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मोबाइल कंपनियों को सिर मुंडाते ही ओले क्यों पड़े: नज़रिया
- Author, आशुतोष सिन्हा
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
एक तो करेला दूजा नीम चढ़ा! बीते हफ्ते आया सुप्रीम कोर्ट का आदेश टेलीकॉम कंपनियों के लिए यही संदेश लेकर आया है.
सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि मोबाइल फ़ोन सर्विस देने वाली सभी कंपनियां मिलकर सरकार को क़रीब 90,000 करोड़ रुपये देंगी. सभी कंपनियों को इस रकम का एक हिस्सा देना पड़ेगा.
टेलीकॉम कंपनियों के लाइसेंस के अनुसार अपनी आय में से सरकार को लाइसेंस फ़ीस के लिए देना होता है. ये लाइसेंस फ़ीस कैसे तय की जाए, उसे लेकर सरकार और कंपनियों में मतभेद था जिस पर अब कोर्ट का फ़ैसला आया है.
टेलीकॉम कंपनियों के लिए ये मामला न निगलते बन रहा है और न उगलते. उन्होंने ये तय नहीं किया है कि दीवाली के ठीक पहले आए इस आदेश से कैसे निपटेंगी. लेकिन एक बात तो साफ़ है कि टेलीकॉम कंपनियों की वित्तीय हालत अब और खस्ता होने वाली है.
2016 में जब जियो ने अपनी सर्विस शुरू की थी तो उसने देश भर में मुफ़्त कॉल का वादा किया था. उसके अलावा, इंटरनेट डेटा की कीमतें काफी कम कर दी गई थीं. ग्राहकों को जियो की ये स्कीम बहुत पसंद आई और 10 करोड़ ग्राहक इकठ्ठा करने में उसे बस चंद महीने लगे.
जियो की कीमतें देखकर ग्राहकों की दसों उंगलियां घी में थीं और सर कढ़ाई में.
इस मार से कोई कंपनी अछूती नहीं?
देश के सबसे नए मोबाइल टेलीकॉम कंपनी की इस मार से एयरटेल, वोडाफोन, आइडिया और सरकारी कंपनी बीएसएनएल को सस्ती कीमतों की मार से उबरने का समय भी नहीं मिला है.
पिछले दो सालों में सभी कंपनियों को अपनी कॉलिंग दरों को कम करने पर मजबूर होना पड़ा है. जियो ने कम से कम 49 रुपये में महीने भर फ़ोन करने की सुविधा देकर उसे हर जेब के लायक बना दिया.
मोबाइल कॉल की कीमत पहले से ही गिर रही थी. इसलिए सभी कंपनियां डेटा से होनी वाली कमाई पर भरोसा कर रहे थे. भारत में अब मोबाइल डेटा की कीमतें दुनिया भर में सबसे सस्ती हो गयी हैं जिससे करोड़ों लोगों के लिए स्मार्टफ़ोन रोज़ की ज़िन्दगी का अहम हिस्सा बन गया है.
आइडिया-वोडाफ़ोन के शेयर की कीमत अब कौड़ियों में
जियो के आने के बाद दूसरी कंपनियों को डेटा की कीमत भी कम करने पर मजबूर होना पड़ा. इसलिए अब फ़ेसबुक, व्हाट्सऐप, गूगल, टिकटॉक जैसी सर्विस के लिए भारत अहम बाज़ार बन गया है.
जियो को नए ग्राहक इतनी तेज़ी से मिले कि वो दूसरी सबसे बड़ी मोबाइल फ़ोन कंपनी बन गयी. इसकी गाज गिरी छोटी मोबाइल फ़ोन कंपनियों पर आइडिया और वोडाफ़ोन जो कि तीसरे और चौथे नंबर की मोबाइल फ़ोन कंपनी थी.
मरता क्या न करता! आइडिया और वोडाफ़ोन ने ये तय किया कि दोनों कंपनियों का विलय कर दिया जाना चाहिए ताकि वो आने वाले दिनों में और मज़बूत हो सकें.
ग्राहकों के लिहाज़ से वो देश की सबसे बड़ी मोबाइल फ़ोन कंपनी भी बन गयी. लेकिन उसके बाद वोडाफ़ोन आइडिया नाम की इस नई कंपनी ने लोगों को निराश किया.
शेयर बाज़ार में उनके शेयर की कीमत अब कौड़ियों में है और सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद उसमे सबसे ज़्यादा गिरावट देखी गयी है.
वोडाफ़ोन यूरोप की सबसे बड़ी मोबाइल फ़ोन कंपनी है और वो भारत में 2007 में आयी थी. उस समय उसने हचिसन टेलीकॉम को ख़रीद लिया था और उसके बाद चल रहे टैक्स विवाद के मामले में इनकम टैक्स विभाग का मामला अभी सुलझा नहीं है.
दीवाली के मौके पर रौशनी नदारद
उस मामले में वोडाफ़ोन को, सूद समेत, सरकार को 20,000 करोड़ रुपये से ज़्यादा देना पड़ सकता है. उनके लिए अब आगे कुआँ पीछे खाई वाले हालात बन गए हैं.
बेचारे एमटीएनएल और बीएसएनएल! उन्हें भी सिर मुंडाते ही ओले पड़े. इस दशक की शुरुआत के बाद पहली बार बीएसएनएल को नुकसान हुआ. उसके बाद उसकी स्थिति बद से बदतर होती चली गयी है. पिछले कुछ महीने में उसे अपने कर्मचारियों को तनख्वाह देने में भी दिक्कत हो रही है.
अब सरकार को दोनों कंपनियों के लिए एक पैकेज की घोषणा करनी पड़ी है ताकि उन्हें बाज़ार में स्पर्धा के लिए फिर से तैयार किया जा सके. अब सवाल ये है कि जो मरीज़ आईसीयू में है उसके लिए कितने दिन तक दवा काम करेगी.
धमाके तो बहुत हो रहे हैं लेकिन कुछ कंपनियों के लिए दीवाली के इस मौके पर रौशनी नदारद है. ग्राहकों के लिए अब सबसे सस्ती मोबाइल दरों का समय ख़त्म होता दिख रहा है.
सरकार की सोच साफ़ है - न ऊधो से लेना, न माधो को देना.
अगले वित्तीय वर्ष में वो चाहती है कि 5जी मोबाइल सर्विस के लाइसेंस के लिए कंपनियां बोली लगाएं. इसकी तैयारी शुरू हो चुकी है. सरकार के लिए एकमुश्त मोटी रकम जुगाड़ने का ये बढ़िया मौका है क्योंकि टैक्स से उसकी कमाई कम हो रही है और अपना खर्चा चलाने के लिए उसे पैसे चाहिए.
यानी, ठन-ठन गोपाल सरकार कुछ वैसी ही हालत वाली कंपनियों से, 5जी लाइसेंस के लिए पैसे उगाहना चाहती है.
जहां चाह, वहां राह. 100 करोड़ मोबाइल फ़ोन ग्राहकों वाले बाज़ार में अब कंपनियां अपनी जगह बनाए रखने के लिए कुछ नया सोचने पर मजबूर हैं.
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