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नागरिकता संशोधन बिल: सरकार और विरोधियों के अपने-अपने तर्क
नागरिकता संशोधन अधिनियम 2019 क़ानून बनने की तरफ़ पहला क़दम उठा चुका है, कैबिनेट ने इसे पारित कर दिया है, अब ये संसद के रास्ते राष्ट्रपति की हामी के लिए पहुंचेगा जिसके बाद गज़ट अधिसूचना (नोटिफ़िकेशन) का रूप ले लेगा.
बिल के पिछले प्रारूप की तरह इस बार भी नए विधेयक पर विरोध शुरू हो गया है. कई राजनेता इसके ख़िलाफ़ तो है हीं, इसके क़ानूनी पहलूओं पर भी सवाल उठ रहे हैं. विरोधियों का कहना है कि कैब को एनआरसी से अलग करके नहीं देखा जा सकता है, जबकि सरकार का कहना है कि दोनों अलग-अलग विषय हैं.
क्या है सरकार का कहना?
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा, "भारत के तीनों पड़ोसी धर्मशासित देशों में अल्पसंख्यकों का लगातार मज़हबी उत्पीड़न हुआ है, जिसकी वजह से उन्हें भारत में शरण लेनी पड़ी है. छह अल्पसंख्यक समूहों को नागरिकता का अधिकार देने का फ़ैसला सर्व धर्म समभाव की भावना के अनुरूप है."
पाकिस्तान और अफ़गानिस्तान 'इस्लामी' गणराज्य हैं. धर्मनिरपेक्षता बांग्लादेश के संविधान की प्रस्तावना में शामिल है, लेकिन इस्लाम को राष्ट्रीय धर्म बताया गया है.
मोदी सरकार के इस विधेयक में अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश से संबंध रखनेवाले छह मज़हबों हिंदू, ईसाई, सिख, जैन, बौद्ध और पारसी के उन लोगों को नागरिकता देने का प्रावधान है, जिन्होंने या तो भारत में ग़ैर-क़ानूनी तौर पर प्रवेश किया हो या यहां आने के बाद उनके क़ाग़जात एक्सपायर्ड हो गए हों.
इन लोगों ने धार्मिक प्रताड़ना की वजह से या ऐसा होने के डर से इन तीन देशों से भारत में आकर शरण ली हो. ये उन लोगों पर लागू होगा जो 31 दिसंबर, 2014 के पहले से यहां रह रहे हों.
देश के गृह मंत्री और भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह ने भी तीनों पड़ोसी देशों में अल्पसंख्यकों पर धर्म-परिवर्तन के लिए दबाव, उनकी महिलाओं पर प्रताड़ना, बच्चियों को उठाकर ले जाने जैसे अपराधों की बात कही है और स्पष्ट किया कि ऐसे जिन लोगों ने भारत में शरण ली है, उन्हें ये क़ानून राहत देगा.
अमित शाह ने क्या कहा?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सबसे क़रीबी साथी बताए जाने वाले अमित शाह ने नेटवर्क18 को दिए इंटरव्यू में कहा था कि भारत में पहले भी सात बार बड़े स्तर पर नागरिकता दी गई है.
उन्होंने इस मामले में भारत के विभाजन यानी 1947 के समय, बांग्लादेश निर्माण (1971), युगांडा से वापस भारत आए लोगों, श्रीलंका में गृह-युद्ध की वजह से वहां से भारत आए तमिलों को नागरिकता दिए जाने का हवाला दिया और कहा कि उस वक़्त इसका किसी ने विरोध नहीं किया और जब बीजेपी यही करना चाहती है तो उसका विरोध क्यों?
गृह मंत्री का कहना था कि चूंकि इस्लामी मुल्कों में मुसलमानों पर ज़ुल्म नहीं हो सकता इसलिए बिल में मुसलमानों का नाम नहीं लिया गया है.
अमित शाह का ये भी कहना था कि प्रस्तावित नागरिकता क़ानून और नेशनल रजिस्टर ऑफ़ सिटिज़न यानी एनआरसी अलग-अलग चीज़ें हैं.
इस प्रश्न पर कि बिल और एनआरसी की आड़ में मुसलमानों के ख़िलाफ़ एजेंडा चलाया जा रहा है , बीजेपी अध्यक्ष का कहना था कि दुनिया का कौन सा देश है जो अपने नागरिकों का लेखा-जोखा नहीं करता है तो इसमें मुस्लिम-विरोध की बात कहां से आ गई और जो भारतीय नहीं हैं उन्हें यहां से जाना ही चाहिए.
