क्या अजित पवार ने शरद पवार की पार्टी को तोड़ दिया?

    • Author, श्रीकांत बंगाले
    • पदनाम, बीबीसी मराठी संवाददाता

"अजित पवार ने महाराष्ट्र के लोगों की पीठ में चाकू घोंपा है, उन्होंने शरद पवार को धोखा दिया है. उनका शारीरिक हाव भाव शुरू से ही संदेहास्पद रहा था. शरद पवार के साथ उनके घर के सदस्य ने विश्वासघात किया है. यह पैसा और ताक़त का दुरुपयोग है."

महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री के तौर पर अजित पवार के शपथ लेने के बाद ये शिव सेना सांसद संजय राउत की पहली प्रतिक्रिया है.

शनिवार की सुबह आठ बजकर दस मिनट पर देवेंद्र फडणवीस ने मुख्यमंत्री और अजित पवार ने उप मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. लेकिन अभी यह स्पष्ट नहीं है कि अजित पवार ने नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) नेता के तौर पर शपथ लिया है या निर्दलीय विधायक के तौर पर.

शुक्रवार की देर रात तक शिव सेना, एनसीपी और कांग्रेस के एक साथ होने की तस्वीर सामने आई थी और कहा जा रहा था कि महाराष्ट्र में महा विकास अघाड़ी की सरकार बनेगी. लेकिन नाटकीय घटनाक्रम में फडणवीस और अजित पवार ने शनिवार को शपथ लेकर कई अटकलों को जन्म दे दिया है.

चुनाव से पहले और नतीजों के बाद अजित पवार लगातार अपनी नाखुशी जाहिर करते रहे थे. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि अजित पवार ने एनसीपी छोड़ दी है या फिर पार्टी को तोड़ दिया है?

समाचार एजेंसी एएनआई ने जब अजित पवार से पूछा कि क्या उनके फै़सले को शरद पवार का समर्थन हासिल है तो उन्होंने कहा, "मैं शुरू से कह रहा हूं कि हम स्थायी सरकार बनाने के लिए फै़सला लेंगे. लोगों ने किसी एक दल को पूर्ण बहुमत नहीं दिया है. ऐसे में दो या तीन दलों को एक साथ आकर सरकार बनाने की ज़रूरत है. गठबंधन में तीन दलों के बदले दो दलों से सरकार बनाना हमेशा अच्छा होता है."

लेकिन क्या अजित पवार के चाचा और एनसीपी के सुप्रीमो उनके बीजेपी के साथ जाने के फ़ैसले को जानते थे? अजित पवार को कितने विधायकों का समर्थन हासिल है? ये वैसे सवाल हैं जिनके जवाब अभी तक नहीं मिले हैं.

शरद पवार ने ट्वीट किया है, "नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी अजित पवार के फ़ैसले के साथ नहीं है. यह उनका अपना निजी फ़ैसला है."

विद्रोही अजित पवा

वरिष्ठ पत्रकार विजय चोरमारे कहते हैं, "अजित पवार ने विद्रोह किया है. उनके इस फै़सले से केवल एनसीपी ही नहीं टूटी है बल्कि परिवार भी टूट गया है. स्टेट को-ऑपरेटिव बैंक घोटाले में अजित पवार पर एक मामला दर्ज है. सिंचाई घोटाले में भी उनके ख़िलाफ़ जांच चल रही है. इन सबके चलते ईडी की भी जांच चल रही है. यही वजह है कि उन्होंने ये क़दम उठाया है."

विजय चोरमारे कहते हैं, "लेकिन अजित पवार को यह सदन के पटल पर साबित करन होगा कि उनके पास एनसीपी विधायकों का समर्थन है या नहीं. जब तक पार्टी को दो तिहाई विधायकों का समर्थन नहीं मिलेगा तब तक पार्टी में टूट को वैधता नहीं मिलेगी. इसका मतलब है कि उन्हें 54 में 36 विधायकों का समर्थन चाहिए होगा. हमें देखना होगा कि आगे क्या होता है?"

ये भी पढ़ें:

सत्ता की भूख या स्थायी सरकार का दावा

लोकमत समूह के सीनियर एसोसिएट एडिटर संदीप प्रधान कहते हैं, "राज्य में सरकार बनाने का संकट एक महीने से चल रहा था. यह स्पष्ट नहीं था कि कांग्रेस शिव सेना का समर्थन करेगी. यह भी स्पष्ट नहीं था कि उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री बनेंगे. इस पृष्ठभूमि में, अजित पवार ने ये फ़ैसला लिया है. लगता है कि उन्होंने राज्य में स्थायी सरकार बनाने के लिए ये फ़ैसला लिया है."

वहीं राजनीतिक विश्लेषक हेमंत देसाई कहते हैं कि अजित पवार ने सत्ता की भूख के चलते यह क़दम उठाया है. उन्होंने कहा, "अजित पवार एनसीपी को तोड़ने की कोशिश में लगे हुए थे. वे विधानसभा चुनावों से ही इस कोशिश में थे. अजित पवार, सुनील तटकरे, धनंजय मुंडे जैसे एनसीपी नेताओं को लगता रहा है कि राज्य में सत्ता हासिल करनी है तो बीजेपी के साथ ही जाना होगा, क्योंकि बीजेपी की केंद्र में सरकार भी है. अजित पवार और उनका गुट हमेशा सत्ता की लालच में राजनीति करता आया है और यह फ़ैसला भी उसी के चलते लिया गया है."

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)