वो राज नारायण जिन्होंने इंदिरा गांधी को धूल चटाई थी

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- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
'जायंट किलर' के नाम से मशहूर और इंदिरा गांधी को चुनावी शिकस्त देने वाले राज नारायण के बारे में कहा जाता है कि अगर वो राजनेता नहीं बने होते तो शायद अपने ज़माने के चैंपियन पहलवान होते.
राजनारायण के इससे कोई ज़्यादा फ़र्क भी नहीं पड़ता था. उनके लिए सबसे ज़्यादा ज़रूरी था लड़ना, -जिसको वो 'संघर्ष' का नाम दिया करते थे.
जाने माने पत्रकार जनार्दन ठाकुर अपनी किताब 'ऑल द जनता मेन' में लिखते हैं, "राजनारायण के राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा दिन आया था सितंबर, 1958 में जब उन्होंने अपने समाजवादी साथियों के साथ उत्तर प्रदेश विधानसभा में ऐसा हंगामा मचाया था कि उनको सदन से निकलवाने के लिए पहली बार हेलमेट लगाए पुलिसकर्मियों को सदन के अंदर बुलाना पड़ा था."
"राज नारायण ने अपने साढ़े तीन मन वज़न को ज़मीन पर डाल दिया था और पुलिस वालों को बाक़ायदा उन्हें खींच कर ज़मीन पर घसीटते हुए सदन से बाहर ले जाना पड़ा था. जब वो विधानसभा के मुख्य द्वार तक खींच कर लाए गए, जब तक उनके सारे कपड़े फट चुके थे और उनके जिस्म पर सिर्फ़ एक लंगोट बचा था. वहाँ मौजूद प्रत्यर्शदर्शियों में से एक ने मुझे बताया कि राज नारायण ऐसे लग रहे थे जैसे किसी हैवी वेट पहलवान को अखाड़े में चित कर दिया गया हो."

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भयविहीन शख़्सियत
लेकिन एक ज़माने में उनके बहुत नज़दीकी रहे और इस समय बहुजन समाज पार्टी के प्रवक्ता सुधींद्र भदोरिया उनका एक दूसरा ही रूप खींचते हैं.
भदोरिया बताते हैं, "राजनीति और सामाजिक जीवन में भय नाम का शब्द राज नारायण के शब्दकोष में नहीं था. वो भयविहीन व्यक्ति थे. एक चीज़ उनमें और थी. जिस चीज़ को करने को वो ठान लेते थे, उसके पीछे वो तब तक पड़े रहते थे, जब तक वो पूरी नहीं हो जाती थी."
"एक वाक्य में मैं इसे मैं और सम अप कर दूँ. उनकी जीवन वाक्य था 'कबिरा खड़ा बाज़ार में लिए लकूटी हाथ, जो घर फूके आपना, जो चले हमारे साथ."

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हैवी वेट पहलवान जैसा रूप
अपने चरम रूप में राज नारायण का वज़न करीब 110 किलो हुआ करता था. बाद में वो अपने सिर पर हरे रंग का 'बंदना' या स्कार्फ़ बाँधने लगे थे.
अमरीकी दूतावास द्वारा अमरीकी विदेश मंत्रालय को भेजे एक गुप्त केबिल में कहा गया था कि राज नारायण ने अपने माथे पर त्वचा की बीमारी से बने सफ़ेद दाग़ को छिपाने के लिए स्कार्फ़ बांधना शुरू किया था.
जाने माने समाजशास्त्री और एक ज़माने में राज नारायण के बेहद करीबी रहे प्रोफ़ेसर आनंद कुमार याद करते हैं, "एक तो उनके शरीर का आकार प्रकार अति स्वस्थ हुआ करता था. वो मझोले क़द के थे और गेहुँआ रंग था उनका. बचपन में वो अखाड़े के बहुद शौकीन थे. अगर उनसे किसी का परिचय न कराया जाए तो देखने में वो एक ज़बरदस्त हैवी वेट पहलवान जैसे लगते थे."
"उनका एक बाल सुलभ संवाद का तरीका हुआ करता था. आपसे मिलते ही वो आपका हालचाल पूछेंगे. फिर खाना-पीना कहाँ ठहरे हैं? ऐसा लगता था जैसे वो आपको पता नहीं कब से जानते हैं. उनसे मिल कर ऐसा लगता था जैसे उनके अंदर एक आग जल रही हो, जो आपके अंदर की ठंडक को दूर कर रही हो, एक तपिश दे रही हो और आपको यकीन दिला रही हो."

