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नागरिकता संशोधन बिल: असम क्यों उबल रहा है
- Author, दिलीप कुमार शर्मा
- पदनाम, गुवाहाटी से, बीबीसी हिंदी के लिए
भारत के पूर्वोत्तर राज्यों ख़ासकर असम में नागरिकता संशोधन बिल के ख़िलाफ़ विरोध-प्रदर्शन कर रहे लोगों का ग़ुस्सा अब कई तरह से सामने आ रहा है.
विरोध-प्रदर्शन कर रहे लोग "आरएसएस गो-बैक" के नारे लगा रहे हैं, साथ ही अपने नारों में सत्ताधारी बीजेपी को सतर्क कर रहे हैं.
सड़कों पर उतरे ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन के कार्यकर्ताओं ने इससे पहले नगरिकता बिल के ख़िलाफ़ मशाल जुलूस निकालकर अपना विरोध जताया. वहीं, स्थानीय कलाकार, लेखक, बुद्धिजीवी समाज और विपक्षी दलों के लोग अलग-अलग तरीक़ों से अपना विरोध जता रहे हैं.
नागरिकता संशोधन विधेयक (Citizenship Amendment Bill) को संक्षेप में CAB भी कहा जाता है और यह बिल शुरू से ही विवादों में रहा है.
नागरिकता (संशोधन) विधेयक, 2019 सदन में पेश करने के बाद ही ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन के सदस्यों ने गुवाहाटी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, असम के मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल समेत भाजपा सरकार के कई नेता-मंत्रियों के पुतले फूंक कर अपना विरोध दर्ज किया.
असम के डिब्रूगढ़, तिनसुकिया, धेमाजी, शिवसागर और जोरहाट ज़िले की कई जगहों पर सोमवार को विरोध प्रदर्शन कर रहे लोगों ने राष्ट्रीय राजमार्ग को बाधित कर यातायात व्यवस्था ठप कर दी. वहीं रेल की आवाजाही ठप करने और पुलिस के साथ प्रदर्शनकारियों के टकराव की ख़बरें भी सामने आ रही हैं.
आख़िर किस बात का डर?
दरअसल पूर्वोत्तर राज्यों के स्वदेशी लोगों का एक बड़ा वर्ग इस बात से डरा हुआ है कि नागरिकता बिल के पारित हो जाने से जिन शरणार्थियों को नागरिकता मिलेगी उनसे उनकी पहचान, भाषा और संस्कृति ख़तरे में पड़ जाएगी.
ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन के मुख्य सलाहकार समुज्जवल भट्टाचार्य भाजपा पर नागरिकता संशोधन बिल की आड़ में हिंदू वोट बैंक की राजनीति करने का आरोप लगाते है.
वो कहते हैं, "यह बात अब स्थापित हो गई है कि कांग्रेस ने बांग्लादेशी नागरिकों को सुरक्षा देने के लिए हम पर आईएमडीटी क़ानून थोपा था और अब बीजेपी अवैध बांग्लादेशी लोगों को सुरक्षा देने के लिए हम लोगों पर नागरिकता संशोधन बिल थोप रही है. इन सबको बांग्लादेशियों का वोट चाहिए. लेकिन असम के लोग किसी भी कीमत पर इस बिल को स्वीकार नहीं करेंगे."
ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन से छात्र राजनीति की शुरुआत करते हुए असम के मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे सर्वानंद सोनोवाल ने प्नदेश में हो रहे व्यापक आंदोलन को देखते हुए कहा,"हमारी सरकार ने कभी भी जाति को नुकसान नहीं पहुंचाया है और कभी नहीं पहुंचाएगी."
"हम असमिया जाति की सुरक्षा के लिए शुरू से काम कर रहे हैं और आप लोग हमारे काम को देख रहे हैं. मैं आंदलोन कर लोगों को आह्वान करता हूं कि आप लोग आंदोलन के ज़रिए असम का भविष्य नहीं बदल सकते."
नागरिकता संशोधन बिल के पारित हो जाने से क्या असमिया जाति, भाषा और उनकी संस्कृति पूरी तरह ख़त्म हो जाएगी. इस सवाल का जवाब देते हुए वरिष्ठ पत्रकार बैकुंठ नाथ गोस्वामी कहते है, "अगर कैब लागू हो जाता है तो अपने ही प्रदेश में असमिया लोग भाषाई अल्पसंख्यक हो जाएंगे. असम में सालों पहले आकर बसे बंगाली बोलने वाले मुसलमान पहले अपनी भाषा बंगाली ही लिखते थे लेकिन असम में बसने के बाद उन लोगों ने असमिया भाषा को अपनी भाषा के तौर पर स्वीकार कर लिया."
