मक़बूल बट्ट को फांसी क्या भारतीय राजनयिक की हत्या का बदला थी?

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- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
कश्मीरी अलगाववादी नेता मक़बूल बट को आज से 37 साल पहले 11 फ़रवरी, 1984 को मौत की सज़ा सुनाई गई थी. उन पर रेहान फ़ज़ल का ये लेख एक बार फिर से पाठकों के लिए प्रस्तुत है. ये लेख पहली बार दिसंबर 2019 में प्रकाशित किया गया था.
मक़बूल बट्ट फ़ैज़ अहमद 'फ़ैज़' का लिखा ये शेर अक्सर पढ़ा करते थे...
जिस धज से कोई मक़तल में गया वो शान सलामत रहती है
ये जान तो आनी जानी है, इस जान की तो कोई बात नहीं
तिहाड़ जेल के जेलर सुनील गुप्ता के लिए मक़बूल बट्ट कश्मीर के एक पृथकतावादी नेता नहीं, बल्कि एक उच्च कोटि के बौद्धिक शख़्स थे जिनके साथ वो अपनी अंग्रेज़ी बेहतर करने का अभ्यास किया करते थे.
'ब्लैक वॉरंट कन्फेसंस ऑफ़ अ तिहाड़ जेलर' के लेखक सुनील गुप्ता याद करते हैं, "जब मैंने मक़बूल बट्ट को पहली बार देखा तब तक वो तिहाड़ के क़ैदियों के बीच बहुत मशहूर हो चुके थे. किसी को अगर कोई दिक्कत होती थी और अगर किसी को जेल के सुपरिंटेंडेंट ने कोई मेमो दिया होता था तो उसका जवाब बनाने के लिए कैदी या तो चार्ल्स शोभराज के पास आते थे या मक़बूल बट्ट के पास."
जेल में नहीं मिला एकांतवास
सुनील गुप्ता ने बताया, "उनकी पूरी शख़्सियत में एक ख़ास किस्म की सौम्यता थी. उनका शफ़्फ़ाक गोरा चेहरा था और वो हमेशा खादी का सफ़ेद कुर्ता पाजामा पहना करते थे. हालांकि वो मुझसे उम्र में बड़े थे, लेकिन जब भी मैं उसके सेल में जाता था, वो उठ कर खड़े हो जाते थे. जेल में कोई भी कैदी आता है, चाहे उसने जितना भी जघन्य अपराध किया हो, कुछ दिनों के बाद हमें वो अपने परिवार का हिस्सा लगने लगता है."
"ज़्यादातर कैदियों के साथ हमारे दोस्ताना संबंध बन जाते हैं. इनके साथ तो हमारे ख़ास संबंध बन गए थे. हम जब भी इनके पास जाते थे, वो बहुत अच्छी तरह से हमारे साथ बात करते थे. हालांकि मेरी पूरी शिक्षा अंग्रेज़ी माध्यम में हुई लेकिन फिर भी मुझे अंग्रेज़ी बोलने में झिझक सी होती थी. मक़बूल ने ही मुझे सबसे पहले बताया कि कैसे इस कमी पर जीत हासिल की जा सकती है."
"वो मुझे बताया करते थे कि अगर आपको हिंदी आती है तो अंग्रेज़ी उसकी तुलना में सरल भाषा है. उनके बेहतरीन व्यवहार के कारण ही मौत की सज़ा पाने के बावजूद उन्हें एकांतवास में नहीं रखा गया था."

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सीआईडी इंसपेक्टर की हत्या के आरोप में फाँसी
साल 1966 में सीआईडी इंस्पेक्टर अमर चंद की हत्या के मामले में मक़बूल बट्ट को फाँसी की सज़ा सुनाई गई थी.
कहा जाता है कि जब उनको वो सज़ा सुनाई गई तो उन्होंने मजिस्ट्रेट से भरी अदालत में कहा था, "जज साहब वो रस्सी अभी तक बनी नहीं जो मक़बूल को फाँसी लगा सके."
इस फैसले के 4 महीने बाद ही बट्ट ने जेल में 38 फ़ीट लंबी सुरंग खोदी थी और वो दो सप्ताह तक लगातार पैदल चलते हुए पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर भाग निकले थे.
वहाँ आठ साल बिताने के बाद वो दोबारा भारतीय कश्मीर लौटे थे और उन्होंने अपने साथियों के साथ हिंडवारा, बारामूला में एक बैंक लूटा था और बैंक मैनेजर की हत्या कर दी थी.