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लोहिया से मनमुटाव और फिर माँगी माफ़ी
राज नारायण के राजनीतिक गुरु थे समाजवादी नेता राम मनोहर लोहिया. उनके अनुयायियों की बात मानी जाए तो जो रिश्ता राम और हनुमान का था, वो ही लोहिया और राजनारायण के बीच का था.
लेकिन एक बार राम मनोहर लोहिया भी राज नारायण से नाराज़ हो गए थे.
आनंद कुमार बताते हैं, "कहते हैं कि जब राज नारायण राज्य सभा में आए तो उस समय लोहिया की राय थी कि जो लोग लोकसभा का चुनाव हार गए हों, उन्हें राज्य सभा या विधान परिषद में नहीं आना चाहिए. उसको वो पिछला दरवाज़ा मानते थे. वो ख़ुद 1957 और 1962 का चुनाव हारे थे, लेकिन उन्होंने राज्य सभा के ज़रिए संसद पहुंचने से इनकार कर दिया था."
"राज नाराणजी गुरु के आदेश का पालन करने के लिए गुरु से आगे भी निकल जाते थे. वो जानते थे कि अगर वो संसद से ग़ैरहाज़िर हो जाएंगे तो हालात बिगड़ जाएंगे उत्तर प्रदेश की राजनीति में और वो बाद में साबित भी हुआ. लेकिन डॉक्टर लोहिया कथनी और करनी की एकता को मानने वाले थे, इसलिए वो राज नारायण की इस हरकत से नाराज़ हो गए थे."
"कहते हैं कि राज नारायण रोज़ उनके सात, गुरुद्वारा रकाब गंज के घर के सामने आ कर बैठ जाते थे. अंदर ख़बर जाती थी कि राज नारायण बैठे हुए हैं और लोहिया नाराज़ हो कर कहते थे, 'बैठे रहने दो उसको.' कहते हैं कि एक बार राज नारायण रोते हुए घर के अंदर गए और उससे सारी गाँठ खुल गई और सारे मैल धुल गए. उन्होंने क्षमा भाव से लोहिया से कहा, कि ये मेरा पहला और आखिरी दोष होगा और आगे से मैं कोई ऐसी चीज़ नहीं करूंगा जिससे आपको तकलीफ़ पहुंचे."
इंदिरा गांधी से चुनावी टक्कर
1971 के लोकसभा चुनाव में राय बरेली चुनाव क्षेत्र से इंदिरा गाँधी ने उन्हें एक लाख से भी अधिक वोटों से हराया.
लेकिन राज नारायण ने इसे अदालत में चुनौती दी और इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस जगमोहनलाल सिन्हा ने इंदिरा गांधी का चुनाव अवैध घोषित कर दिया और उन पर छह सालों के लिए चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया.
मशहूर लेखिका कैथरीन फ़्रैंक ने इंदिरा गांधी की जीवनी 'द लाइफ़ ऑफ़ इंदिरा गांधी' में लिखा, "राज नारायण को भारत के मसख़रों का राजकुमार कहा जाता था. उनकी एक रंगीन शख़्सियत थी. वो अपने सिर पर एक बंदना बाँधते थे और उनका पूरा हाव-भाव एक विदूषक की तरह होता था. जब उन्होंने इंदिरा गांधी के ख़िलाफ़ चुनाव याचिका दायर की तो उसे एक स्टंट माना गया. उसमें बहुत गहराई नहीं थी."
"उन्होंने इंदिरा पर आरोप लगाया था कि उन्होंने यशपाल कपूर को अपना चुनावी एजेंट बनाया जबकि वो अभी भी सरकारी सेवा में थे. उनका इंदिरा पर दूसरा आरोप था कि उन्होंने प्रचार के दौरान चुनावी मंच और लाउड स्पीकर लगाने के लिए सरकार के पीडब्लूडी कर्मचारियों का इस्तेमाल किया."
"1971 के चुनाव में इंदिरा गाँधी ने राज नारायण को एक लाख से भी अधिक वोटों से हराया था. मैं नहीं समझती कि इसमें यशपाल कपूर के चुनाव प्रचार या चुनाव मंच और लाउड स्पीकरों की कोई भूमिका रही होगी. लंदन के टाइम्स ने बिल्कुल सटीक टिप्पणी की थी, 'ये बिल्कुल ऐसा था जैसे प्रधानमंत्री को ट्रैफ़िक नियम का उल्लंघन करने के लिए बर्ख़ास्त कर दिया जाए'."

