वर्ष 2019: हिंदू राष्ट्र के एजेंडे को जारी रखने का साल

    • Author, ज़ुबैर अहमद
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता दिल्ली 

साल 2019 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी भारतीय जनता पार्टी के लिए विडंबनाओं से भरा रहा है.

एक तरफ़, इस साल उन्हें चुनाव में सबसे भारी पब्लिक मैंडेट मिला तो दूसरी तरफ़, साल के अंत में उनकी साढ़े पांच साल पुरानी सरकार को नागरिकता संशोधन क़ानून के विरोध के रूप में सबसे बड़ा झटका लगा.

आने वाले साल में देश भर में विवादास्पद नागरिकता क़ानून की ज़बरदस्त मुख़ालफ़त जगह-जगह प्रदर्शनों की शक्ल में जारी रहने की पूरी संभावना है.

प्रधानमंत्री के लिए अगला साल भी चुनौतियों से भरा हो सकता है.

विश्लेषक कहते हैं कि वर्ष 2019 को बीजेपी सरकार द्वारा अपने हिंदू राष्ट्रवाद के एजेंडे को अमली जामा पहनाने का साल माना जाएगा.

पिछले पांच सालों में इसके लिए राह हमवार किया गया और अब इस पर अमल क्या जा रहा है. 

हिंदू राष्ट्र का एजेंडा

फ़िलहाल मोदी सरकार थोड़ा बैकफुट पर नज़र ज़रूर आती है जिसका एहसास प्रधानमंत्री के 22 दिसंबर को दिल्ली में दिए उनके भाषण से होता है.

लेकिन अधिकतर विश्लेषक मानते हैं कि साल 2020 भी हिन्दू राष्ट्र के एजेंडे को जारी रखने का साल साबित हो सकता है जिन में यूनिफॉर्म सिविल कोड और धर्म परिवर्तन क़ानून लाने जैसे मुद्दे शामिल हो सकते हैं. इस साल जनता ने नरेंद्र मोदी को एक भारी मैंडेट देकर 'मोदी 2' के इरादों पर अपनी रज़ामंदी की मुहर लगाई.

इस सिलसिले में लखनऊ स्थित वरिष्ठ पत्रकार वीरेंद्र नाथ भट साल 2019 को एक महत्वपूर्ण साल मानते हैं. उनके विचार में मोदी सरकार और बीजेपी ने साल 2019 में देश की सियासत का 'डिफ़ॉल्ट रिसेट' करने का काम तेज़ी से शुरू कर दिया.

वो कहते हैं, "चाहे मामला तीन तलाक़ का हो या अनुच्छेद 370 को हटाए जाने का या अयोध्या केस में फैसला अपने पक्ष में आने का या फिर नागरिकता संशोधन क़ानून पारित कराने का, इन सभी क़दमों को डिफ़ॉल्ट रिसेट करने के परिपेक्ष्य में देखना चाहिए."

"संविधान का निर्माण भारत राष्ट्र के निर्माण का फ़ुल स्टॉप नहीं था. ये प्रक्रिया आज भी जारी है. बहुत सारे ऐसे अनसुलझे सवाल हैं जो हम ने मान लिया था कि वो हमेशा के लिए हल हो गए हैं. नरेंद्र मोदी के साढ़े पांच साल के कार्यकाल में हमने देखा कि भारतीय राजनीति, अर्थव्यवस्था और समाज में जो डिफ़ॉल्ट सेटिंग्स हैं, वो बदल रही हैं."

दक्षिणपंथी राजनीति

चंडीगढ़ स्थित राजनीतिक विश्लेषक डॉक्टर प्रमोद कुमार के मुताबिक़ साल 2019 दक्षिणपंथी राजनीति को देश की सियासत में अधिक वैधता, अधिक मान्यता और अधिक बल मिलने का साल रहा.

वो कहते हैं, "अनुच्छेद 370 का हटाया जाना, तीन तलाक़, नागरिकता संशोधन क़ानून और महाराष्ट्र में शिव सेना और कांग्रेस/राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की सरकार जैसी इस साल की घटनाएं ये दर्शाती हैं कि दक्षिणपंथी राजनीति को देश में अधिक बल मिला है और अधिक जगह मिली है." 