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1971 में भारतीय विमान की हाईजैकिंग में भूमिका
साल 1971 में इंडियन एयरलाइंस के विमान 'गंगा' को पाकिस्तान 'हाईजैक' कर ले जाने की योजना भी उन्हीं की दिमाग़ की उपज थी.
बीबीसी ने उस हाईजैकिंग को अंजाम देने वाले और इस समय श्रीनगर में रह रहे हाशिम क़ुरैशी से पूछा कि इस वारदात में मक़बूल बट्ट का क्या रोल था ?
हाशिम कुरैशी का जवाब था, "उसमें मक़बूल बट्ट का ही तो रोल था. उन्होंने स्पेशल कोर्ट में अपने बयान में साफ़ कहा कि उन्होंने कोई साज़िश नहीं की. हम अपनी क़ौमी आज़ादी की जंग लड़ रहे हैं और ये हमने इसलिए किया ताकि कश्मीर की तरफ़ दुनिया का ध्यान जाए."
"मैं आपको 1970 का वाक़या सुनाता हूँ. हुआ ये कि हम डॉक्टर फ़ारूख हैदर की डायनिंग टेबल पर बैठे हुए थे. अचानक ख़बर आई कि इरीट्रिया के दो चरमपंथियों ने कराची में इथोपिया के एक जहाज़ पर फ़ायरिंग कर उसे नुक़सान पहुंचाया है. मक़बूल ने जैसे ही ये सुना, वो छलांग मार कर उठ खड़े हुए और बोले हमें भी ऐसा ही करना चाहिए."
"गंगा हाइजैकिंग की असली मंसूबाबंदी यहीं से शुरू हुई. कुछ दिनों बाद बट्ट साब ने कहा कि अगर हम आपको जहाज़ अग़वा करने की ट्रेनिंग दें, तो क्या आप उसे अंजाम दे पाएंगे? मैंने उनसे कहा कि मैं हर चीज़ करने के लिए तैयार हूँ."

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गुटनिरपेक्ष सम्मेलन के दौरान धमकी
साल 1981 में भारत में हो रहे गुटनिरपेक्ष शिखर सम्मेलन के दौरान दिल्ली में बीबीसी संवाददाता मार्क टली को फ़ोन पर एक अज्ञात व्यक्ति ने बताया कि उसने विज्ञान भवन और अशोका होटल में बम लगा दिए हैं और अगर मक़बूल बट्ट को तुरंत रिहा नहीं किया जाता तो इन भवनों को उड़ा दिया जाएगा.
इससे एक दिन पहले क्यूबाई दूतावास के लिफ़ाफ़ों में इसी तरह की धमकी सम्मेलन में भाग लेने वालों राजनयिकों को भी भेजी गई थी.
बीबीसी ने इस ख़बर का प्रसारण नहीं किया और सरकारी एजेंसियों को इसकी सूचना दे दी.
नतीजा ये हुआ कि तिहाड़ में मक़बूल बट्ट की सुरक्षा बढ़ा दी गई और उन पर कड़ी नज़र रखी जाने लगी.

