You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
1857 विद्रोह: जब बहादुर शाह ज़फ़र के दादा ने सपने में कहा 'बदला लो'
- Author, आर वी स्मिथ
- पदनाम, वरिष्ठ इतिहासकार, बीबीसी हिंदी के लिए
आज़ादी की पहली लड़ाई यानी साल 1857 का विद्रोह भारतीय इतिहास के लिए कई मायनों में महत्वपूर्ण है. इस संघर्ष के साथ ही भारत में मध्यकालीन दौर का अंत और नए युग की शुरुआत हुई, जिसे आधुनिक काल कहा गया.
इस संघर्ष के दौरान एक और ऐसी चीज थी जिस पर गौर करना ज़रूरी है वो था ब्रितानी और भारतीय प्रतिद्वंदियों के बीच फ़ैला अंधविश्वास.
लाला हनवंत सहाय के दादा ने चांदनी चौक में सुना था कि जब लाल क़िले की प्राचीर के ठीक ऊपर नया चांद (पखवाड़े का पहला चांद) पहुंच जाएगा तो लाल क़िले का आंगन फ़िरंगियों के खून से सराबोर हो जाएगा, लेकिन अगर वो खून बहता हुआ यमुना नदी में पहुंच गया और उसने यमुना को अपवित्र कर दिया तो अंग्रेज एक बार फिर वो सब जीत जाएंगे जो कुछ उन्होंने गवांया होगा.
साल 1912 में हुए हार्डिंग बम कांड की साजिश रचने के लिए हनवंत सहाय को भी गिरफ्तार किया गया था, हालांकि उस समय तक उनके दादा की मौत हो चुकी थी.
फ़ैज़ाबाद के मौलवी, अहमदुल्लाह शाह ने नए चांद से जुड़ी ये भविष्यवाणी की थी. हांलाकि उन्होंने ये बात दिल्ली की बजाय मेरठ के मुख्य बाज़ार में कही थी. वहां की दीवारों पर लाल रंग से लिखा हुआ था 'सब लाल होगा.'
सर चार्ल्स नेपियर का कथन कि, ''अगर वे गवर्नर जनरल बनते हैं तो ईसाई धर्म को राज्य धर्म बना देंगे क्योंकि भारत अब इंग्लैंड के आधीन हो गया है'' का विरोध करते हुए मौलवी अहमदुल्लाह ने हिंदुओं और मुसलमानों से अपील की थी कि वो मिलकर अपने पूर्वजों के भरोसे और विश्वास को बचाएं.
मेरठ के सदर बाज़ार में मौलवी की इन बातों का वहां मौजूद सिपाहियों पर गहरा असर देखने को मिला था. 'मारो फ़िरंगियों को' की पुकार लगाते सभी सिपाही छावनी परिसर की तरफ प्रवेश कर गए और अंग्रेजों के बंगलों में जा घुसे.
40 साल के कर्नल जॉन फिनिस ने जब इन सिपाहियों को रोकने की कोशिश की तो उनके सिर पर गोली मार दी गई, रविवार और सोमवार को कई लोगों की जान गई, मरने वालों में जॉन पहले थे. बाद में सिपाही दिल्ली के लिए रवाना हो गए.
शिव का संदेश, फ़कीर का कलमा
दिल्ली की तरफ जाते इन सिपाहियों को आसमान में उड़ता हुआ नीलकंठ पक्षी दिखा. सिपाहियों में शामिल हिंदुओं ने कहा कि 'देखो हमारे भगवान शिव हमें रास्ता दिखा रहे हैं.'
कुछ ही देर बाद एक सफ़ेद दाढ़ी वाले फ़कीर दिखे, जो कलमा पढ़ रहे थे. मुसलमान सिपाहियों ने इसे अपने लिए शुभ संकेत माना. हालांकि एक कोबरा सांप ने इस फ़कीर को कलमा पढ़ने के दौरान काफी परेशान किया. वो अपना फ़न फैलाए फ़कीर के पास ही मौजूद रहा और फ़कीर को डर लगता रहा कि कहीं सांप उन्हें काट ना ले.
