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ईश्वरचंद विद्यासागरः अंग्रेज़ों के दौर के समाज सुधारक पर चुनावी राजनीति
- Author, प्रभाकर एम.
- पदनाम, कोलकाता से बीबीसी हिंदी के लिए
जाने-माने शिक्षाशास्त्री और समाज सुधारक ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने कभी कल्पना तक नहीं की होगी कि मौत के 128 साल बाद वे अपने ही राज्य में चुनावी मुद्दा बन जाएंगे.
पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में सातवें और आखिरी चरण के मतदान से पहले बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के रोड शो के दौरान हुए हंगामे और तोड़-फोड़ के बाद विद्यासागर रातों-रात सबसे बड़ा मुद्दा बन गए हैं.
इस हंगामे के दौरान अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के कथित समर्थकों ने कॉलेज स्ट्रीट इलाके में स्थित विद्यासगर कॉलेज में घुस कर न सिर्फ़ तोड़-फोड़ की बल्कि वहां रखी विद्यासागर की एक मूर्ति भी तोड़ दी.
मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी ने तुरंत इस मुद्दे को बंगाल के लोगों की भावनाओं से जोड़ते हुए इसे एक मुद्दा बना दिया.
उन्होंने बीजेपी पर बंगाल के महापुरुषों का अपमान करने का आरोप लगाया है और कहा है कि मूर्ति तोड़ने वालों को बख्शा नहीं जाएगा.
ममता बनर्जी ने मंगलवार रात को ही शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी के साथ घटनास्थल का मुआयना किया.
वह कहती हैं, "बीजेपी बंगाल के महापुरुषों का अपमान कर रही है. लोग चुनाव के ज़रिए उसे इस अपमान का करारा जवाब देंगे. यह बेहद शर्मनाक घटना है. अब पानी सिर के ऊपर से बहने लगा है."
ममता की दलील है कि जो लोग महापुरुषों का इस कदर अपमान कर सकते हैं उनको राजनीति का कोई अधिकार नहीं है. इस घटना के विरोध में ममता ने अपनी फेसबुक प्रोफाइल पर विद्यासागर की तस्वीर लगाई है.
इस मुद्दे को तूल पकड़ते देख कर बीजेपी ने भी फौरन सफाई दी है. प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष दिलीप घोष कहते हैं, "मूर्ति तोड़ने में बीजेपी का हाथ नहीं है. कॉलेज के भीतर पहले से ही मौजूद शरारती तत्वों ने ऐसा किया है. उन्होंने ममता बनर्जी पर इस मामले पर बेवज़ह राजनीति करने का भी आरोप लगाया है."
रोड शो में विवाद
अमित शाह ने मंगलवार को कोलकाता में रोड शो किया था. लेकिन इस रोड शो के कलकत्ता विश्वविद्यालय के पास पहुंचते ही तृणमूल कांग्रेस छात्र परिषद के कार्यकर्ताओं ने उनको काले झंडे दिखाते हुए "अमित शाह गो बैक" के नारे लगाए.
इनमें से कुछ लोगों ने शाह के वाहन पर पत्थर और डंडे भी फेंके. इसके बाद सड़क के दूसरी तरफ़ मौजूद एबीवीपी कार्यकर्ता भी पथराव करने लगे.
दोनों गुटों के बीच हुई झड़प के दौरान कुछ मोटरसाइकिलों में आग लगा दी गई. उसके बाद कथित एबीवीपी कार्यकर्ताओं ने विद्यासागर कॉलेज के भीतर घुस कर तोड़-फोड़ की. उन लोगों ने वहां शीशे के शो केस में रखी विद्यासागर की मूर्ति भी टुकड़े-टुकड़े कर दी.
बीजेपी ने हालांकि इस घटना में अपना हाथ से इंकार किया है. लेकिन पुलिस ने इस मामले में 26 लोगों को गिरफ़्तार किया है और मूर्ति तोड़ने वालों का पता लगा रही है.
