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हिमाचल प्रदेश: स्कूल बसों में आपके बच्चे कितने सुरक्षित हैं?
- Author, सरोज सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा ज़िले के नूरपुर में एक प्राइवेट स्कूल की बस हादसे का शिकार हो गई. बस में सवार 27 लोगों की मौत हो गई.
मरने वालों में ज़्यादातर बच्चे हैं. बस में लगभग 35 बच्चे सवार थे. मरने वालों में एक ड्राइवर, दो टीचर, बाक़ी बच्चे थे.
हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री ने पूरे मामले की मजिस्ट्रेट जांच के आदेश दे दिए हैं.
मीडिया से बात करते हुए मुख्यमंत्री जय राम ठाकुर ने कहा, "जांच रिपोर्ट के आने के बाद एक उच्च स्तरीय बैठक करेंगे. जितने भी हिमाचल में स्कूल हैं प्राइवेट और सरकारी उसमें बच्चों को घर से ले जाने और छोड़ने के नियम हैं, उस पर दोबारा से विचार करेंगे. जरूरत पड़ने पर नए नियम भी बनाए जाएंगे."
क्या रफ्तार ने ली बच्चों की जान?
बस में ही सवार एक बच्चे रणवीर ने बीबीसी को बताया कि स्कूल से घर वापसी के रास्ते में बस के साथ-साथ एक तेज रफ्तार बाइक चल रही थी.
रणवीर के मुताबिक, "स्कूल बस चलाने वाले ड्राइवर ने कहा चलो रेस लगाएं, जिसके बाद बस दुर्घटनाग्रस्त हो गई."
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या स्कूल बस की रफ्तार ज्यादा थी? आख़िर स्कूल बस की रफ्तार कितनी होनी चाहिए?
क्या स्कूल बस के लिए कोई गाइडलाइन भी है जिसका पालन करना सभी के लिए अनिवार्य होता है?
यही सवाल बीबीसी ने कांगड़ा के जिला कलेक्टर संदीप कुमार से पूछा.
उन्होंने कहा, "ये जांच का विषय है कि हादसे के वक्त बस की स्पीड कितनी थी. इस वक्त इस पर टिपण्णी कर पाना मुश्किल है."
स्कूल बस गाइडलाइन
स्कूल बस के लिए सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन के मुताबिक :
- सभी स्कूल बस में स्पीड गवर्नर लगे होने चाहिए.
- किसी भी सूरत में बस की रफ्तार 40 किलो मीटर प्रति घंटा से ज्यादा नहीं हो सकती.
- चलती बस में बच्चों को खड़ा नहीं होना चाहिए. बच्चे इसका पालन करें, ये सुनिश्चित करने के लिए स्कूल बस में टीचर का होना अनिवार्य है.
- बस में तय क्षमता के मुताबिक की छात्र हो सकते हैं.
- बस में दो इमर्जेंसी दरवाज़े होने चाहिए ताकि आपात स्थिति में अंदर फंसे लोगों को निकालने में आसानी हो.
- बस में लॉक, फ़ॉयर एक्सटिंग्विशर (आग बुझाने वाला उपकरण) और फ़र्स्ट ऐड की सुविधा मौजूद होनी चाहिए.
बीबीसी संवाददाता सरबजीत धालीवाल के मुताबिक नूरपुर हादसे में स्कूल बस में तकरीबन 35 बच्चे सवार थे. स्कूल बस छोटी टेम्पो ट्रैवलर थी, जिसमें शुरुआती जांच में पता चला कि क्षमता से ज़्यादा लोग सवार नहीं थे.
हादसे के बाद राहत काम के लिए पहुंचे पिरथी पाल सिंह ने बीबीसी बताया कि बस को काटकर लाशों और ज़ख़्मियों को बस से बाहर निकाला गया था.
स्कूल के लिए दिशानिर्देश
सुप्रीम कोर्ट की दिशा-निर्देशों के अनुसार स्पीड लिमिट के आलावा भी कई और बाते हैं जिनका पालन स्कूलों को करना चाहिए.
- हर स्कूल बस का रंग पीले रंग का होना चाहिए.
- बस के आगे और पीछे जरूर लिखा होना चाहिए, "ON SCHOOL DUTY"
- बस की खिड़कियों पर लोहे के ग्रिल लगे होने चाहिए.
- बस के पीछे स्कूल का नाम और पता भी लिखा होना चाहिए
नूरपुर हादसे की जगह से जो शुरूआती तस्वीर सामने आई है उसके मुताबिक स्कूल बस पीले रंग की थी. यानी रंग के मामले में स्कूल प्रशासन ने अनदेखी नहीं की है.
ड्राइवर के लिए नियम
हालांकि हादसे के बाद बस ड्राइवर और स्कूल प्रशासन के खिलाफ मामला दर्ज़ कर जांच शुरू कर दी गई है.
खबरों के मुताबिक स्कूल बस के ड्राइवर की उम्र 60 साल से ज्यादा थी और कुछ साल पहले ड्राइवर को हार्ट अटैक भी आया था.
ये सवाल पत्रकारों ने जब सीएम जयराम ठाकुर से किया तो उन्होंने साफ किया कि इन दावों की पुष्टि के लिए जांच रिपोर्ट का इंतजार करना पड़ेगा.
नियम बस में तैनात ड्राइवर और कंडक्टर के लिए भी मौजूद हैं, जिनके मुताबिक-
- स्कूल बस के ड्राइवर को कम से कम पांच साल का गाड़ी चलाने का अनुभव होना चाहिए.
- बस के ड्राइवर का शिक्षित होना ज़रूरी है.
- ड्राइवर हमेशा वर्दी में होना चाहिए और उसकी कमीज़ पर उसका नाम लिखा होना चाहिए.
- किसी ड्राइवर का अगर ओवर स्पीडिंग, शराब पी कर गाड़ी चलाने, या फिर लेन में गाड़ी न चलाने के लिए चालान किया गया हो तो उसे छह महीने तक स्कूल बस का ड्राइवर नहीं बनाया जा सकता. उसे ऐसा करते पाए जाने पर ड्राइवर को सस्पेंड किया जा सकता है.
दुनिया भर में क्या है नियम
हालांकि स्कूल बस में हर सीट पर सीट बेल्ट हो, ऐसा नियम अभी भारत में नहीं है.
अक्सर इस तरह के हादसों के बाद चर्चा होती है कि स्कूल बस में सीट बेल्ट अनिवार्य कर दिया जाना चाहिए.
इंटरनेशनल रोड ट्रांसपोर्ट यूनियन की रिपोर्ट के मुताबिक यूरोप के कई शहरों में हर यात्री के लिए बस में भी सीट बेल्ट पहनना जरूरी है.
साल 2008 की इस रिपोर्ट के मुताबिक बेल्जियम में स्कूल बस में बच्चों के लिए सीट बेल्ट अनिवार्य है और ये सुनिश्चित करना बस में मौजूद टीचर का काम है.
स्कॉटलैंड की बात करें तो वहां भी पिछले साल इस तरह की मांग उठी है कि स्कूल बसों में सीट बेल्ट को अनिवार्य बनाया जाए.
लेकिन अभी तक वहां भी ये कानून नहीं बन पाया है. हालांकि स्कूल प्रशासन चाहे तो इसके लिए मांग कर सकते है.
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