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ब्रिटेन में भारतीय राजनयिक की हत्या
साल 1984 में ब्रिटेन में भारत के राजनयिक रवींद्र म्हात्रे का पहले जेकेएलएफ़ ने अपहरण किया और उनको छोड़ने के बदले मक़बूल बट्ट की रिहाई की माँग की.
जब भारत सरकार ने उन्हें रिहा नहीं किया तो उन्होंने म्हात्रे की हत्या कर दी. भारत सरकार ने रातों-रात मक़बूल बट्ट को फाँसी पर चढ़ाने का फ़ौसला लिया.
मैंने 'ब्लैक वॉरंट कन्फेसंस ऑफ़ अ तिहाड़ जेलर' की सह लेखिका सुनेत्रा चौधरी से पूछा कि अगर रवींद्र म्हात्रे की हत्या नहीं की जाती तो मक़बूल बट्ट को फाँसी पर नहीं चढ़ाया जाता?
सुनेत्रा का कहना था, "उस समय तो बिल्कुल नहीं होती. हर रूल बुक में लिखा हुआ है कि उनकी आख़िरी इच्छा और परिवार से उनकी आख़िरी मुलाकात होनी चाहिए. लेकिन उन्हें अपने भाई से भी नहीं मिलने दिया गया. जब वो श्रीनगर से दिल्ली आ रहे थे तो उन्हें हवाई अड्डे पर ही हिरासत में ले लिया गया."
"मक़बूल बट्ट को पता था कि उनके साथ ये होने वाला है क्योंकि भारत सरकार को दिखाना था कि वो राजनीतिक रूप से कुछ कर रही है. वो तिहाड़ में एक दूसरे केस में मौत की सज़ा काट रहे थे, लेकिन इस केस से उनका कोई लेना-देना नहीं था."

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फाँसी पर कई सवाल
मक़बूल बट्ट को जिस तरह से फाँसी दी गई, उस पर भी कई सवाल उठे.
मक़बूल बट्ट के वकील रहे आरएम तुफ़ैल कहते हैं कि निचली अदालत में जब सज़ा-ए-मौत दी जाती है तो सरकार ही इसके अनुमोदन के लिए हाई कोर्ट में अपील करती है कि आप या तो इसकी पुष्टि करें या इसको ख़ारिज कर दें.
"हमने जब सुप्रीम कोर्ट में अपील की तो हमारे पास फाँसी की सज़ा का हाईकोर्ट की तरफ़ से पुष्टि का कोई आदेश नहीं था. मैं पूरी ज़िम्मेदारी से ये कह रहा हूँ कि मक़बूल की सज़ाए मौत को हाई कोर्ट ने 'इनडोर्स' नहीं किया था."

'डेथ रेफ़ेरेंस' पर जज के दस्तख़त नहीं
तुफ़ैल आगे बताते हैं, "जब हमने जस्टिस चंद्रचूड़ से ये सवाल किया तो शासन ने हरे रंग का दो या तीन पेज का बिना दस्तख़त का एक कागज़ पेश कर कह दिया कि हाई कोर्ट ने इसकी पुष्टि कर दी है. जस्टिस मुर्तज़ा फ़ज़ल अली ने इसकी पुष्टि की हुई है."
"जस्टिस फ़ज़ल अली पहले जम्मू और कश्मीर हाईकोर्ट के चीफ़ जस्टिस होते थे और सुप्रीम कोर्ट में कुछ समय काम करने के बाद वहाँ से भी रिटायर हो चुके थे. इस पूरी प्रक्रिया का एक भी गवाह नहीं था. उस समय जस्टिस चंद्रचूड़ के मुंह से जो अलफ़ाज़ निकले, उसने मुझे आज तक झिंझोड़ कर रखा हुआ है."
"उन्होंने कहा कि उन्होंने हाई कोर्ट जज के तौर पर उन्होंने कभी भी डेथ 'रेफ़रेंस' पर दस्तख़त नहीं किए. उनका कहने का मतलब ये था कि अगर उस दस्तावेज़ पर मुर्तज़ा फ़ज़ल अली का दस्तख़त नहीं है तो इससे कोई ख़ास फ़र्क नहीं पड़ता. लेकिन वो भूल गए कि इस तरह के आदेशों पर दो जजों की सहमति ज़रूरी होती है. मर्डर रेफ़रेंस के लिए हाई कोर्ट की डिवीज़न बेंच बैठती है. उन्होंने हमारी एसएलपी स्वीकार करने से इनकार कर दिया."

