प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से क्यों पढ़ाई के लिए मदद मांग रही है ये बच्ची- बीबीसी स्पेशल

    • Author, अनंत प्रकाश
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

13 साल की ख़ुलदा को घुड़सवारी पसंद है. वो स्विमिंग करती हैं और फ़ुटबॉल खेलती हैं.

फ़र्राटेदार अंग्रेज़ी में बात करने वाली ये बच्ची बड़ी होकर पीवी सिंधु की तरह बैडमिंटन खिलाड़ी बनना चाहती है.

देश के एक नामी निजी स्कूल में पढ़ रहीं ख़ुलदा के लिए ये सब करना राइट टू एजुकेशन एक्ट यानी शिक्षा के अधिकार क़ानून की वजह से संभव हुआ है.

ये क़ानून ईडब्ल्यूएस यानी आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग में आने वाले बच्चों को निजी स्कूलों में मुफ़्त में शिक्षा हासिल करने का हक़ देता है.

लेकिन अब इसी क़ानून की वजह से ख़ुलदा को अपना भविष्य बिखरता दिख रहा है.

ख़ुलदा बताती हैं, "मैं आठवीं क्लास में पढ़ती हूं लेकिन अगर अगले साल मेरे स्कूल ने मुझसे दूसरे बच्चों की तरह फ़ीस मांगी तो मेरी अम्मी को मुझे इस स्कूल से निकालना पड़ेगा. हमारी हालत ऐसी नहीं है कि हम इतने पैसे दे सकें."

राइट टू एजुकेशन एक्ट के तहत आठवीं क्लास के बाद ईडब्ल्यूएस कैटिगरी के बच्चों के घरवालों को उनकी फ़ीस भरनी पड़ती है.

हालांकि, केंद्रीय शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल का कहना है कि सरकार शिक्षा के अधिकार में दिए गए प्रावधानों में बदलाव पर विचार कर रही हैं.

ग़रीब बच्चों की शिक्षा कितनी मुश्किल?

ख़ुलदा के परिवार की वार्षिक आय लगभग एक लाख रुपये है.

लेकिन अगर अगले साल उन्हें अपनी बच्ची की फ़ीस भरनी पड़ी तो इसके लिए हर महीने हज़ारों रुपये ख़र्च करने पड़ेंगे.

ख़ुलदा की मां तस्वीर बानो बताती हैं, "ख़ुलदा के स्कूल ने कह दिया गया है कि हम अगले साल अपनी बच्ची को पढ़ाने के लिए कहीं और इंतज़ाम कर लें या फिर स्कूल की फ़ीस भरने के लिए पैसों का इंतज़ाम कर लें. कोई बताए, हम जैसे लोग जो दो वक़्त की रोटी का इंतज़ाम करने में सक्षम नहीं हैं, वो कैसे हर महीने स्कूल को हज़ारों रुपये की फ़ीस दे पाएंगे?"

अपनी आर्थिक स्थिति बयां करते हुए तस्वीर बानो की आंखें नम हो जाती हैं.

प्यार से अपनी बच्ची को तूबा बुलाने वालीं तस्वीर बानो कहती हैं, "मेरे दोनों बच्चों को शिक्षा के अधिकार क़ानून का फ़ायदा मिला, इन्हें पढ़ाने के लिए मैंने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया है. लेकिन हमारी इतनी औकात नहीं है कि हम इतने बड़े स्कूल की फ़ीस भर सकें. अगर स्कूल वाले तूबा को निकाल देंगे तो हमें इसकी पढ़ाई छुड़ानी पड़ेगी."

उनका कहना है कि वो सरकारी स्कूल में पनी बच्ची को पढ़ाना नहीं चाहतीं क्योंकि वहां शिक्षा और सुरक्षा का स्तर ख़ुलदा के मौजूदा स्कूल जैसा नहीं है.

एनुअल सर्वे ऑफ़ एजुकेशन रिपोर्ट 'असर 2017' के मुताबिक़, भारत में ख़ुलदा जैसी लगभग 40 फ़ीसदी बच्चियां 14 साल की उम्र के बाद स्कूल छोड़ देती हैं.

वर्ल्ड बैंक की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, लड़कियों के स्कूल छोड़ने के पीछे सरकारी स्कूलों की ख़राब हालत, भारी फीस, महिलाओं के लिए असुरक्षित माहौल और शिक्षा का ख़राब स्तर रहा है.

क्यों ख़राब है सरकारी स्कूलों की हालत?

सरकारी स्कूलों की हालत सुधारने को लेकर अलग-अलग स्तर पर प्रयास जारी हैं.

लेकिन आरटीई फ़ोरम के राष्ट्रीय संयोजक अंबरीष राय सरकार की कोशिशों से संतुष्ट नज़र नहीं आते हैं.

