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वो बिहारी मुसलमान जिसकी पेंटिंग पर फ़िदा हुआ ब्रितानी साम्राज्य
ये उस दौर की कहानी है जब मुग़लिया तख़्त पर शाह आलम द्वितीय का शासन हुआ करता था.
सड़क से लेकर दरबार तक मुग़लिया शान की धज्जियां उड़ रही थीं. एक कहावत हुआ करती थी- शाह आलम की सल्तनत, दिल्ली से पालम तक...
इसी दौर में सात समंदर पार से व्यापार करने आई ईस्ट इंडिया कंपनी ने धीरे-धीरे हिंदुस्तान पर अपना शिकंजा कसना शुरू कर दिया था.
लेकिन ईस्ट इंडिया कंपनी ने सिर्फ़ व्यापार और ज़मीन पर नियंत्रण नहीं किया. बल्कि इसमें काम करने वाले उच्च अधिकारियों ने मुग़लिया कला और कलाकारों को भी ब्रिटिश राज में समाहित करना शुरू कर दिया.
पटना के मुग़लिया पेंटर ज़ैनुद्दीन
ब्रिटिश राज के ज़माने में पटना के रहने वाले शेख़ ज़ैनुद्दीन की पहचान चुनिंदा पेंटरों में हुआ करती थी. वो मुग़लिया पेंटिंग शैली के चित्रकार थे. और उन्हें नवाबों का आश्रय प्राप्त था.
ज़ैनुद्दीन की पेंटिंग की ख़ास बात ये थी कि उनकी कृतियों में मुग़लिया पेंटिंग शैली और पश्चिमी ढंग का बेजोड़ मिश्रण दिखा करता था.
लेकिन पश्चिमी दुनिया में उनके मशहूर होने की कहानी कलकत्ता शहर के उदय से जुड़ी हुई है.
ब्रिटिश राज की शुरुआत में कलकत्ता शहर अपने उरूज़ पर था.
उन दिनों हुगली नदी के किनारे बसे इस शहर को एशिया के सबसे तेज़ी से समृद्ध होते शहर की ख्याति प्राप्त थी. इसे महलों का शहर कहा जाता था.
1770 के दशक में कलकत्ता में ब्रिटिश राज के जवानों की संख्या दोगुनी होकर चार लाख तक पहुंच गई थी.
प्रसिद्ध फ्रांसीसी लेखक वॉल्टेयर के दोस्त काउंट डे मोडेव ने लिखा है, "इस शहर को दुनिया का सबसे ख़ूबसूरत शहर बनाना बेहद आसान था. इसके लिए सिर्फ़ एक नियोजित नक्शे की ज़रूरत थी. कोई ये सोच भी नहीं सकता कि ब्रितानी साम्राज्य इतनी बेहतरीन लोकेशन का फ़ायदा उठाने में असफल कैसे रहा. और कैसे उन्होंने सभी लोगों को अपने अंदाज़ में इमारतें बनाने की अनुमति दी, वो भी बिलकुल अजीबोग़रीब अंदाज़ में."
इस शहर से होकर गुज़रने वाले लोग सिर्फ ब्रितानियों की समृद्धता से ही हतप्रभ नहीं थे.
कई स्थानीय लोग भी इस शहर के उदय से लाभांवित हुए.
इसी दौर में कलकत्ता के समाज में कई तरह की बुरी आदतें भी देखी गईं. लेकिन कलकत्ता के इसी समाज में कई लोग ऐसे भी थे जो ऐसी जीवनशैली से नफ़रत किया करते थे.
तत्कालीन कलकत्ता सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश इलिज़ाह इंपे भी ऐसे ही लोगों में शुमार थे जो भारतीय कला और संस्कृति में रुचि रखते थे.
भारत आते हुए उन्होंने बंगाली और उर्दू भाषा सीखी और कलकत्ता पहुंचकर फ़ारसी भाषा सीखी.
कुछ दिनों बाद उन्होंने क्लासिकल पेंटिंग का संग्रहण शुरू किया.
जब कलकत्ता पहुंचे ज़ैनुद्दीन
ज़ैनुद्दीन का कलकत्ता आना भी एक दिलचस्प कहानी है. पटना में रहने वाले ज़ैनुद्दीन मुग़लिया शैली में पेंटिंग बनाया करते थे.
लेकिन जब कलकत्ता सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश इलिज़ाह इंपे और उनकी पत्नी लेडी मैरी इंपे का भारत के दुर्लभ वन्य जीवों में रुझान बढ़ा तो उन्होंने अपने घर में इन जानवरों को रखना शुरू किया.
इसके बाद मैरी इंपे ने पटना जाकर कुछ स्थानीय कलाकारों को अपने साथ कलकत्ता लाने का फ़ैसला किया. ज़ैनुद्दीन इन कलाकारों में से एक थे.