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इंदिरा से दोबारा चुनाव लड़ने का फ़ैसला
बहरहाल इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस फ़ैसले का नतीजा ये रहा कि इंदिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा कर दी और विपक्ष के सभी नेताओं को जिसमें राज नारायण भी शामिल थे, गिरफ़्तार कर लिया गया.
जब 1977 के चुनाव की घोषणा के बाद, 19 महीनों बाद राज नारायण कि रिहाई हुई तो उन्होंने तय किया कि वो इंदिरा गांधी के ख़िलाफ़ फिर चुनाव लड़ेंगे.
उस समय राज नारायण के सहयोगी रहे राज कुमार जैन याद करते हैं, "राज नारायणजी मीसा में हिसार जेल में बंद थे. इत्तेफ़ाक से मैं भी उस समय हिसार जेल में बंद था. मेरा मीसा का रिलीज़ ऑर्डर राज नारायण से पहले आ गया. चलते वक्त उन्होंने मुझे तीन लोगों के लिए पत्र दिए. एक तो थे चंद्रशेखर और दूसरे थे अटल बिहारी वाजपेई. तीसरे का नाम मैं भूल रहा हूँ. इस पत्र में लिखा था कि उन्हें इंदिरा गाँधी के ख़िलाफ़ ज़रूर चुनाव में खड़ा होना है, क्योंकि मैं तो जेल में पड़ा हूँ. मैं चंद्रशेखर के पास गया."
"अटलजी के भी पास गया. वो राज नारायण का संदेश सुन हंस पड़े. उस समय हर कोई एक सुरक्षित सीट की तलाश में था. कोई इस बात को नहीँ सोच सकता था कि कोई इंदिरा गांधी के ख़िलाफ़ भी चुनाव जीत जाएगा. लेकिन राज नारायण ने मन बना रखा था कि अगर उन्हों जेल से छोड़ दिया जाता है तो वो इंदिरा गांधी के ख़िलाफ़ फिर से चुनाव लड़ेंगे."

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समर्थकों को भी नहीं था यकीन कि राज नारायण जीतेंगे
1977 के चुनाव में आपातकाल की ज़्यादतियों और जबरन नसबंदी के कारण फ़िज़ा इंदिरा गांधी के ख़िलाफ़ बन गई थी, लेकिन कोई ये कल्पना नहीं कर रहा था कि इंदिरा गांधी ख़ुद अपना चुनाव हार जाएंगीं.
राज कुमार जैन बताते हैं, "जामा मस्जिद की जो मीटिंग हुई थी जिसमें इमाम और बाबू जगजीवन राम आए थे. उसमें जिस तरह का हुजूम उमड़ा, जिधर भी देखो लोग ही लोग दिखाई देते थे, उससे लगा कि किला तो अब फ़तह है."
"लेकिन फिर भी राज नारायण वाले चुनाव में लग रहा था कि वो तो इंदिरा गांधी है, उसके पास तो सारी ताक़त है. ये तो लग रहा था कि हमारी लड़ाई बराबर की है लेकिन दावे से ये इलहाम नहीं था कि राज नारायण जीत भी सकते हैं."
स्वास्थ्य मंत्री के पद से बर्ख़ास्तगी
बहरहाल राज नारायण चुनाव जीते. मोरारजी देसाई के जनता मंत्रिमंडल में उन्हें स्वास्थ्य मंत्री बनाया गया. लेकिन एक साल के भीतर ही मोरारजी देसाई ने उन्हें अपने मंत्रिमंडल से हटा दिया.
सुधींद्र भदोरिया बताते हैं, "कहीं कोई गड़बड़ हो रही हो, उसका विरोध करने के लिए तो राज नारायण बहुत बढ़िया व्यक्ति थे. पर सरकार चलाना उनके बस का नहीं था, सरकार चलाने के कुछ नियम होते हैं, मर्यादाएं होती हैं, क़ायदे क़ानून होते हैं. राज नारायण में क़ायदे क़ानून नाम की कोई चीज़ नहीं थी. अन्याय के ख़िलाफ़ ज़रूर एक बुलंद आवाज़ थी राज नारायण की लेकिन सरकार चलाने में जिस अनुशासन की दरकार होती है वो राज नारायण में थी ही नहीं."
"हालांकि स्वास्थ्य मंत्री के तौर पर उन्होंने एक बड़ा एतिहासिक फ़ैसला किया था. जिनको उस ज़माने में झोला डॉक्टर या 'बेयर फ़ुट' डॉक्टर कहा जाता था, उनके लिए उन्होंने बहुत काम किया. उन्होंने स्वास्थ्य सेवाओं को आम लोगों तक पहुंचाने की कोशिश की जिसमें वो बहुत हद तक सफल भी रहे."

