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कितने अंधविश्वासी थे मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब आलमगीर?
- Author, मिर्ज़ा एबी बेग
- पदनाम, संवाददाता, बीबीसी उर्दू सेवा
अमरीकी इतिहासकार ऑड्री ट्रश्की कहती हैं कि तमाम मुग़ल बादशाहों में औरंगज़ेब आलमगीर में उनकी ख़ास दिलचस्पी की वजह उनके बारे में दुनिया भर में फैली हुई ग़लतफ़हमियाँ हैं.
मुग़ल और मराठा इतिहास पर कई ग्रन्थ लिखने वाले ख्यातिप्राप्त इतिहासकार सर जादूनाथ सरकार ने अगर औरंगज़ेब को अपनी नज़र से देखा, तो जवाहर लाल नेहरू ने अपनी नज़र से.
इनके अलावा शाहिद नईम ने भी औरंगज़ेब आलमगीर के मज़हबी पहलू पर ही ज़रूरत से ज़्यादा ज़ोर दिया.
लेकिन 'औरंगज़ेब द मैन एंड द मिथ' नाम की किताब की लेखिका ऑड्री ट्रश्की ने बीबीसी को बताया कि अगर रवादारी (सहिष्णुता) के लिहाज़ से देखा जाए तो इतिहास के सभी शासक ग़ैर रवादार (असहिष्णु) रहे हैं.
ऑड्री ट्रश्की कहती हैं कि औरंगज़ेब के बारे में ग़लतफ़हमियाँ ज़्यादा हैं और उन्हें हवा देकर मौजूदा दौर में मुसलमानों को नुक़सान पहुँचाया जा रहा है.
लेखिका के मुताबिक़, भारत में इस समय असहिष्णुता बढ़ रही है. वो मानती हैं कि शायद इसी वजह से हैदराबाद में उनके लेक्चर को भी रद्द कर दिया गया जो 11 अगस्त को होना था.
ऑड्री बताती हैं कि इसके विपरीत औरंगज़ेब बादशाह के शासनकाल के ब्राह्मण और जैन लेखक औरंगज़ेब की तारीफ़ें करते हैं. उन्होंने जब फ़ारसी भाषा में हिंदुओं की पवित्र किताब 'महाभारत' और 'रामायण' को पेश किया तो उसे औरंगज़ेब को समर्पित किया.
ऑड्री ने अपनी किताब में लिखा है कि औरंगज़ेब ने अगर होली पर सख़्ती दिखाई तो उन्होंने मुहर्रम और ईद पर भी सख़्ती का प्रदर्शन किया.
अगर उन्होंने एक दो मंदिर तोड़े, तो कई मंदिरों को बड़ा दान भी दिया.
वो कहती हैं, "अलग-अलग इतिहासकारों ने औरंगज़ेब को अपने चश्मे से देखने की कोशिश की है."
ऑड्री के अनुसार, औरंगज़ेब ने ख़ुद को एक अच्छे मुसलमान के तौर पर पेश किया या फिर उनकी हमेशा एक अच्छा मुसलमान बनने की कोशिश रही, लेकिन उनका इस्लाम आज का कट्टर इस्लाम नहीं था. औरंगज़ेब बहुत हद तक सूफ़ी थे और किसी हद तक तो वो अंधविश्वासी भी थे.
औरंगज़ेब के अंधविश्वासी होने का उदाहरण देते हुए ऑड्री बताती हैं कि तमाम मुग़ल बादशाहों के यहाँ ज्योतिष के विशेषज्ञ हुआ करते थे.
औरंगज़ेब के दरबार में भी हिंदू-मुसलमान, दोनों धर्मों के ज्योतिष थे और वो उनसे राय लिया करते थे.
उन्होंने औरंगजेब के एक सिपाही भीमसेन सक्सेना के हवाले से बताया कि दक्षिण भारत में एक बार जहां उनका कैंप था वहाँ बाढ़ आ गई और यह आशंका ज़ोर पकड़ने लगी कि बाढ़ के कारण शाही कैंप को नुक़सान हो सकता है तो उन्होंने क़ुरान की आयतें लिखकर बाढ़ के पानी में डलवाईं, जिसके बाद बाढ़ के पानी में कमी आ गई और ख़तरा टल गया.
याद रहे कि इसी तरह की एक घटना इस्लाम के दूसरे ख़लीफ़ा हज़रत उमर के काल में भी हुई थी जिसका ज़िक्र कई जगह मिलता है कि कैसे उन्होंने मिस्र की नील नदी के नाम पत्र लिखा था.