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जेकेएलएफ़ के दुस्साहस की सज़ा बट्ट को
मक़बूल भट्ट का पृथकतावादी हिंसा में भले ही हाथ रहा हो लेकिन रवींद्र म्हात्रे हत्याकांड से सीधे तौर पर उनका कोई लेना-देना नहीं था.
हाशिम कुरैशी बताते हैं, "मैं समझता हूँ कि जेकेएलएफ़ ने हमेशा 'एडवेंचेरिज़्म' किया. मेरी नज़र में म्हात्रे बेगुनाह मारा गया. मैंने उसकी हमेशा मज़म्मत की है. उनके बदले में उन्हें मक़बूल बट्ट जैसे आदमी को नहीं देना चाहिए था. आपने 13 आदमी इसमें लगा दिए. ये पूरी तरह से अमानउल्लाह का ऑपरेशन था."
"मक़बूल बट्ट ने कहा था कि उन्हें उस जुर्म में सज़ा-ए-मौत दी जा रही है जो मेरी जेल कोठरी से 7000 मील दूर हुआ था और उसमें मेरा कोई हाथ नहीं था. ये मक़बूल बट्ट के आख़िरी शब्द थे. मक़बूल बट्ट की जो फाँसी थी, वो सीधा सीधा भारत का बदला था. सुप्रीम कोर्ट ने इस केस को सुना ही नहीं."

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पढ़ने लिखने के शौकीन
तिहाड़ में मक़बूल बट्ट के साथ एक राजनीतिक क़ैदी जैसा बर्ताव किया जाता था. उनको पढ़ने लिखने का बहुत शौक था.
उनके साथ काम कर चुके हाशिम कुरैशी बताते हैं, "वो कम से कम 5 फ़ुट 10 इंच लंबे थे. वो बहुत नर्म मिजाज़ थे. जब भी वो बोलते थे तो ऐसा लगता था कि दुनिया की तमाम लाइब्रेरियों का इल्म उसने अपने अंदर समाया हुआ था."
"जब वो राष्ट्रवाद, आज़ादी या किसी समस्या पर बोलते थे, ग़रीबी और बीमारी के ख़िलाफ़, शिक्षा और औरतों के हक़ में, ऐसा लगता था कि दुनिया के तमाम इनक़लाबियों की रूह उनके अंदर बस गई है."

मक़बूल बट्ट का ब्लैक वॉरंट
हालांकि मक़बूल बट्ट को उनकी फाँसी के बारे में पहले से सूचना नहीं दी गई थी, लेकिन उन्हें इस बात का अंदाज़ा हो गया था.
सुनेत्रा चौधरी बताती हैं, "जैसे ही मक़बूल को फाँसी देना तय हुआ, तिहाड़ जेल के महानिदेशक को रातों-रात ब्लैक वॉरंट लाने के लिए श्रीनगर भेजा गया. उनके वकील को भी फाँसी से कुछ समय पहले बताया गया. एक दूसरे मामले में उनके केस की जो सुनवाई चल रही थी वो चलती रही."
"अदालत को ये भी नहीं बताया गया कि मकबूल को दूसरे केस में फाँसी पर चढ़ाया जा रहा है. उनकी फाँसी के बाद जब अदालत ने उनके बारे में पूछा, जब उन्हें बताया गया कि मक़बूल को तो एक दूसरे मामले में फाँसी दे दी गई है."

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तिहाड़ की किलेबंदी
मक़बूल बट्ट की फाँसी से पहले तिहाड़ जेल जाने वाली हर सड़क बंद कर दी गई थी और वहाँ धारा 144 लगा दी गई थी.
सुनेत्रा चौधरी बताती हैं, "पूरे इलाके को एक तरह के किले के रूप में बदल दिया गया था. एक डर ये था कि कहीं ऊपर से कोई हमला न हो जाए. हेलिकाप्टरों से लड़ाकों को नीचे उतारा जाए और वो मक़बूल बट्ट को बचा कर ले जाएं."
"इस समय ख़ालिस्तान और कश्मीरी पृथकतावादियों की मुहिम चरम पर थी और उनकी तरफ़ से किसी दुस्साहसी प्रयास का ख़तरा हमेशा बना रहता था. इस समय आतंकवाद पर जिस तरह का अंतरराष्ट्रीय सहयोग दिखाई देता है, उस समय ये बिल्कुल भी नहीं था. इस सबको देखते हुए तिहाड़ जेल में अभूतपूर्व सुरक्षा इंतज़ाम किए गए थे."