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स्वास्थ्य मंत्रालय के अधिकारियों के साथ बैठक
1977 में मशहूर लेखक वेद मेहता ने राज नारायण का एक इंटरव्यू लिया था जो मशहूर अमरीकी पत्रिका 'न्यूयॉर्कर' के 17 अक्तूबर, 1977 के अंक में छपा भी था.
इसमें मेहता ने राज नारायण से जुड़ा एक मज़ेदार किस्सा लिखा था. हुआ ये कि एक दिन राज नारायण ने अपने मंत्रालय के चोटी के अधिकारियों को बुला कर पूछा कि तुमने किसके आदेश पर अपने भाइयों की नसबंदी करवाई? अफ़सरों ने जवाब दिया, "सर आपको पता है कि किसका आदेश था."
राजनरायण बोले, "मुझे वो काग़ज़ दिखाइए जिस पर वो आदेश लिखा हुआ था." जवाब आया कि उन्हें कोई लिखित आदेश नहीं था. फिर राज नारायण ने हर अधिकारी को एक एक पत्थर दिया. अपने एक क्लर्क को कमरे के बीचोंबीच खड़ा किया और चिल्ला कर बोले, "मैं तुम्हें आदेश देता हूँ कि इस क्लर्क को पत्थर मारो."
कोई अपनी जगह से नहीं हिला. राज नारायण ने कहा, "मैंने आपको इस शख़्स पर पत्थर फेंकने के लिए कहा और आप अपनी जगह से हिले नहीं लेकिन जब उस महिला ने आदेश दिया तो आपको अपने भाइयों की नसबंदी करवाने में कोई हिचकिचाहट नहीं हुई."

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शिमला में भाषण बना बर्ख़ास्तगी का कारण
मोरारजी देसाई के राज नारायण को हटाने के जो भी कारण रहे हों, लेकिन राज नारायण कैंप का मानना था कि आरएसएस और दोहरी सदस्यता पर उनके रुख़ ने देसाई मंत्रिमंडल से उनकी रुख़सती सुनिश्चित की.
हालांकि बहाना ये बनाया गया कि शिमला में उन्होंने ऐसे स्थान पर जनसभा को संबोधित किया, जहाँ सभा करना वर्जित था.
राज कुमार जैन याद करते हैं हैं, "युवा जनता का हमारा कैंप था शिमला में. उसमें राज नारायणजी को आना था. हमने शिमला के रिज मैदान पर मीटिंग रखी थी. हमारे एक साथी होते थे मार्कंडेय सिंह जो अब इस दुनिया में नहीं हैं, वो इसके लिए एक आवेदन ले कर डीएम के पास गए. उन्होंने उस आवेदन को अपने दफ़्तर में रखवा दिया. उस समय शांता कुमार हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री थे."
"जलसे से कुछ समय पहले जब हम वहाँ तैयारी के लिए गए तो वहाँ के कलक्टर ने आ कर कहा कि रिज मैदान पर जलसा करने की इजाज़त नहीं है. ये प्रतिबंधित क्षेत्र है. हम लोगों ने कहा कि यहाँ तो अटल बिहारी वाजपेई की सभा हुई है. इस पर वो बोले कि उनकी बात अलग है. बहरहाल हम लोगों ने ज़बरदस्ती रिज मैदान पर जहाँ एक छतरी सी बनी होती थी, वहाँ अपना लाउड स्पीकर लगा दिया. बारिश हो रही थी. नीचे हमारे लोग खड़े थे. कुछ सैलानी भी इकट्ठा हो गए थे. उस दिन मंच का संचालन मैं ही कर रहा था."
"मैंने कहा कि आज मंत्री राज नारायण और साथी राज नारायण की परीक्षा है. पीछे बैठे राज नारायण ने हँसते हुए कहा कि अच्छा तो हम मंत्री बन गए. फिर वो अपने बिल्कुल समाजवादी रूप में आ गए. उन्होंने कहा हे शांता कुमार और फिर उन्होंने अपनी तक़रीर शुरू कर दी."
"उस मीटिंग का बहाना बना कर राज नारायण को कैबिनेट से निकाला गया. हालांकि इसके पीछे वजह दूसरी थी. राज नारायण और मधु लिमिये दो ऐसे राजनेता थे जिन्होंने दोहरी सदस्यता का सवाल उठा दिया था. जिस तरह से जनता पार्टी पर जनसंघ गुट काबिज़ हो रहा था, इन्होंने कहा, ये नहीं चलेगा."