कहा जाता है कि मिस्र का इलाक़ा जब इस्लाम के अधीन आया तो वहाँ के तत्कालीन गवर्नर अम्र बिन-अल-आस को पता चला कि वहाँ एक सुंदर युवती की सजा-संवार कर हर साल नील नदी के नाम पर बलि दी जाती है ताकि नदी धाराप्रवाह बहती रहे और लोग इससे लाभान्वित होते रहें.
लेकिन इस्लामी सरकार ने इस प्रथा पर प्रतिबंध लगा दिया और फिर नदी का पानी वास्तव में सूख गया. लोगों ने सोचा कि उन पर नदी का प्रकोप हुआ है. यह ख़बर जब ख़लीफ़ा उमर फ़ारूक़ को दी गई तो उन्होंने नील नदी के नाम पत्र लिखा जिसमें उन्होंने यह लिखा कि 'ऐ नदी अगर तू अपने अधिकार से बहती है तो मत बह, लेकिन अगर तू अल्लाह के हुक्म से चलती है तो फिर से बहना शुरू कर दे'.
ऐसा कहा जाता है कि नील नदी में पहले से अधिक पानी आया और उसके बाद वह कभी नहीं सूखी.
ऑड्री ट्रश्की ने इस घटना पर कहा कि हो सकता है कि औरंगज़ेब को भी यह बात पता रही हो और उन्होंने उसके बाद ही ऐसा किया हो.
लेकिन फिर उन्होंने कहा कि एक आधुनिक इतिहासकार होने के नाते मुझे इस पर विश्वास नहीं है लेकिन औरंगज़ेब को उस पर विश्वास था क्योंकि उन्होंने लोगों के सामने इस पर अमल किया और यह दिखाने की कोशिश की कि इस तरह बाढ़ के प्रकोप से बचा जा सकता है.
उन्होंने बताया कि औरंगज़ेब हिंदू और मुसलमान, दोनों क़िस्म के ज्योतिषों से सलाह-मशविरा भी करते थे और कभी-कभार उनके मशविरे पर अमल भी करते थे.
ऑड्री ट्रश्की ने दूसरे मुग़ल बादशाहों के मुक़ाबले औरंगज़ेब की श्रेष्ठता का ज़िक्र करते हुए कहा कि वो सारे मुग़ल बादशाहों में सबसे ज़्यादा धार्मिक थे. उन्हें पूरी क़ुरान याद थी. नमाज़ और इबादत के वो सबसे ज़्यादा पाबंद थे.
औरंगज़ेब पर ये आरोप लगाए जाते हैं कि उन्हें कलाओं, ख़ासकर संगीत से नफ़रत थी. लेकिन औरंगज़ेब के बारे में कुछ क़िस्से ऐसे हैं जो इस बात को सही नहीं मानते.
हालांकि, एक अन्य इतिहासकार कैथरीन ब्राउन ने 'डिड औरंगज़ेब बैन म्यूज़िक' यानी 'क्या औरंगज़ेब ने संगीत पर प्रतिबंध लगाया था' शीर्षक से लिखे एक लेख में दावा किया कि औरंगज़ेब अपनी ख़ाला (मौसी) से मिलने बुरहानपुर गए थे जहाँ हीराबाई ज़ैनाबादी को देखकर वो अपना दिल दे बैठे थे. हीराबाई एक नर्तकी और गायिका थीं.
ऑड्री भी बताती हैं कि औरंगज़ेब को जितना कट्टर पेश किया जाता है वो वैसे नहीं थे. उनकी कई हिंदू बेगमें थीं और मुग़लों की हिंदू बीवियाँ हुआ करती थीं.
उन्होंने बताया, "अपने आख़िरी दिनों में औरंगज़ेब अपने सबसे छोटे बेटे कामबख़्श की माँ उदयपुरी के साथ रहते थे जो एक गायिका थीं. उन्होंने मृत्युशय्या से कामबख़्श को एक ख़त लिखा था जिसमें उन्होंने ज़िक्र किया कि उनकी माँ उदयपुरी बीमारी की हालत में उनके साथ हैं और वो मौत तक उनके साथ ही रहेंगी."
बताया जाता है कि औरंगज़ेब की मौत के चंद महीने बाद 1707 की गर्मियों में उदयपुरी की भी मौत हो गई.
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