टेलीकॉम सेक्टर में प्रतिस्पर्धा कम होने से ग्राहकों को क्यों करनी चाहिए चिंता?

    • Author, किंजल पंड्या-वाघ
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

वोडाफ़ोन-आइडिया को बीते हफ़्ते भारत के कॉरपोरेट इतिहास में सबसे बड़ा नुक़सान हुआ है. यह घाटा लगभग 50 हज़ार करोड़ रुपये का है.

बीबीसी संवाददाता किंजल पंड्या-वाघ ने आर्थिक विश्लेषक तथा लेखक प्रांजल शर्मा से ईमेल पर पूछे सवालों के ज़रिए यह जानने की कोशिश की इस भारी नुक़सान के कारण क्या हैं और क्या यह ग्राहकों के लिए भी चिंता का विषय है? पढ़ें प्रांजल शर्मा ने पूछे गये सवालों का क्या जवाब दिया.

वोडाफ़ोन-आइडिया को हुए नुक़सान के कारण क्या हैं?

स्पेक्ट्रम या एयरवेव्स की उच्च लागत, राजस्व साझा करने की नीति और प्रति ग्राहक कम आय की वजह से इस सेक्टर को बहुत नकु़सान उठाना पड़ रहा है.

भारत के टेलीकॉम सेक्टर पर इसका क्या असर पड़ेगा?

भारत टेलीकॉम के लिए एक बड़ा बाज़ार है. इसके बावजूद यहां इस इंडस्ट्री की हालत बहुत नाज़ुक है.

यह बढ़ी लागत, भारी भरकम टैक्स और कम दरों पर सेवाएं मुहैया कराने को लेकर प्रतिस्पर्धा करने में असमर्थ है.

समझा जाता है कि सरकार का रवैया इस सेक्टर को सहयोग देने की जगह इसके उलट है.

सरकार स्पेक्ट्रम की बिक्री, राजस्व में हिस्सेदारी के साथ-साथ टैक्स के ज़रिए भी कमाई करना चाहती है.

ये कंपनियां पहले ही ग्राहकों को कम से कम क़ीमतों पर अपनी सेवाएं प्रदान कर रही हैं और उस पर सरकार इन कंपनियों के टेलीकॉम से अलग हुई अतिरिक्त कमाई से भी हिस्सा चाहती है.

लिहाज़ा कंपनियों को जो रेवेन्यू टेलीकॉम की कमाई से साझा करने चाहिए थे, अब उसका विस्तार कर इसमें टेलीकॉम के अतिरिक्त सेवाओं से हुई कमाई को भी जोड़ा जा रहा है.

भारत के टेलीकॉम सेक्टर में मौजूदा मुद्दे क्या हैं?

भारतीय दूरसंचार बाज़ार की मौजूदा स्थिति के लिए यहां जो भी कंपनियां ऑपरेट करती हैं वो सभी ज़िम्मेदार हैं.

सरकार ने उच्च दरों पर स्पेक्ट्रम की बिक्री की लेकिन साथ ही वो कंपनियों की रेवेन्यू का एक हिस्सा भी लेती है.

स्पेक्ट्रम की नीलामी बेहद ख़राब तरीक़े से आयोजित की गई थी, बाद में इसमें भ्रष्टाचार के आरोप लगे और न्यायपालिका को कई कंपनियों के लाइसेंस रद्द करने पड़े थे.

इसकी वजह से कुछ कंपनियों ने तो बाज़ार ही छोड़ दिए.

फिर टेलीकॉम रेगुलेटर (नियामक) ने लगातार कम क़ीमतों पर सेवाएं मुहैया कराने की कठिन शर्त रख कर कंपनियों को प्रतिकूल परिस्थितियों के लिए भी मजबूर किया.

भारतीय टेलीकॉम बाज़ार पर जियो का क्या असर पड़ा?

उच्च लागत की वजह से टेलीकॉम बाज़ार पहले से ही सिमट गया था और जब जियो आया तो उसकी वजह से पहले से कम क़ीमतों पर मिल रही सेवाओं को और भी सस्ता करने की प्रतिस्पर्धा शुरू हो गई लिहाज़ा पहले से मौजूद कंपनियों की कमाई में और भी कमी आ गई.

और अंत में, ग्राहकों पर इसका क्या असर पड़ेगा, क्या उन्हें चिंता करने की ज़रूरत है?

हां, ग्राहकों को चिंता करने की ज़रूरत है. भले ही भारत में एक अरब सक्रिय मोबाइल यूजर्स हैं, जो कि एक बड़ी संख्या है, लेकिन ग्राहकों के लिए विकल्प अब सीमित होते जा रहे हैं.

जब तक बाज़ार में नई तकनीक को लेकर स्वस्थ प्रतियोगिता नहीं होगी और तेज़ी से निवेश नहीं किया जाएगा, कंपनियों को घाटा होता रहेगा.

इतना ही नहीं, जब बाज़ार में प्रतिस्पर्धा नहीं होगी तो इससे दी जा रही सेवाओं की गुणवत्ता पर असर पड़ेगा और साथ ही इसकी क़ीमतें भी प्रभावित होंगी.

इसके अलावा, सरकारें अपनी व्यापक वित्तीय योजनाओं समेत लगभग सभी कल्याणकारी योजनाओं को जनता तक पहुंचाने के लिए मोबाइल पर निर्भर हैं.

जब इस सेक्टर में अधिक कंपनियां नहीं रहेंगी तो मौजूदा योजनाओं की चमक फीकी पड़ जाएगी और भारत अपने आर्थिक विकास के लिए मोबाइल पर आधारित कनेक्टिविटी का पूरा उपयोग करने में सक्षम नहीं हो सकेगा.

लिहाज़ा, चौथी औद्योगिक क्रांति और इंटरनेट के इस युग में राष्ट्रीय स्तर पर प्रतियोगितात्मकता और उद्यशीलता की दक्षता को बरक़रार रखने के लिए मज़बूत टेलीकॉम सेक्टर आवश्यक है.

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