वे इसके लिए वर्तमान सरकार को भी ज़िम्मेदार नहीं ठहराते हैं. बल्कि वह सरकारी तंत्र के शिक्षा के प्रति उदासीन रवैये को ज़िम्मेदार मानते हैं.

अंबरीष राय कहते हैं, "भारत में जब बजट का आवंटन होता है तो वरीयता के क्रम में शिक्षा और स्वास्थ्य का स्थान 12वें और 14वें स्थान पर आता है. इससे आप ये अंदाज़ा लगा सकते हैं कि हमारे राजनेता शिक्षा के प्रति कितने संवेदनशील हैं."

"शिक्षा के अधिकार' क़ानून के ज़रिए देश के हर बच्चे को मुफ़्त में शिक्षा हासिल करने का हक़ दिया गया है, यहां ध्यान देने वाली बात ये है कि इसे हक़ कहा गया न कि कोई सुविधा. इसे एक ऐतिहासिक फ़ैसला करार दिया गया."

"लेकिन ये कैसा हक़ हुआ कि आठवीं क्लास के बाद इन बच्चों की सुनने वाला कोई नहीं है. इन बच्चों के माता-पिता फ़ीस भरने में सक्षम नहीं होंगे वो आगे कैसे पढ़ पाएंगे. इस सवाल का जवाब कौन देगा?"

"ईडब्ल्यूएस यानी ग़रीब बच्चों को आरटीई क़ानून में 25 फ़ीसदी कोटा दिया गया ताकि वे निजी स्कूलों में पढ़ सकें. लेकिन आठवीं के बाद इन बच्चों के पास सरकारी स्कूल में जाने के सिवा कोई विकल्प नहीं होता है. क्योंकि इन बच्चों के मां-बाप स्कूलों की भारी फ़ीस भर नहीं सकते हैं और सरकारी स्कूलों की हालत आप इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश से समझ सकते हैं जिसमें कोर्ट ने कहा था कि सरकारी स्कूलों की हालत इसलिए ख़राब है क्योंकि इन स्कूलों में नीति बनाने वाले नेताओं और अधिकारियों के बच्चे नहीं पढ़ते हैं."

सरकारी तंत्र की उदासीनता

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने साल 2015 में एक आदेश पारित करके कहा था कि सभी सरकारी कर्मचारियों और जजों के बच्चों को सरकारी स्कूलों में ही पढ़ाया जाना चाहिए ताकि उन्हें ये अहसास हो सके कि इन स्कूलों में किन मूलभूत सुविधाओं की कमी है.

कोर्ट ने इस आदेश में ये भी कहा था कि अगर किसी भी सरकारी अधिकारी या नेता के बच्चे निजी स्कूल में पढ़ेंगे तो उनसे जुर्माना वसूला जाएगा.

राय बताते हैं, "सरकारी तंत्र की सरकारी स्कूलों की ख़राब हालत के प्रति उदासीनता इससे पता चलती है कि सरकार कोर्ट के इस आदेश के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट गई और इस आदेश पर स्टे ले आई. और यही वजह है कि लोग चाहें कितने भी ग़रीब हों वो अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में नहीं पढ़ाना चाहते हैं."

बीबीसी ने जब ख़ुलदा से ये पूछा कि क्या वो 9वीं कक्षा में एक सरकारी स्कूल में पढ़ना चाहेंगी.

इस सवाल के जवाब में ख़ुलदा कहती हैं, "अल्लाह से मेरी यही दुआ है कि स्कूल वाले मेरी फ़ीस माफ़ कर दें और मुझे 12वीं क्लास तक फ्री में पढ़ने दें. हम इस लायक नहीं हैं कि इतनी फ़ीस भर सकें. लेकिन अगर ऐसा हुआ नहीं हुआ तो मैं सरकारी स्कूल में दाख़िला नही लूंगी क्योंकि वहां पर लोग 'ग़लत बातें' करते हैं और 'अपशब्दों' का प्रयोग करते हैं."

ख़ुलदा अपने वर्तमान स्कूल में ही पढ़ना चाहती हैं.

वह कहती हैं, "मैं इसी स्कूल में 12वीं तक पढ़कर बैडमिंटन खिलाड़ी बनना चाहती हूं. मैं पढ़ाई भी करूंगी, बस स्कूल मेरी फ़ीस माफ़ कर दे. सरकार को मेरी जैसी तमाम बच्चियों के बारे में सोचकर फ़ीस माफ़ कर देनी चाहिए. हमारे पास इसके सिवा आगे पढ़ने का कोई और चारा नहीं है."

बच्चों को मिलता है शिक्षा का अधिकार?