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चरण सिंह को प्रधानमंत्री बनाने की मुहिम
मंत्रिमंडल से निकाले जाने के बाद राज नारायण ने जनता पार्टी को तोड़ने और मोरारजी देसाई की जगह चरण सिंह को प्रधानमंत्री बनाने का बीड़ा उठा लिया. इस मुहिम में उन्होंने संजय गांधी का भी सहयोग लेने से गुरेज़ नहीं किया.
पुपुल जयकर ने इंदिरा गांधी की जीवनी में लिखा, "संजय गांधी ने राज नारायण के साथ अपनी कई मुलाकातों में उन्हें कई तरीके सुझाए थे जिससे उनके नेता चरण सिंह प्रधानमंत्री बन सकते थे. राज नारायण के एक नज़दीकी दोस्त ने मुझे यहाँ तक बताया कि संजय ने उनसे ये भी कहा कि आप ख़ुद प्रधानमंत्री बनने के लायक़ हैं. लेकिन राज नारायण इस चाल में नहीं फंसे. अपना सिर हिलाते हुए उन्होंने संजय से कहा, 'मैं तो हमेशा रहूंगा, लेकिन इस समय चरण सिंह को प्रधानमंत्री बन जाने दो.'"
"इसके बाद उन्होंने कोई न कोई बहाना ले कर मोरारजी देसाई पर हमले करने शुरू कर दिए. उन्होंने उन पर भ्रष्टाचार और भाई भतीजावाद के आरोप लगाए. चरण सिंह की पार्टी में एक बहुत बड़ी लॉबी थी जो जनसंघ के बहुत ख़िलाफ़ थी. उनको ये बात पच नहीं रही थी कि जनसंघ और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का रिश्ता पहले की तरह बरक़रार था. जनता पार्टी को तोड़ने की पूरी भूमिका तैयार हो चुकी थी."

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कमलापति त्रिपाठी से माँगा आशीर्वाद
जनता पार्टी टूटी और 1980 में इंदिरा गांधी फिर सत्ता में आईं. राज नारायण ने 1980 का चुनाव वाराणसी में कमलापति त्रिपाठी के ख़िलाफ़ लड़ा.
प्रोफ़ेसर आनंद कुमार याद करते हैं, "राज नारायण और कमलापति त्रिपाठी दोनों अपने नेताओं द्वारा चुनाव में ढ़केले गए थे. राज नारायणजी बनारस से चुनाव लड़ना नहीं चाहते थे. चरण सिंह के लोगों ने ज़िद की कि वो वहाँ से चुनाव लड़ें. वो सीट समाजवादियों ने ही ग़ैर सवर्ण सीट बना रखी थी. दूसरी तरफ़ कमलापतिजी भी इंदिरा गांधी के ख़ास समूह के प्रति असहज थे, क्योंकि वो निकले थे कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी से. वो आचार्य नरेंद्र देव के विद्यार्थी थे. काशी विद्यापीठ के छात्र थे. बाद में उसके भी चांसलर बने."
"जब ये दोनों आमने सामने हुए तो किस्सों में किस्से जुड़ते चले गए. एक किस्सा बहुत मशहूर है कि राज नारायणजी जब अपना पर्चा भरने जा रहे थे तो वो कमलापतिजी के यहाँ गए और बोले, पंडितजी प्रणाम करने आया हूँ. आपका आशीर्वाद लेने आया हूँ. पर्चा भरने का पैसा मुझे आपसे ही लेना है. मैं आपके गुरु आचार्य नरेंद्र देव का शिष्य रहा हूँ. अब हम दोनों आमने सामने हैं. कोशिश यही करूंगा कि मेरी तरफ़ से आपकी मर्यादा का कोई हनन न हो."
"कहते हैं कि कमलापतिजी ने भी उन्हें आशीर्वाद दिया और कहा कि चुनाव तो चुनाव होता है. इससे कोई बनता बिगड़ता नहीं है. हमारा तुम्हारा संबंध तो भारत छोड़ो आंदोलन के ज़माने से रहा है. हम लोगों की पार्टियाँ भले ही अलग अलग हों, लेकिन उनका मूल एक ही है."