"राज्य में असमिया भाषा बोलने वाले 48 फ़ीसदी लोग हैं और अगर बंगाली बोलने वाले मुसलमान असमिया भाषा छोड़ देते हैं तो यह 35 फ़ीसदी ही बचेंगे. जबकि असम में बंगाली भाषा 28 फ़ीसदी है और कैब लागू होने से ये 40 फ़ीसदी तक पहुंच जाएगी. फ़िलहाल असमिया यहां एकमात्र बहुसंख्यक भाषा है."
"वो दर्जा कैब के लागू होने से बंगाली लोगों के पास चला जाएगा. इसके अलावा कैब के लागू होने से यहां धार्मिक आधार पर राजनीतिक ध्रुवीकरण ज़्यादा होगा. स्थानीय और क्षेत्रीय मुद्दों की अहमियत घटेगी. भाजपा और आरएसएस के लोग हिंदू के नाम पर सभी लोगों को एक टोकरी में लाने के लिए शुरू से काम कर रहे हैं और काफ़ी हद तक यहां सफल भी हुए हैं."
बिल का किन इलाक़ों पर पड़ेगा असर?
असम तथा पूर्वोत्तर में कई संगठनों ने आगे लगातार आंदोलन करने की जो घोषणा की है उसके क्या नतीजे निकलेंगे?
इस सवाल का जवाब देते हुए बैकुंठ नाथ गोस्वामी कहते हैं, "ट्राइबल इलाक़ों में नागरिकता बिल का कोई असर नहीं होगा. मेघालय, नागालैंड, मिज़ोरम और मणिपुर जैसे राज्यों में यह क़ानून लागू ही नहीं होगा. ऐसे में यह आंदोलन आगे जाकर कमज़ोर पड़ जाएगा."
"जबकि असम में बोड़ो, कार्बी और डिमासा इलाक़े संविधान की छठी अनुसूची के अंतर्गत आते हैं, लिहाज़ा वहां वो क़ानून लागू ही नहीं होगा. बात जहां तक आम असमिया लोगों की है तो भाजपा इनके लिए नई योजनाओं की घोषणा कर इन्हें देर-सबेर अपने पाले में लाने का प्रयास तो करेगी. इससे पहले कांग्रेस भी ऐसी ही लोकलुभावन योजनाओं का प्रलोभन देकर 15 साल तक यहां अपनी राजनीति चलाती रही है."
नागरिकता संशोधन बिल में धार्मिक उत्पीड़न के कारण पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और बांग्लादेश से आए हुए हिंदू, सिख, पारसी, जैन और ईसाई लोगों को कुछ शर्तें पूरी करने पर भारत की नागरिकता देने की बात कही जा रही है.
लेकिन असम में नागरिकता रजिस्टर यानी एनआरसी की फ़ाइनल लिस्ट से जिन 19 लाख लोगों को बाहर किया गया है उनमें क़रीब 12 लाख हिंदू बंगाली बताए जा रहे हैं.
पहले बीजेपी नेताओं का एनआरसी को पूरी तरह ख़ारिज करना और अब नागरिकता संशोधन बिल को सदन से पारित करवाने के प्रयास को पार्टी के हिंदू वोट बैंक की राजनीति से ही जोड़कर देखा जा रहा है.
जारी रहेगा विरोध प्रदर्शन
पूर्वोत्तर भारत के सात राज्यों के छात्र निकाय नॉर्थ ईस्ट स्टूडेंटस ऑर्गनाइजेशन ने मंगलवार को सुबह 5 बजे से लेकर शाम 4 बजे तक पूर्वोत्तर राज्यों में बंद का आह्वान किया है.
राज्य के क़रीब 30 नागरिक संगठनों ने स्टूडेंटस ऑर्गनाइजेशन के इस बंद को अपना समर्थन दिया है. इस बीच, ऑल असम सूटीया स्टूडेंट्स ऑर्गनाइजेशन और ऑल असम मोरान स्टूडेंट्स ऑर्गनाइजेशन ने सोमवार सुबह से असम में 48 घंटे का बंद बुलाया है जिसका ऊपरी असम के क़रीब आठ ज़िलों में व्यापक असर देखने को मिल रहा है.
इस नागरिकता बिल को लेकर सोशल मीडिया पर सैकड़ों की तादाद में लोग मुख्यमंत्री सोनोवाल के ख़िलाफ़ अपना ग़ुस्सा दिखा रहे हैं.
मुख्यमंत्री सोनोवाल ने अपने फ़ेसबुक पेज पर एक वीडियो पोस्ट करते हुए लिखा था कि असम को अगर औद्योगीकरण के क्षेत्र में आगे बढ़ाना है तो इसके लिए राज्य में शांति का माहौल होना आवश्यक है.
इस विवादित बिल के ख़िलाफ़ गुवाहाटी विश्वविद्यालय के एक छात्र ने अपने ख़ून से एक संदेश लिखकर विरोध जताया है. सोशल मीडिया पर इस छात्र का एक वीडियो फुटेज वायरल हो रहा है, जहां वो अपनी कटी हुई कलाई के ख़ून से लिखकर इस बिल का विरोध कर रहा है.
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