डॉक्टर कुमार का मानना है कि वर्ष 2019 राष्ट्रवाद का वर्ष था, जिसमें शांति के बजाय आक्रामकता राष्ट्रवाद का केंद्र बिंदु बन गई.

वो अपने तर्क को समझाने के लिए पुलवामा हमले के बाद बालाकोट सर्जिकल स्ट्राइक और पाकिस्तान के साथ बिगड़ते रिश्ते की मिसाल देते हैं.

"साल 2019 में तीन ऐसी घटनाएं हुई हैं जिनसे भारत की राजनीति और समाज में बदलाव आया. पहले वो घटनाएं थीं जिन्होंने हिंदुस्तान में राइट विंग पॉलिटिक्स को वैधता दी. आर्टिकल 370 का हटाया जाना और तीन तलाक़ के ख़िलाफ़ क़ानून लाने जैसी घटनाओं से दक्षिणपंथी सियासत को वैधता मिली. ये काफ़ी बड़ा बदलाव है."

सरकार की प्राथमिकता

डॉक्टर प्रमोद कुमार आगे कहते हैं, "दूसरा राष्ट्रवाद को पाकिस्तान के परिपेक्ष्य में बढ़ावा मिला. इसमें पुलवामा के बाद हुआ सर्जिकल स्ट्राइक शामिल है जिसने राष्ट्रवाद की परिभाषा बदली."

डॉक्टर कुमार के अनुसार अर्थव्यवस्था पर सभी बड़ी पार्टियों की ग़ायब होती असहमति भी साल 2019 की एकमात्र महत्वपूर्ण घटना रही जिसे सार्वजनिक तौर पर अधिक उजागर नहीं किया गया.

"असहमति केवल मामूली चीज़ों पर रह गई. पार्टियां केवल इस बात पर सहमत न हो सकीं कि जीएसटी कितना प्रतिशत कम करना चाहिए. आर्थिक मामलों में सियासी पार्टियों में जो सहमति थी उसने संस्थागत रूप ले लिया."

दिलचस्प सवाल ये है कि साल 2019 की सब से अहम घटना कौन थी जिसने देश की सियासत और समाज पर गहरा असर छोड़ा?

इसमें जनता की तरह देश के विशेषज्ञों की राय अलग-अलग है. एक नज़र हम इस साल की सब से प्रभावशाली घटनाओं पर नज़र डालते हैं और जानने की कोशिश करते हैं कि किस घटना ने देश की सियासत बदल दी या सरकार की प्राथमिकता बदल दी. 

पुलवामा आत्मघाती हमला 

आदिल डार नामी एक स्थानीय युवक ने 14 फरवरी को जम्मू श्रीनगर हाइवे पर सुरक्षा कर्मियों को ले जाने वाले वाहनों के एक क़ाफ़िले पर आत्मघाती हमला किया. इस हमले में केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल के 40 जवानों की मौत हुई.

डार का संबंध जैश-ए-मोहम्मद से बताया गया जिसके तार भारत सरकार के अनुसार पाकिस्तान की सरकार से जुड़े हुए हैं. 

पाकिस्तान स्थित जैश-ए-मोहम्मद ने हमले की ज़िम्मेदारी क़बूल की लेकिन पाकिस्तान सरकार ने भारत सरकार के इस इलज़ाम से इनकार किया कि हमले में इसका हाथ था.

26 फ़रवरी को भारतीय वायु सेना ने पाकिस्तान के अंदर बालाकोट में स्थित जैश के अड्डे पर हमला करके सैकड़ों मिलिटेंट्स को मारने का दावा किया.

पाकिस्तान ने अगले दिन जवाबी करवाई की जिसमें भारतीय वायु सेना का एक विमान मार गिराया गया जिसके पायलट विंग कमांडर अभिनंदन को पाकिस्तान ने हिरासत में ले लिया. अमरीका, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के हस्तक्षेप के बाद अभिनंदन को पाकिस्तान ने वापस भारत को लौटा दिया. 

सर्जिकल स्ट्राइक

फ़रवरी से पहले बीजेपी और दूसरे सियासी दल आम चुनाव के लिए प्रचार शुरू कर चुके थे.

कहा ये जा रहा था कि बीजेपी की हालत कुछ ठीक नहीं है.

कांग्रेस के फिर से जीवित होने की बात कही जा रही थी और कहा जा रहा कि सत्ता में उसकी वापसी भागीदार पार्टियों के साथ मिल कर हो सकती है. 