ख़ुलदा जैसी कई बच्चियां 'शिक्षा का अधिकार' क़ानून की वजह से बेहतरीन प्राथमिक शिक्षा हासिल करने में सफल हुई हैं.

इस क़ानून को पास किए जाते समय ये कहा गया था कि शिक्षा देश के हर बच्चे का मूल अधिकार है.

भारतीय क़ानून में बच्चों की उम्र शून्य से 18 साल तक तय की गई है.

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या राइट टू एजुकेशन सही मायनों में ख़ुलदा जैसे बच्चों को पढ़ने का अधिकार दिलाने में कामयाब रहा है.

बच्चों की शिक्षा के अधिकार से जुड़े कई मामलों पर दिल्ली हाई कोर्ट में कई केस लड़ चुके वरिष्ठ वकील अशोक अग्रवाल राइट टू एजुकेशन एक्ट को देश के बच्चों के साथ किया गया मज़ाक मानते हैं.

इस एक्ट पर सवाल उठाते हुए वह कहते हैं, "क्या भारत की सरकारों ने देश के बच्चों के साथ एक तरह का मज़ाक नहीं किया है? विशेषत: कमजोर आर्थिक वर्ग के बच्चों के साथ ये एक भद्दा मज़ाक है. आठवीं तक प्राइवेट स्कूलों में पढ़ने के बाद इन बच्चों की हालत कटी पतंग जैसी हो जाती है. सरकार अगर सच में देश के भविष्य के प्रति संवेदनशील है तो इन बच्चों के लिए 12वीं तक मुफ़्त शिक्षा सुनिश्चित क्यों नहीं करवाती?"

क्या करेगी सरकार?

आरटीई के तहत मुफ़्त शिक्षा के दायरे को 12वीं तक बढ़ाने पर मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने लगभग चार महीने पहले दिल्ली हाई कोर्ट को अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा था कि ये एक बड़ा नीतिगत मुद्दा है जिस पर नई सरकार के गठन के बाद ही विचार किया जा सकता है.

नई सरकार के गठन के बाद डॉ. के कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता में बनी कमेटी ने सरकार को नई शिक्षा नीति का ड्राफ़्ट सौंप दिया है.

इस नीति में आरटीई के दायरे को 12वीं तक बढ़ाने की अनुशंसा की गई है.

इन सुझावों को अमल में लाने के लिए भारत सरकार को अपने शिक्षा बजट में 10 से 20 फीसदी बढ़त करनी होगी.

लेकिन शिक्षा बजट में इतना पैसा नहीं है कि शिक्षा पर ख़र्च को बढ़ाया जा सके.

यही नहीं, सरकार साल दर साल शिक्षा पर अपने ख़र्च को घटाती जा रही है.

इंडिया स्पेंड की एक रिपोर्ट के अनुसार, साल 2014-15 में सरकार ने 38,607 करोड़ रुपये खर्च किए थे तो साल 2019 तक आते आते ये बजट 37 हज़ार करोड़ रुपये हो गया.

बीच के दो सालों में सरकार ने स्कूली शिक्षा पर सिर्फ़ 34 हज़ार करोड़ रुपये खर्च किया.

लेकिन इसके साथ ही एक सवाल ये पैदा होता है कि भारत सरकार आख़िर कब शिक्षा के प्रति संवेदनशील होकर ये सुनिश्चित करेगी कि देश के बच्चों को बेहतर शिक्षा मिल सके.

बीबीसी ने इस मुद्दे पर केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री रमेश पोखरियाल निशंख के विचार जानने की कोशिश भी की.

पोखरियाल बताते हैं, "नई शिक्षा नीति के ड्राफ़्ट में कई सुझाव आए हैं. इनमें आरटीई का दायरा 12वीं तक करने, तीन साल के बच्चों को खेल-खेल में पढ़ाने जैसे कई विचार हैं. सरकार इन पर विचार करेगी और जब नीति को अंतिम रूप दिया जाएगा तो उसकी सूचना सभी के पास पहुंच जाएगी.

सरकार की ओर से आठवीं के बाद की शिक्षा को मुफ़्त और अनिवार्य बनाए जाने पर किसी तरह का ठोस जवाब नहीं मिल सका.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से गुज़ारिश करते हुए ख़ुलदा कहती हैं, "मेरी बस यही दुआ है कि प्रधानमंत्री मोदी मेरे जैसी देश की सभी बच्चियों को 12वीं तक फ़्री में पढ़ने का मौक़ा दें ताकि हम अपने सपनों को पूरा कर सकें."

लेकिन सवाल बरक़रार है कि ख़ुलदा जैसी बच्चियां कब तक ग़रीबी की वजह से अपने सपनों को बिखरते हुए देखती रहेंगी.

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