बोरिस जॉनसन के पास अब क्या हैं विकल्प?

यूरोपीय संघ
    • Author, ज़ुबैर अहमद
    • पदनाम, बीबीसी संवददाता दिल्ली 

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने कह रखा है कि डील हो या ना हो, 31 अक्तूबर तक ब्रिटेन यूरोपीय संघ से अलग हो जाएगा. इस समयसीमा को टलवाने के लिए उनकी सत्तारूढ़ कंज़र्वेटिव पार्टी में उन्हें विद्रोह का सामना है.

वो और विपक्ष के सांसद ये चाहते हैं कि ब्रिटेन संघ से बाहर होने से पहले इसके साथ एक ठोस समझौता करे जिसके लिए प्रयाप्त समय चाहिए. इसीलिए वो डेडलाइन को बढ़ाना चाहते हैं इस डेडलाइन को आगे बढ़ाने के लिए बाग़ी और विपक्षी सांसदों ने एक नया बिल लाया जिसे सोमवार को भारी बहुमत से पारित कर दिया गया जो अब क़ानून बन चुका है. 

नया क़ानून कहता है कि स्वयं प्रधानमंत्री यूरोपीय संघ के अध्यक्ष से 19 अक्तूबर को अनुरोध करेंगे कि 31 अक्तूबर की समयसीमा बढ़ा दी जाए. 

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बोरिस जॉनसन का कहना है कि वो अपने ब्रेक्ज़िट की समयसीमा में देरी नहीं करेंगें चाहे कोई डील हो या ना हो. उन्होंने कहा कि ब्रेक्ज़िट की समयसीमा में देरी की बजाय वो 'एक खाई में मरना' पसंद करेंगें.

अपनी बात मनवाने के लिए उन्हों ने अक्तूबर में आम चुनाव कराने की धमकी दे रखी है. लेकिन नए क़ानून का मतलब ये हुआ कि प्रधानमंत्री की ब्रेक्ज़िट से पहले आम चुनाव कराने की कोशिश को क़ानूनी तौर पर रोक लगा दी गयी है. 

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प्रधानमंत्री अक्तूबर के मध्य में आकस्मिक चुनाव कराना चाहते थे, लेकिन इसके लिए उन्हें संसद में दो-तिहाई बहुमत की ज़रुरत थी जो उन्हें नहीं मिली.

सांसदों को इस बात का शक है कि वो 31 अक्तूबर से पहले आम चुनाव की घोषणा तो कर देंगे लेकिन चुनाव से कुछ दिन पहले इसे स्थगित कर देंगे ताकि 31 अक्तूबर को ब्रिटेन यूरोपीय संघ से बग़ैर किसी समझौते के बाहर हो जाए. अब क्या होगा? प्रधानमंत्री ने संसद को पांच सप्ताह के लिए निलंबित कर दिया है ताकि वो, अपने हाथ बंधे होने के बावजूद, अपनी ब्रेक्ज़िट नीति को अमली जामा पहनाने की कोशिश जारी रखें. राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार बोरिस जॉनसन के लिए कुछ विकल्प अब भी उपलब्ध हैं. ऐसे पांच विकल्पों पर एक नज़र:

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प्रधानमंत्री डेडलाइन को ना मानें

प्रधानमंत्री नए क़ानून को ना मानें. विश्लेषकों के अनुसार प्रधानमंत्री ब्रिटिश संसद में पारित नए क़ानून का पालन न करते हुए 31 अक्तूबर वाली डेडलाइन के तहत यूरोपीय संघ से बाहर हो जाएँ. लेकिन अगर उन्होंने ये फ़ैसला किया तो उन्हें अदालत में चुनौती दी जा सकती है और उन्हें जेल भी जाना पड़ सकता है. अगर ऐसा हुआ तो अगली बार जब भी चुनाव हो उन्हें सियासी फ़ायदा हो सकता है लेकिन इसमें रिस्क बहुत है. प्रधानमंत्री के दफ़्तर ने इस बात से इंकार किया है कि वो क़ानून का पालन नहीं करने का इरादा रखते हैं.

एफ़टीपीए में संशोधन

अब जब कि ये साफ़ है कि जॉनसन को फिक्स्ड टर्म पार्लियामेंट एक्ट (एफ़टीपीए) के तहत चुनाव कराने के लिए दो-तिहाई बहुमत प्राप्त नहीं हो सकता है, वो एफ़टीपीए में संशोधन करके चुनाव करवा सकते हैं. वो ऐसा एक बिल लाकर कर सकते हैं जिसमें उन्हें ये कहना है कि चुनाव कराने के लिए दो-तिहाई के बजाय केवल एक साधारण बहुमत की आवश्यकता होगी. लेकिन विश्लेषकों के अनुसार अब प्रधानमंत्री को साधारण बहुमत मिलना भी मुश्किल है. इसलिए वो शायद ऐसा क़दम न उठायें. 

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यूरोपीय संघ को देरी करने की अपील प्रधानमंत्री के पास एक विकल्प ये है कि वो यूरोपीय संघ को ख़ुद एक चिट्ठी लिखें जिसमे यूरोपीय संघ से निकलने की 31 अक्तूबर की समयसीमा को बढ़ाने की अपील करें और जब देश और विपक्ष को इत्मीनान हो जाए कि अब समयसीमा बढ़ गयी है वो चुपके से यूरोपीय संघ को एक दूसरी चिट्ठी लिखें और कहें कि माफ़ कीजिये गए हमें 31 अक्तूबर की समयसीमा मंज़ूर है और हम उस दिन ही यूरोपीय संघ से बाहर होना चाहते हैं. 

प्रधानमंत्री नए क़ानून के प्रावधान को ना मानें

सोमवार पारित किये गए नए क़ानून के तहत प्रधानमंत्री ख़ुद यूरोपीय संघ से अपील करेंगे कि संघ से ब्रिटेन के बाहर होने की समयसीमा बढ़ा दें. लेकिन कई विशेषज्ञ कहते हैं कि प्रधानमंत्री चाहें तो ऐसा करने से इंकार कर सकते हैं. मगर इसमें उन्हें क़ानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है. शायद वो इस विकल्प के लिए फ़िलहाल तैयार न हों.

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यूरोपीय संघ की किसी सदस्य देश से वीटो के इस्तेमाल की अपील ब्रिटेन की समयसीमा बढ़ाने की तारीख़ को बढ़ाने के लिए यूरोपीय संघ के सभी 27 सदस्य देशों की मंज़ूरी लाज़मी है. कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि बोरिस जॉनसन यूरोपीय संघ के सदस्यों में से किसी एक को ये कह सकते हैं कि वो तारीख़ बढ़ाने को मंज़ूरी न देने का फ़ैसला करें ताकि ब्रिटेन अपने निर्धारित समय यानी 31 अक्तूबर को ही संघ से बाहर हो जाए. संघ में पोलैंड समेत कुछ पूर्वी यूरोप के सदस्य हैं जो ऐसा कर सकते हैं लेकिन वो इस बात का भी ध्यान रखेंगे कि ब्रेक्ज़िट के बाद अगर प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन के इलावा कोई और हुआ तो उन्हें दिक्क़त हो सकती है. 

वैसे अब तक ब्रिटेन को संघ से अलग होने की डेडलाइन जब भी बढ़ाई गयी है किसी भी सदस्य देशों ने इसका विरोध नहीं किया है. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)