकों से प्रताड़ित भारतीय अल्पसंख्यक मुसलमानों को इस्लाम ही हिम्मत देता रहा है.
जो मुसलमान महिलाएं आज कड़ाके की ठंड में सड़क पर बैठी हैं वो अपने मज़हब से ही हौसला पा रही हैं.
आज भारत की पुलिस मुसलमानों के घरों में घुस कर उनको आतंकित कर रही है, उनके बच्चों को क़ैद करके ख़ौफ़नाक यातना दे रही है, अंधाधुंध गोली चला कर मुसलमानों की खुलेआम हत्या कर रही है. फिर भी थरूर चाहते हैं कि मुसलमान मुसलमान न बनें?
जो सच्चा लिबरल होगा वो भारत के मुसलमानों को इस्लाम समेत क़बूल करेगा,जैसा मार्च 2019 में न्यूज़ीलैंड में मस्जिद में हुए आतंकी हमले के बाद उस देश की प्रधानमंत्री ने हिजाब पहन कर और मस्जिद जाकर किया था. या जैसे इस सप्ताह केरल में एक चर्च के ईसाइयों ने हिजाब और जालीदार टोपी पहन कर किया है.
भारत के सेक्युलर लिबरल लोगों के लिए ये भी आवश्यक हो गया है कि वो दुष्प्रचार से हटकर इस्लाम और इस्लामिक इतिहास की जानकारी हासिल करना शुरू करें. पैगंबर मोहम्मद की जीवनी पढ़ें, क़ुरआन पढ़ें और मस्जिदों में आना-जाना शुरू करें.
उदारवाद की यह सीख भी हमें भारत के मुसलमानों से ही मिलती है जिन्होंने मज़हबी होते हुए भी अरुंधति रॉय और कविता कृष्णन जैसे कितने ही नास्तिक या हिंदू बुद्धिजीवियों को खुलकर अपनाया है. फिर हम क्यों मुसलमान के इस्लाम को ठुकराएं करें?
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