लेकिन पुलवामा हमले और सर्जिकल स्ट्राइक ने हालात बदल दिए और पब्लिक मूड पूरी तरह से बीजेपी सरकार के पक्ष में जाता दिखाई दिया. 

आम चुनाव 

अप्रैल-मई में हुए आम चुनाव में मोदी सरकार को सत्ता में लौटने के लिए भारी मैंडेट मिला. इसे मोदी 2 नाम दिया गया.

कुछ विशेषज्ञों के अनुसार चुनाव में मिला ये भारी बहुमत बीजेपी सरकार के लिए ये इशारा था कि वो अपना हिंदू राष्ट्र का एजेंडा आगे बढाएं.

बीजेपी के मैनिफेस्टो में तीन तलाक़ को ख़त्म करना, जम्मू और कश्मीर से आर्टिकल 370 को हटाना और अयोध्या में मंदिर के निर्माण को शुरू करना शामिल था.

अनुच्छेद 370 का खात्मा

पांच अगस्त को भारत सरकार ने संसद में नाटकीय तौर पर आर्टिकल 370 को ख़त्म करने और जम्मू-कश्मीर राज्य को दो केंद्रीय शासित राज्यों में बांटने की घोषणा करके सब को हैरान कर दिया.

इस बारे में मंत्रिमंडल के सीनियर सदस्यों को भी जानकारी नहीं थी. देश ने इस बारे में सब से पहले अमित शाह के संसद भाषण में सुना.

कश्मीर घाटी में लोगों को यक़ीन नहीं आया कि उनसे सलाह लिए बग़ैर सरकार ने इतना बड़ा फैसला ले लिया. हालाँकि कुछ दिन पहले से चर्चा थी कि कुछ बड़ा एलान होने वाला है. उसी दिन मैं कश्मीर पहुंचा.

एक कश्मीरी युवक ने कहा, "घाटी से विदेशी और स्थानीय पर्यटकों को निकाला जाना और 33,000 अतिरिक्त सुरक्षा कर्मियों को घाटी में तैनात करना इस बात की तरफ़ इशारा था कि कुछ तो होने वाला है लेकिन ये कि हमारे अधिकार छीन लेने का एलान होगा इसकी हमें उम्मीद नहीं थी."

अयूब डार नाम के एक शख्श जो उस समय दिल्ली से लौटे ही थे, कहने लगे, "भारत सरकार का ये क़दम कश्मीरियों की पीठ में छूरा भोंकने की तरह है. हम भारत से जुड़ने के बजाय और दूरी महसूस करने लगे हैं."

राजनीतिक प्रक्रिया

कश्मीरी नेताओं को नज़रबंद कर दिया गया, सियासी पार्टियों की गतिविधयों पर अंकुश लगाए गए और इंटरनेट और मोबाइल/लैंडलाइन फ़ोन सेवाएं बंद कर दी गईं. 

दूसरी तरफ़, इस पर देश भर में खुशियां मनाई गईं, लोग सड़कों पर आकर नाचने लगे. मगर विपक्ष ने सरकार के एकतरफ़ा फैसले पर कड़ी प्रतिक्रियाएं प्रकट कीं.

कुछ दिनों पहले बीबीसी उर्दू से राजनीतिक विश्लेषक भारत भूषण ने कहा कि कश्मीर पर ये क़दम आगे जाकर भारत के लिए भारी पड़ सकता है.

उनका कहना था, "ये एक राजनीतिक प्रक्रिया है. आखिर में आपको (भारत सरकार को) बातचीत का रास्ता अपनाना पड़ेगा. आपको पाकिस्तान से भी बातचीत करनी पड़ेगी और आपको कश्मीरियों से भी बातचीत करनी पड़ेगी."

पाकिस्तान ने इस फैसले पर कड़ा विरोध प्रकट किया. उसने इस मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र में भी उठाया लेकिन इससे मोदी सरकार के फैसले पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा.

मोदी सरकार का पक्ष ये है कि जम्मू और कश्मीर भारत का एक अटूट अंग है और आर्टिकल 370 को हटाना इसका अंदरूनी मामला है.

भारत सरकार का तो बल्कि अब ये कहना है कि पाकिस्तान के पास जो कश्मीर है वो भी भारत का अटूट हिस्सा है और अगर बात होनी है तो पाकिस्तान वाले कश्मीर पर होगी. 