जब पठान सिपाहियों ने उस सांप को मारने के लिए पत्थर उठाए तो वहां मौजूद ब्राह्मण और राजपूत सिपाहियों ने उन्हें ऐसा करने से मना कर दिया क्योंकि उनका कहना था कि ये नाग भगवान शिव का प्रतीक है जो उन्हें दुआएं देने आया है.
उस सांप के डर से फ़कीर अपने चिमटे के साथ उठ गए, इसे देख सांप भी झाड़ियों में चला गया.
बहादुर शाह का सपना
उस दौरान की एक और कहानी काफ़ी प्रचलित है. ये कहानी बहादुर शाह ज़फ़र से जुड़ी है. बहादुर शाह ज़फ़र विद्रोही सिपाहियों का नेतृत्व करने के लिए पूरी तरह तैयार नहीं थे, लेकिन कहा जाता है कि एक सपने ने उनके विचार को बदल दिया.
बहादुर शाह ज़फ़र के निजी सचिव जीवन लाल के मुताबिक बादशाह को एक रात सपने में अपने दादा शाह आलम दिखाई दिए, उन्होंने बादशाह से कहा कि वक्त आ गया है कि 100 साल पहले हुई प्लासी की लड़ाई का बदला लिया जाए. इसके बाद बहादुर शाह ज़फ़र विद्रोही सिपाहियों का नेतृत्व करने के लिए तैयार हो गए.
हालांकि उस समय बहादुर शाह की उम्र 82 वर्ष थी और वे लगातार होने वाली खांसी की वजह से बहुत कम सो पाते थे.
बाद में उनकी रानी ज़ीनत महल ने उन्हें स्वतंत्रता सेनानियों का साथ देने के लिए मनाया था.
लोगों का इस तरह का भरोसा था कि लाल क़िले के ऊपर एक प्रेत छाया को मंडराते देखा गया, फरवरी 1707 में औरंगज़ेब की मृत्यु से पहले भी ऐसी छवि दिखी थी.
कश्मीरी गेट के पास एक बिना सिर वाले योद्धा को घोड़े पर दौड़ते हुए देखा गया था. उसे दुंड कहा गया जिसके महज़ कंधे और गर्दन ही थे. इसी दुंड को बाद में बरेली, आगरा, लखनऊ, जयपुर और फ़ैज़ाबाद में भी देखा गया था. जहां-जहां भी उसे देखा गया वहां रक्तपात हुआ.
अंग्रेज़ सिपाहियों को भी दिखे बुरे सपने
सिर्फ़ भारतीय सिपाही ही नहीं बल्कि अंग्रेज़ सिपाहियों ने भी रिज़ के पास कुछ अज़ीब दृश्य देखने की बात कही. एक अंग्रेज सिपाही ने शहर में राजाओं की लंबी कतार देखी जो कुछ दूरी पर जाकर गायब हो रही थी, इसे मुगल साम्राज्य के अंत के तौर पर माना गया.
एक अन्य अंग्रेज सिपाही ने अपने पिता को देखा कि वे उन्हें उंगली दिखाते हुए आने वाले ख़तरे के प्रति चेतावनी दे रहे हैं.
एक ब्रिटिश महिला हैरिएट टाइटलर जो कि कैप्टन रोबर्ट टाइटलर की पत्नी थी, उन्होंने देखा कि उनके पेट में पल रहा बच्चा बहुत ही मुश्किल दौर में हैं लेकिन बाद में उन्हें कुछ पंजाबी या पठानी सिपाही बचा लेते हैं.
बाद में हैरिएट ने दिल्ली के रिज इलाके में एक बच्चे को जन्म दिया, उस समय वहां बहुत बारिश हो रही थी और बच्चे को दस्त की शिकायत हो गई जिससे वो लगभग मरने जैसी हालत में पहुंच गया. तब हैरिएट अपने बच्चे को किसी तरह बचाते हुए करनाल तक ले गईं.
शाहजहांपुर में एक ईसाई पादरी की बेटी ने सपना देखा कि बहुत से लोगों को मार दिया गया है जिनमें उनके पिता भी शामिल हैं. उन्होंने देखा कि काले कपड़े ओढ़े एक आदमी आधी रात को उनके घर की तरफ आ रहा है और सीढ़ियों तक आने के बाद गायब हो जाता है.