बिल के विरोध में क्या है दलीलें?
हैदराबाद के सांसद असदउद्दीन ओवैसी के मुताबिक़, "नागरिकता संशोधन बिल का लाया जाना हमारे स्वतंत्रता सेनानियों का अनादर है क्योंकि ये दो राष्ट्रों के सिद्धांत को पुनर्जीवित करेगा. एक मुसलमान के तौर पर मैंने जिन्ना के सिद्धांत को अस्वीकार किया था अब आप एक क़ानून बना रहे हैं जो लोगों को दो राष्ट्रों की याद दिलाएगा."
गुवाहाटी स्थित वकील अमन वदूद का कहना है कि नागरिकता संशोधन क़ानून और एनआरसी को अलग-अलग खांचों में रखकर पढ़े जाने की ज़रूरत नहीं है, तभी पूरा मामला स्पष्ट होता है.
एनआरसी मामले में लंबे समय से नागरिकों के पक्ष में केस लड़नेवाले अमन वदूद का कहना है, "एनआरसी में लोगों की नागरिकता की जांच की जा रही है या की जाएगी और जिन पर शक होगा उन्हें उससे बाहर कर दिया जाएगा."
वे कहते हैं, "लेकिन दूसरी तरफ़ आप कह रहे हैं कि अगर आप इन छह मज़हबों में से किसी एक से भी हों, तो आपके लिए एक ऐसा क़ानून है जिसके बल पर आपको नागिरकता मिल जाएगी. इससे साफ़ हो जाता है कि आप किसको टार्गेट कर रहे हैं, वो हैं मुसलमान."
मोदी सरकार के कई मंत्रियों और हाल के दिनों में गृह मंत्री अमित शाह तक ने ज़ोर देकर कहा है कि पूरे मुल्क के लोगों की एनआरसी तैयार की जाएगी.
अमित शाह ने कहा है कि असम में फिर से एनआरसी होगा.
असम में सत्तासीन बीजेपी सरकार के अहम मंत्रियों ने हाल में हुई एनआरसी को मानने से इनकार कर दिया है जबकि ये सब कुछ सुप्रीम कोर्ट की देख-रेख में हुआ था.
अब तक आई रिपोर्ट्स में ये बात सामने आई है कि जिन 19 लाख लोगों के नाम असम एनआरसी से बाहर हैं उनमें हिंदुओं की तादाद अधिक है.
मशहूर लेखक, पत्रकार टोनी जोसफ़ ने ट्वीट कर लिखा कि प्रस्तावित क़ानून हिटलर के नाज़ी स्कीम जैसा है.
जोसफ़ का कहना है कि इस बिल की कुटिलता तब समझ में आती है जब आप पूरे मुल्क में एनआरसी किए जाने की बात करते हैं. कैब सरकार को ये हक़ देगा कि वो सिर्फ़ एक समुदाय के लोगों से कह सकेगी कि वो साबित करें कि वो ग़ैर-क़ानूनी प्रवासी नहीं हैं.
छात्र कार्यकर्ता सैयद अज़हरूद्दीन इसे बीजेपी की 'हिंदू वोट-बैंक पॉलिटिक्स' का हिस्सा मानते हैं.
विरोधी ये भी सवाल उठा रहे हैं कि बात अगर पड़ोसी देशों के अल्पसंख्यकों के प्रताड़ना की है तो फिर श्रीलंका, म्यांमार और तिब्बत विधेयक से बाहर क्यों हैं जबकि इन देशों में भी हिंदुओं, मुसलमानों और बौद्धों पर प्रताड़ना के आरोप हैं.
अनस तनवीर सवाल उठाते हैं कि भारत को हिंदुओं का संरक्षक रोल किसने दिया,
सुप्रीम कोर्ट में वकालत करने वाले अनस तनवीर का कहना है कि नागरिकता संशोधन विधेयक संविधान की मूलभूत भावना- प्रस्तावना के अलावा जीवन, समानता जैसे क़ानूनों का उल्लंघन है.
राष्ट्रीय जनता दल के सांसद मनोज झा ने कहा है कि ये भारत को इसराइल जैसा बनाने के इरादे से उठाया गया क़दम है- जिसका ध्येय है एक धर्मावलंबियों (एक धर्म को मानने वालों) के लिए एक मुल्क.
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