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पुत्र और पत्नी से कोई मोह नहीं
राज नारायण का विद्रोही स्वभाव होने के बावजूद उन्होंने सार्वजनिक जीवन में परिवार से मोह को ताक पर रखने की जो मिसाल कायम की, उसका उदाहरण बहुत कम जगह मिलता है.
मशहूर पत्रकार सुनील सेठी ने इंडिया टुडे के 31 अगस्त, 1979 के अंक में 'द इम्पॉरटेंस ऑफ़ बींग राज नारायण' लेख में लिखा, "परिवार के प्रति उनका लगाव इतना कम है कि उन्हें याद ही नहीं कि उन्होंने आख़िरी बार अपनी पत्नी को कब देखा था. वो अपने बच्चों की शादी में भी नहीं गए. उनका सबसे छोटा बेटा ओमप्रकाश अपने पिता के रेसकोर्स रोड वाले बंगले (जिसमें आजकल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रहते हैं) के पिछवाड़े एक छोटे से कमरे में रहता है."
"राज नारायण के एक इलाहाबाद के साथी लक्ष्मी भूषण वार्ष्णेय ने मुझे बताया कि हाल में जब ओम प्रकाश एक मामूली काम के लिए अपने पिता के पास गए तो उन्होंने उनसे गुस्से में कहा, 'तुम अभी भी यहाँ घूम रहे हो.' फिर उन्होंने अपने एक पार्टी कार्यकर्ता से कहा कि 'इनको फ़ौरन घर से बाहर करो, इनके सामान सहित.' उनके एक और साथी ने मुझे बताया कि 1977 में चुनाव जीतने के बाद जब उनकी पत्नी को उनके पास लाया गया तो उन्होंने उनकी तरफ़ देख कर पूछा, 'ये कौन हैं'?"

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खानेपीने के शौकीन
राज नारायण को अपने घर में लोगों का दरबार लगाने का शौक था और उनके हाथ में अक्सर बनारस के लड्डुओं और पेड़ों का डिब्बा रहा करता था. मैंने सुधींद्र भदोरिया से पूछा कि क्या राज नारायण खाने-पीने के शौकीन थे?
भदोरिया का जवाब था, "बेहद शौकीन. उन्हें मिठाई भी बहुत पसंद थी और नॉन वेजेटेरियन खाना भी. मुझे याद है कि राज नारायणजी और लोहियाजी जब भी हमारे यहाँ आते थे, वो हमारे पिताजी से कहते थे कमांडर भाई हमें सोहन पपड़ी खिलवाओ. एक बार हम लोग पीलू मोदी के घर गए. शाम का 6 बजा होगा."
"पीलू मोदी ने औपचारिकतावश पूछा कि आप चाय पिएंगे? राज नारायण ने कहा अब तो भोजन का समय हो रहा है और तुम चाय की बात कर रहे हो. पीलू मोदी का घर ख़ान मार्केट के पास था. उन्होंने तत्काल वहाँ से भोजन मंगवाया और हम लोगों ने छक कर खाना खाया."