उनका यह सपना 1857 में मई की एक सुबह सच साबित हुआ जब विद्रोही सिपाहियों ने बहुत से फ़िरंगियों को मार डाला, इनमें उस लड़की के पिता भी शामिल थे, हालांकि उनकी मां इस हमले से बच निकलने में कामयाब रहीं.
बुरे सपने और उनका सच होना
चांदनी चौक में एक सिख सेवादार ने सपना देखा कि लाल मंदिर से लेकर फ़तेहपुरी मस्जिद तक कई लोगों को फांसी पर लटकाया गया है. बाद में यह बात भी सच होती दिखी जब अंग्रेजों ने विद्रोह में शामिल बहुत से सिपाहियों को फांसी पर लटकाया.
मुगल परिवार से जुड़ी एक बुजुर्ग महिला भी अपने बुरे सपनों से परेशान थीं. उन्होंने देखा कि गुरुद्वारा शीशगंज के सामने बहुत से शव बुरी हालत में सड़ रहे हैं, और उनकी गंध उन्हें जागने के बाद भी महसूस हो रही थी.
बाद में यह सपना भी कुछ हद तक सच साबित होता दिखा जब बहादुर शाह ज़फ़र के दो बेटों और एक पोते को लेफ्टिनेंट हडसन ने खूनी दरवाज़े पास मार डाला और उनके शव को गुरुद्वारे के पास सड़ने के लिए फेंक दिया.
सर सैयद अहमद खान के एक रिश्तेदार ने सपने में देखा कि दरियागंज के पास जो नहर बहती है वह पूरी तरह खून से भरी हुई है.
जब संघर्ष थोड़ा खत्म होने लगा तब सर सैयद अपने घर पहुंचे और उन्होंने देखा कि उनका घर पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो चुका है. उनका वह रिश्तेदार कहां गया उन्हें भी पता नहीं चला.
खूनी दरवाज़ा या अलाउद्दीन का लाल दरवाज़ा के पास शाम के वक्त दिल्ली गेट की तरफ चलते हुए एक आदमी ने खून बहते हुए देखा क्योंकि वहां किसी की हत्या हो गई थी.
वहीं मई 1857 की शुरुआत में यमुना के पास एक मस्जिद में एक नंगे फ़कीर को 'मर-मर' रटते हुए सुना गया. इसी तरह शाहजहांपुर में एक फ़कीर और जयपुर के एक साधु को भी इसी तरह 'मर-मर' रटते हुए सुना गया था.
आखिर इन तमाम घटनाओं और सपनों का क्या मतलब था? क्या ये किसी आने वाली घटना की परिचायक थीं?
इस बारे में सबकुछ सच-सच तो नहीं कहा जा सकता और ना ही सभी को झूठा बताया जा सकता है.
बाद में कई रिसर्च से यह बात साबित हुई कि इंसानी दिमाग में आने वाले वक्त को देखने की क्षमता होती है. शायद यही वजह है कि इन तमाम सपनों को महज़ बकवास बताकर ख़ारिज नहीं किया जा सकता.
बल्लीमारान में हाकिम अहसनुल्लाह खान की हवेली में उसके पुराने माहौल को आज भी महसूस किया जा सकता है. हाकिम खान, बहादुर शाह ज़फ़र के ना सिर्फ़ निजी डॉक्टर थे बल्कि उनके सबसे करीबी सलाहकार भी थे.
थोड़ी ही दूरी पर लाल कुआं में राजा की सबसे युवा रानी ज़ीनत महल का पुश्तैनी घर है जिसे अब स्कूल में तब्दील कर दिया गया है.
वहीं करोल बाग में राव तुला राम स्कूल रेवाड़ी के बहादुर शासक की याद दिलाता है जिनके पूर्वज राव तेज सिंह ने साल 1803 में पटपड़गंज के युद्ध में सिंधिया का साथ दिया था. नवंबर 1857 में नारनौल के युद्ध में जब राव तुला राम हार गए तो वे तांत्या टोपे के साथ शामिल हो गए और 1862 में वे रूस चले गए.
ये भी पढ़ेंः