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कश्मीरियों के लिए अपना संदेश रिकॉर्ड करवाया
मक़बूल बट्ट की जिंदगी के आख़िरी दिन एक सिख मजिस्ट्रेट को बुलाकर मक़बूल से अपनी वसीयत लिखने के लिए कहा गया.
लेकिन मक़बूल ने अपनी वसीयत को लिखने के बजाए रिकॉर्ड करवाया. 11 फ़रवरी, 1984 की सुबह उन्होंने आख़िरी बार नमाज़ पढ़ी, चाय पी और फाँसी के फंदे की तरफ़ बढ़ गए.
सुनील गुप्ता बताते हैं, "उन दिनों हॉलीवुड की एक फ़िल्म आई थी जिसमें कैदियों को हेलिकॉप्टर्स की मदद से बचाया गया था. हमें ख़ुफ़िया विभाग से आगाह किया गया था कि इनको भी इस तरह से बचाया जा सकता है. इसलिए हम सुरक्षा के प्रति बहुत अधिक चौकन्ने थे. उस दिन मक़बूल सुबह चार बजे के करीब उठ गए थे."
"इनका चेहरा वैसे तो हमेशा चमकता रहता था, लेकिन उस दिन वो थोड़े से बुझे हुए दिखाई दे रहे थे. उन्होंने सिख मजिस्ट्रेट के सामने दिए गए रिकॉर्डेड संदेश में कश्मीरवासियों से कहा था कि वो अपने संघर्ष को आगे भी जारी रखें. लेकिन सुरक्षा कारणों से हमने वो संदेश आगे नहीं बढ़ाया."
"मैंने कई फाँसियाँ देखी हैं.आखिरी मौके पर मौत की सज़ा पाया कैदी बुरी तरह से विचलित हो जाता है ,लेकिन मक़बूल ने बहुत शांति से मौत को गले लगाया. जब उन्हें काले कपड़े और हथकड़ियां पहनाई गईं, उन्होंने कोई ख़ास प्रतिक्रिया नहीं दी."
"कुछ लोग फाँसी पर चढ़ने से पहले नारे वगैरह लगाने लगते हैं, लेकिन मक़बूल ने ऐसा कुछ नहीं किया. उस समय भी वहाँ पर दोनों जल्लाद फ़कीरा और कालू मौजूद थे. वही उन्हें फाँसी के फंदे तक ले कर गए."

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तिहाड़ में ही दफ़नाया गया मक़बूल को
ये पहले ही तय कर लिया गया था कि उनके शव को उनके परिवार वालों को नहीं दिया जाएगा और उन्हें तिहाड़ जेल के अंदर ही दफ़नाया जाएगा.
सुनील गुप्ता बताते हैं, "उनके पास बहुत सारी किताबें थीं जो उनके दोस्तों ने उन्हें उपहार के तौर पर दी थीं. इनके कपड़ों के अलावा इनके पास एक कुरान थी जिसे वो रोज़ पढ़ा करते थे. उनके घर वालों की तरफ़ से ये सब चीज़े उन लोगों को देने का अनुरोध किया गया. लेकिन हम लोगों ने उनकी ये बात नहीं मानी."
"लेकिन ये फ़ैसला जेल अधीक्षक का नहीं था. ये फ़ैसला उच्चतम स्तर पर लिया जाता है. इस बारे में या तो गृह मंत्री या फिर प्रधानमंत्री ने फ़ैसला किया था. वहीँ से ये भी तय हुआ था कि उनके शव को उनके परिवार वालों के हवाले नहीं किया जाएगा, क्योंकि पृथकतावादी उसका दुरुपयोग कर सकते थे."
"ये तिहाड़ जेल के इतिहास में पहली बार हुआ कि जहाँ उनको फाँसी दी गई थी, उसी के बगल में कब्र खुदवा कर उन्हें दफ़नाया गया."

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मक़बूल की किताबें तिहाड़ लाइब्रेरी में
सुनील गुप्ता को ये पता नहीं कि मक़बूल बट्ट की चीज़ों का क्या हुआ?
लेकिन उन्हें ये मालूम है कि उनकी किताबें जिनमें जाँ पॉल सात्र और विल डूरैन्ट की लिखी किताबें भी शामिल हैं, तिहाड़ जेल की लाइब्रेरी का हिस्सा बन गईं.
आने वाले सालों में जिस किसी ने भी वो किताब लाइब्रेरी से ली, उसे कभी अंदाज़ा नहीं हुआ कि एक ज़माने में उन किताबों का असली मालिक कौन था.
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