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डोरीलालजी के यहाँ पराठे
भदोरिया आगे बताते हैं, "एक मशहूर अख़बार है अमर उजाला. उसके मालिक हुआ करते थे डोरीलाल अग्रवाल. एक बार हम लोग सभा करते हुए दिल्ली से आगरा गए. जब हम वहाँ पहुंचे तो रात के साढ़े बारह बज चुके थे. राज नारायणजी ने कहा कि डोरीलाल अग्रवाल के घर चलो. रात साढ़े बारह बजे डोरी लाल अग्रवाल को उठाया गया."
"उन्होंने राजनारायण की कुशल क्षेम पूछी. राज नारायण से जवाब देने के बजाए कहा, पहले भोजन तो करवाओ. रात को हम सब लोगों के लिए पराठे बनवाए गए. हम सब ने उन्हें बहुत चाव से खाया, और हम सब से ज़्यादा राज नारायणजी ने खाया."

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राज नारायण को फ़ोन पर डाँटना
सत्ता से बाहर रहने के वावजूद लोगों का काम करवाने में राज नारायण कभी पीछे नहीं रहते थे.
प्रोफ़ेसर आनंद कुमार याद करते हैं, "उनका एक अंदाज़ और भी था जो आज के राजनीतिक कार्यकर्ताओं के लिए एक पाठ है. अगर कोई टेढ़ा काम रहता था और जिलाधिकारी या मंत्री उसे नहीं कर रहा होता था और कार्यकर्ता बहुत परेशान हो जाते थे और आख़िरी दरवाज़ा मान कर राज नारायण के पास आते थे, तो राज नारायणजी पहले उसका फ़ोन मिलवाते थे और अपने सचिव या हम जैसे लोगों से कहते थे कि उनसे कहो कि राज नारायणजी अभी लाइन पर आने वाले हैं."
"फिर वो थोड़ी देर के लिए बहुत ज़ोर-ज़ोर से सामने वाले को डाँटा करते थे किसी मामूली मुद्दे को ले कर और फिर वो फ़ोन पकड़ लेते थे. उधर फ़ोन सुन रहा आदमी नेताजी की डाँट सुन कर पहले से ही घबरा जाता था. वो उनसे पूछता था क्या बात हो गई आप बहुत नाराज़ हैं? राज नारायणजी कहते थे ये बहुत नालायक है. मेरी बात नहीं सुनता है. फिर वो कहते थे कलक्टर साहब मैंने आपको फ़ोन इसलिए किया कि ये हमारे ग़रीब कार्यकर्ता हैं. इनकी ज़मीन पर गुंडों ने कब्ज़ा कर लिया है."
"आपका हुक्म इस शहर में चलता है या नहीं चलता है? वो पूछते थे कि नेताजी क्या करना है? वो कहते थे कि आप जानते हैं कि मैं किसी की पैरवी नहीं करता, लेकिन मुझे नाइंसाफ़ी से बेहद गुस्सा आता है. आपके रहते मुझे यकीन है कि नाइंसाफ़ी नहीं होगी. कलक्टर उनसे कहता था कि उन साहब को तुरंत मेरे पास भेजिए. सामाजिक सेवा करने का उनका ये अंदाज़ अफ़सरों को भी पता था और नेताओं को भी. इसलिए कोई उसका बुरा भी नहीं मानता था."

अमीर की शॉल ग़रीब को
अपने कार्यकर्ताओं के लिए राज नारायण कुछ भी करने को तैयार रहते थे और यही कारण था कि उनके कार्यकर्ता भी उन पर जान छिड़कते थे.
राज कुमार जैन याद करते हैं, "सर्दी के दौरान अगर कोई राज नारायण की बैठक में जाए और वहाँ पैसे वाला शॉल दोशाला ओढ़ कर पहुंच जाए और सामने उनका ग़रीब कार्यकर्ता फटे कपड़े में बैठा हो तो नेताजी उस पैसे वाले से कहते बहुत सर्दी लग रही है तुम्हें."
"बहुत कपड़े पहने हुए हो और उसकी शॉल खीच लेते थे और कार्यकर्ता की तरफ़ फेंक कर कहते थे जाओ ले जाओ इसे. ये जो अपने कार्यकर्ता के लिए उनके मन में जो मर्म था, इसके लिए कार्यकर्ता भी उनके लिए कुछ भी करने को तैयार रहते थे."
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