लेकिन भारत भूषण के अनुसार, "जब तक दिल्ली में मोदी और अमित शाह की सरकार है, कुछ नहीं होने वाला है."

नागरिकों का राष्ट्रीय रजिस्टर या एनआरसी

सरकार ने 31 अगस्त को एनआरसी की फाइनल लिस्ट जारी की जिसमें 19 लाख लोगों के नाम थे यानी 19 लाख लोग भारत के नागरिक नहीं रहे.

इस पर असम में बवाल मच गया. एनआरसी में 19 लाख 'अवैध' शहरियों में से लगभग 13 लाख हिंदू थे.

बाद में केन्द्र सरकार ने हिन्दुओं को आश्वासन दिया कि उन्हें देश से नहीं निकाला जाएगा लेकिन असम के लोगों का इसके प्रति विरोध प्रदर्शन अब भी जारी है.

अयोध्या में मंदिर का मुद्दा 

सुप्रीम कोर्ट ने 9 नवंबर को अयोध्या में मंदिर-मस्जिद की मिलकियत पर अपना इतिहासिक फ़ैसला सुनाया.

फ़ैसले के अनुसार मंदिर बनाने के लिए कोर्ट ने मोदी सरकार को एक ट्रस्ट बनाने का आदेश दिया.

अदालत ने राज्य सरकार से कहा कि मुस्लिम पक्ष को एक मस्जिद के निर्माण के लिए पांच एकड़ ज़मीन दी जाए. 

इस तरह से दशकों से चले आ रहे इस विवादास्पद मुद्दे का अंत हुआ. इस फ़ैसले को विशेषज्ञ मोदी सरकार के पक्ष में गया एक निर्णय मान रहे हैं.

कहा जा रहा है कि इस फ़ैसले के बाद बीजेपी सरकार का मंदिर के निर्माण का वादा पूरा होता नज़र आता है. 

नागरिकता संशोधन क़ानून

इस क़ानून के पारित होने के बाद देश भर में इसका विरोध होने लगा और कई राज्यों में इस पर प्रदर्शन जारी हैं. इस क़ानून के आलोचक ये दावा कर रहे हैं कि ये संविधान के ख़िलाफ़ है और ये कि मुस्लिम समुदाय के ख़िलाफ़ भेदभाव की एक मिसाल है.

मुस्लिम समुदाय के लोग भी सड़कों पर निकल आये हैं और उनका साथ हिन्दू और दूसरे समुदाय के लोग भी शामिल हैं. प्रदर्शन के दौरान भड़की हिंसा में अब तक 18 लोगों की जानें जा चुकी हैं.

प्रदर्शन के दौरान ही केंद्र सरकार ने नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर यानी एनपीआर को अपडेट करने और जनगणना 2021 की शुरुआत करने को मंज़ूरी दे दी है. इसपर भी विवाद शुरू हो गया है और कुछ लोगों का कहना है कि ये देशभर में एनआरसी लाने का पहला क़दम है. 

दिल्ली विश्वविद्यालय में एक विरोध सभा को संबोधित करते हुए एक्टविस्ट और लेखक अरुंधति रॉय ने दावा किया कि नेशनल रजिस्टर ऑफ़ सिटिज़न्स (NRC) देश के मुसलमानों को निशाना बनाएगा. लेकिन गृह मंत्री अमित शाह ने इस दावे को ख़ारिज किया है. 

मोदी सरकार

साल का अंत हो रहा है मोदी सरकार के ख़िलाफ़ देश भर में प्रदर्शन और सियासी विरोध से.

लेकिन मोदी सरकार ने ऐसे कोई संकेत नहीं दिए हैं कि वो अपने एजेंडे को छोड़ देगी.

बल्कि वीरेंद्र नाथ भट के अनुसार साल 2020 में सरकार यूनिफॉर्म सिविल कोड और धर्म परिवर्तन संबंधित बिल संसद में पारित कराने की कोशिश कर सकती है.

भट और दूसरे वरिष्ठ राजनितिक विश्लेषकों के अनुसार अगला साल अर्थव्यवस्था मोदी सरकार की असल चुनौती होगी और यही अगले वर्ष की सियासत को डिफाइन करेगा.

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