मैरी इंपे पटना से अपने साथ शेख़ ज़ैनुद्दीन, उनके सहायक भवानी दास और राम दास को लेकर कलकत्ता के मिडलटन स्ट्रीट स्थित आलीशान ब्रितानी घर में लेकर आईं.
इसके बाद ज़ैनुद्दीन ने इंपे दंपति के घर पर मौजूद पक्षियों और जानवरों की पेंटिंग बनाना शुरू की.
ज़ैनुद्दीन ने इससे पहले कभी अंग्रेज़ी काग़ज़ पर पेंटिंग नहीं की थी.
लेकिन इंपे के घर पहुंचने के बाद उन्होंने बड़ी जल्दी ही अंग्रेज़ी वाटमेन वॉटरकलर पेपर पर अपने ब्रशों से रंग उकेरना शुरू कर दिया.
1773 ईसवीं में स्कॉटलैंड निवासी जीव विज्ञानी जेम्स केर भारतीय कलाकारों की बनाई हुई जीव विज्ञान से जुड़ी हुई पेंटिंगों को एडिनबरा भेज रहे थे.
लेकिन इंपे के नेचुरल हिस्ट्री एलबम में मौजदू पेंटिंग को सबसे ज़्यादा लोकप्रियता हासिल हुई.
आज के दौर में इंपे के एलबम की प्रतियां दुनियाभर में मौजूद निजी संग्रहों में मौजूद हैं. और आज भी जब इन पेंटिंग को नीलामी के लिए रखा जाता है तो एक पेंटिंग की कीमत लगभग साढ़े तीन लाख पाउंड तक पहुंचती है.
इंपे के एलबम की 197 पेंटिंग भारतीय चित्रकारी के सबसे बेहतरीन नमूनों के रूप में जानी जाती है जिनमें ज़ैनुद्दीन की तमाम कृतियां मौजूद हैं.
ओरियल पक्षी की शानदार तस्वीर की कहानी
ज़ैनुद्दीन ने इंपे दंपति के लिए ओरियल पक्षी की एक शानदार तस्वीर बनाई.
इस पेंटिंग को पहली नज़र से देखें तो ये पेंटिंग किसी यूरोपीय कलाकार की बनाई हुई पेंटिंग नज़र आती है.
लेकिन अगर ध्यान से देंखें तो इस पेंटिंग में मुग़लिया पेंटिंग शैली और पश्चिमी देशों की पेंटिंग शैली का बेजोड़ नमूना नज़र आता है.
ज़ैनउद्दीन ने ओरियल नाम की एक ख़ास चिड़िया की पेंटिंग बनाई है.
इस पेंटिंग में रंगों के चुनाव और उनके गहरे इस्तेमाल की वजह से ये तस्वीर चमकती हुई सी दिखती है.
ये सारे संकेत ज़ैनुद्दीन की मुग़लिया ट्रेनिंग की ओर इशारा करते हैं.
अगर इस तस्वीर को ध्यान से देखें तो इस तस्वीर में जो पेड़ का तना बनाया गया है, वह गोल दिखता है.
लेकिन इस तने पर बैठा टिड्डा ऐसा लगता है कि जैसे कि किताब में लंबे समय से दबाकर रखा गया कोई फूल नज़र आता है.
इस पेंटिंग में टिड्डे की मौजूदगी सिर्फ इसे दी गई आउटलाइन से ही समझ आती है.
जहांगीर के दौर के मशहूर कलाकार उस्ताद मंसूर ने भी अपनी चित्रकारी की शैली में यही तकनीक अपनाई थी.
लेकिन मुग़लिया दौर का कोई भी कलाकार इस पेंटिंग में ओरियल पक्षी को एक सफ़ेद पृष्ठभूमि पर पेंट नहीं करता.
लेकिन ज़ैनउद्दीन ने इसे एक कटहल के पेड़ पर बैठा हुआ दिखाया है जो कि वैज्ञानिक नमूने के लिहाज़ से काफ़ी मुफ़ीद साबित होता है
इन दो चित्रकारीय शैली से आने वाले कलाकारों ने एक ऐसा संगम तैयार किया जिसकी प्रसिद्धी दुनियाभर में फैल गई.
ज़ैनुद्दीन के सहायक के रूप में काम शुरू करने वाले भवानी दास ने भी चित्रकारी के क्षेत्र में अपने गुरू जैसा नाम हासिल किया.
भवानी दास की पेंटिंग में जो ख़ास बात है, वो आकृति, रंग, और भाव को लेकर संवेदनशीलता है.
(इस लेख के कुछ हिस्से अंग्रेज़ी में प्रकाशित इस लेख से लिए गए हैं जो कि प्रसिद्ध लेखक और इतिहासकार विलियम डेलरिम्पल की किताब से लिए गए कुछ अंशों पर आधारित है)
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