दूसरी ओर, विद्यासागर कॉलेज के प्रिंसिपल गौतम कुंडू कहते हैं, "यह घटना बेहद शर्मनाक है. कोई कॉलेज के भीतर घुस कर उसकी संपत्ति को नुकसान कैसे पहुंचा सकता है. बीजेपी के लोगों ने भीतर फर्नीचर के साथ विद्यासागर की मूर्ति भी तोड़ दी."
प्रिंसिपल ने भी पुलिस में इस मामले की शिकायत दर्ज़ कराई है. कुंडू का आरोप है कि हमलावर एक लैपटाप और एक महिला कर्मचारी का पर्स भी लेकर भाग गए.
ईश्वरचंद्र विद्यासागर
26 सितंबर, 1820 को पश्चिम बंगाल के मेदिनीपुर में एक ब्राह्मण परिवार में जन्मे ईश्वरचंद्र आगे चल कर एक महान समाज सुधार, शिक्षा शास्त्री और स्वाधीनता सेनानी के तौर पर मशहूर हुए.
उन्होंने स्त्री शिक्षा को बढ़ावा देने के साथ विधवा विवाह के ख़िलाफ़ भी आवाज़ उठाई थी. वे मानते थे कि अंग्रेज़ी और संस्कृत भाषा के ज्ञान के समन्वय से ही भारतीय और पाश्चात्य परंपराओं का श्रेष्ठ ज्ञान हासिल किया जा सकता है.
गांव में प्रारंभिक शिक्षा के बाद वह अपने पिता के साथ कलकत्ता आ गए थे. मेधावी होने की वजह से उनको कई स्कॉलरशिप भी मिली थी. इसी वज़ह से उनको विद्यासागर की उपाधि दी गई थी.
वर्ष 1839 में विद्यासागर ने कानून की पढ़ाई पूरी करने के बाद 1841 में महज़ 21 साल की उम्र में फॉर्ट विलियम कॉलेज में संस्कृत विभाग के प्रमुख के तौर पर काम शुरू कर दिया.
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वर्ष 1849 में एक बार फिर वह साहित्य के प्रोफेसर के तौर पर संस्कृत कॉलेज से जुडे़. अपने समाज सुधार अभियान के तहत ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने स्थानीय भाषा और लड़कियों की शिक्षा के लिए स्कूलों की एक श्रृंखला के साथ कलकत्ता में मेट्रोपोलिटन कॉलेज की स्थापना की.
इनको चलाने के लिए वे बांग्ला में स्कूली बच्चों के लिए पुस्तकों की बिक्री से पैसे जुटाते थे.
संस्कृत कॉलेज का प्रिंसिपल बनने के बाद उन्होंने सभी जाति के बच्चों के लिए कॉलेज के दरवाजे़ खोल दिए, जो उस दौर में बहुत बड़ी बात थी.
उनके अथक प्रयासों की वज़ह से ही विधवा पुनर्विवाह कानून1856 पारित हुआ. वे कथनी की बजाय करनी में विश्वास करते थे.
यही वज़ह थी कि उन्होंने अपने बेटे की शादी एक विधवा से की थी. उन्होंने बहुपत्नी प्रथा और बाल विवाह के ख़िलाफ़ भी आवाज़ उठाई थी.
विद्यासागर का निधन वर्ष 1891 में हुआ था. लेकिन अब वे अचानक राजनीति का मुद्दा बन गए हैं.
राजनीतिक पर्यवेक्षक गोपेश्वर मंडल कहते हैं, "ईश्वरचंद्र विद्यासागर भी बंगाल में जन्मे दूसरे महापुरुषों की तरह राज्य के लोगों की भावनाओं से जुड़े हैं. इसी वज़ह से ममता ने आखिरी दौर में बीजेपी को मात देने के लिए उनकी मूर्ति तोड़ने की घटना को मुद्दा बना लिया है."
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