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गांधी @ 150: जिसने गांधी से लिया ख़र्च का हिसाब-किताब
- Author, नियास अहमद
- पदनाम, बीबीसी तमिल
1934 में बिहार में भूकंप आया था. शहर को काफ़ी नुक़सान हुआ था और बड़ी संख्या में लोग प्रभावित हुए थे. अपने स्तर से राहत कार्य के लिए गांधी भी बिहार पहुंचे थे. शहर में राहत कार्य की देखरेख राजेंद्र प्रसाद कर रहे थे.
ये कोई छोटा-मोटा काम नहीं था और राजेंद्र प्रसाद अकेले सब कुछ नहीं संभाल सकते थे. उन्होंने जमनालाल बजाज से मदद मांगी और बजाज ने जेसी कुमारप्पा से. तो उन्होंने कुमारप्पा को बिहार में राहत कार्य का वित्तीय सलाहकार नियुक्त कर दिया.
खाते का हिसाब
पैसे को लेकर कुमारप्पा सख़्त आदमी थे. पाई-पाई का हिसाब-किताब रखा जाता था. बिहार में पुनर्वास के काम में लगे स्वयंसेवियों के लिए उन्होंने हर रोज़ तीन आने का जेब ख़र्च तय किया था. पुनर्वास कार्य पर बैठक के लिए गांधी पटना पहुंचे थे. साथ में उनके कुछ अधिकारी भी थे. इस वक़्त तक गांधी का रोज़ाना का ख़र्च भी तीन आने तक पहुंच गया था.
जब कुमारप्पा को ये पता लगा तो उन्होंने गांधी के निजी सचिव महादेव देसाई से दो-टूक कहा, "हम गांधी और उनके अफ़सरों का ख़र्च राहत के चंदे से नहीं उठा सकते. उनका ख़र्च तीन आने से ज़्यादा है. पैसा देना मुश्किल होगा. और गांधी की इस यात्रा में ईंधन के ख़र्च की व्यवस्था के विकल्प भी तलाश लीजिए."
जब गांधी को इस बारे में मालूम हुआ तो उन्होंने कुमारप्पा को बुलाकर इस बारे में पूछा. कुमारप्पा अपनी बात पर क़ायम रहे और वित्तीय मजबूरियां समझाईं. उन्होंने कहा, "ये पैसा लोगों से जुटाया गया है. इसे ख़र्च करने के नियम हैं और ये सभी पर लागू होते हैं." गांधी ने उनकी यह बात स्वीकार कर ली.
तो कुमारप्पा की पहचान एक ऐसे शख़्स के रूप में हो गई जिन्होंने गांधी से पैसों का हिसाब-किताब लिया.
दक्षिण तंजौर से अमरीका तक
जोसेफ़ कार्नेलियस कुमारप्पा मद्रास के तंजौर ज़िले में 4 जनवरी 1892 को जन्मे थे. उनके पिता एसडी कर्नेलियस चेन्नई में पीडब्ल्यूडी में काम करते थे. जेसी कुमारप्पा लंदन और अमरीका में भी रहे थे. कोलंबिया यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान उन्होंने 'भारत क्यों ग़रीबी से जूझ रहा है' विषय पर एक भाषण दिया था.
इस भाषण के बाद उनके लिए बहुत कुछ बदल गया. यह भाषण अमरीका के एक अख़बार में छपा. उनके प्रोफेसर ने वो भाषण पढ़ा और उसी विषय पर उन्हें शोध करने को कहा. इस शोध ने उनकी ज़िंदगी बदल दी. उन्हें मालूम हुआ कि ब्रिटेन भारत का शोषण कर रहा है. इसने उनके भौतिकवादी लक्ष्यों और रहन-सहन को बदल दिया.
कुमारप्पा की गांधी से मुलाक़ात
"क्या आप गांधी हैं?"
"क्या आप कुमारप्पा हैं?"
ये पंक्तियां फ़िल्मी लग सकती हैं लेकिन गांधी शोध संस्थान की वेबसाइट के मुताबिक़ उनकी मुलाक़ात इसी तरह हुई थी.
जब गांधी कुमारप्पा से पहली बार मिले, वे उन्हें नहीं जानते थे. ज़्यादा अहम बात ये थी कि कुमारप्पा भी गांधी को नहीं जानते थे. वेबसाइट के मुताबिक़ उनकी पहली मुलाक़ात साबरमती आश्रम में हुई. गांधी एक पेड़ के नीचे बैठे सूत कात रहे थे. कुमारप्पा वहां से गुज़रे. वे गांधी को नहीं जानते थे इसलिए पांच मिनट तक वहां खड़े रहे. फिर दोनों ने एक दूसरे से उनका परिचय पूछा. दोनों का स्नेहिल संबंध इस तरह शुरू हुआ.
विचारधारा का साम्य
गांधी और कुमारप्पा के विचार और विचारधारा बिल्कुल एक थे. दोनों केंद्रीकरण के विरोधी थे. कुमारप्पा कहते थे, "केंद्रीकरण दमन का एक तरीक़ा है जो सबको नियंत्रित करता है. उद्योगों के नियंत्रण में काफ़ी मज़दूर हैं. अगर हम इस देश में लोकतंत्र चाहते हैं तो हमें अर्थव्यवस्था में भी लोकतंत्र की ज़रूरत है."
वहीं गांधी कहते थे, "दिल्ली सत्ता का केंद्र है. कलकत्ता और बॉम्बे भी. सत्ता के केंद्र शहरों में हैं. मैं ये सत्ता सात लाख गांवों तक पहुंचाना चाहता हूं."
कुमारप्पा जब अखिल भारतीय ग्रामीण उद्योग संगठन के प्रमुख थे तो उन्होंने ग्रामीण व्यापार को बढ़ावा देने के लिए बहुत क़दम उठाए थे.
ये भी कहा जाता है कि गांधी कुमारप्पा को स्वाधीन भारत के पहले वित्त मंत्री के तौर पर देखना चाहते थे.
कुमारप्पा का 1960 में गांधी की बरसी के दिन ही निधन हो गया था.
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