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#Chandrayaan2: चांद पर जब चंद्रयान-2 उतरेगा तो क्या होगा
- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बंगलुरु से, बीबीसी हिंदी के लिए
भारत का सबसे प्रतिष्ठित अंतरिक्ष कार्यक्रम चंद्रयान-2 दुनिया के तमाम देशों की मुहिम, 'चलो फिर चांद पर चलें' के लिए बेहद अहम इनपुट मुहैया कराएगा.
ये भी हो सकता है कि इसी की बुनियाद पर आगे चल कर इंसान चांद पर पहला पर्यवेक्षण केंद्र भी बनाए.
शनिवार को तड़के भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के वैज्ञानिक रिमोट से चंद्रयान मिशन के विक्रम लैंडर को धीरे-धीरे चंद्रमा पर उतारेंगे.
विक्रम लैंडर चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर उतरेगा. उसे चंद्रमा पर उतरने के लिए ज्वालामुखी के दो गड्ढों के बीच उतरने की जगह चुननी है.
फिर विक्रम लैंडर से प्रज्ञान नाम का रोवर निकल कर चंद्रमा की सतह पर चहलक़दमी करेगा.
चंद्रयान-1 और चंद्रयान-2 मिशन के पूर्व प्रोजेक्ट डायरेक्टर डॉक्टर मयिलस्वामी अन्नादुरै ने बीबीसी हिंदी को बताया कि, 'चंद्रयान-2 दुनिया के फिर चांद पर जाने की मुहिम की बुनियाद रखने वाला मिशन है. ख़ास तौर से चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर.
चंद्रयान-2 मिशन से जो जानकारियां मिलेंगी, उससे ये हो सकता है कि भविष्य में इंसान चांद के दक्षिणी ध्रुवीय इलाक़े में उतरे.'
अमरीका, रूस और चीन के बाद, भारत चंद्रमा पर किसी अंतरिक्ष यान की सॉफ्ट लैंडिंग कराने वाला चौथा देश होगा.
लेकिन, चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर कोई यान भेजने वाला भारत पहला देश है. अब तक चांद पर गए ज़्यादातर मिशन इसकी भूमध्य रेखा के आस-पास ही उतरे हैं.
क्यों ख़ास है ये लैंडिंग?
अगर भारत के प्रज्ञान रोवर के सेंसर चांद के दक्षिणी ध्रुवीय इलाक़े के विशाल ज्वालमुखीय गड्ढों से पानी के सबूत तलाश पाते हैं, तो वैज्ञानिक ये मानते हैं कि आगे चल कर चांद पर इंसान के रहने वाले स्पेस स्टेशन बनाए जा सकेंगे.
माना जाता है कि चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर स्थित पुराने ज्वालामुखी के गड्ढों में भारी तादाद में पानी मौजूद है.
चंद्रयान-2 मिशन, अमरीकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के 2024 में चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर भेजे जाने वाले प्रस्तावित मिशन में भी काफ़ी मददगार साबित हो सकता है.
चंद्रयान-2 का विक्रम लैंडर, शनिवार को तड़के 1 बज कर चालीस मिनट के आस-पास चंद्रमा पर उतरने का प्रयास करेगा. इसरो के चीफ़ डॉक्टर के. सिवन इसे 'मिशन का सबसे डरावना पल' कहते रहे हैं.
लेकिन, बंगलुरू के प्रोफ़ेसर यूआर राव सैटेलाइट सेंटर के पूर्व निदेशक डॉक्टर टी के एलेक्स ने बीबीसी से कहा है कि, "निश्चिंत रहिए. लैंडिंग के वक़्त कुछ भी डरावना नहीं होगा. ये किसी एयरपोर्ट पर विमान के उतरने जैसा ही होगा. इसमें कुछ भी नाटकीय नहीं होगा. ये इस मिशन के एक हिस्से का अंत होगा और पूरी तरह से अपनी योजना के मुताबिक़ होगा."
डॉक्टर मयिलस्वामी अन्नादुरै कहते हैं, "अभी ये कहना ठीक होगा कि हम शायद चंद्रयान-3 के दौरान विक्रम लैंडर को वापस धरती पर लाने की कोशिश करेंगे. हो सकता है कि हम मंगलयान-2 मिशन के दौरान विक्रम लैंडर को मंगल ग्रह की सतह पर उतारने की कोशिश करें. अभी विक्रम लैंडर का चंद्रमा पर उतरना चंद्रयान-1 और मंगलयान से आगे का वाजिब क़दम है. इसी कड़ी में अगला क़दम चंद्रमा पर उतरने का है."
डॉक्टर एलेक्स कहते हैं कि, "चंद्रमा पर मानवयुक्त मिशन भेजने पर काम पहले से ही शुरू हो चुका है और अगले साल हम सूरज के अध्ययन के लिए मिशन भेजने वाले हैं. हम एक बार में एक ही मिशन पर ध्यान लगा रहे हैं."
प्रोफ़ेसर यू आर राव सैटेलाइट सेंटर के एक और पूर्व निदेशक डॉक्टर रामभद्रन अरावमुदन श्रीहरिकोटा सैटेलाइट लॉन्च सेंटर के भी प्रमुख रहे हैं.
अरावमुदन कहते हैं, "दूसरे देशों के पास ताक़तवर रॉकेट हैं, जो उनके स्पेसक्राफ्ट को चांद तक पहुंचा सकते हैं. लेकिन हमने सीमित संसाधनों की मदद से अपना मिशन भेजा है. और कम ऊर्जा में चांद तक पहुंचने के अपने मिशन को क़ामयाब होने लायक़ बनाया है."
डॉक्टर रामभद्रन अरावमुदन कहते हैं, "चंद्रयान-2 प्रोजेक्ट इस बात की शानदार मिसाल है कि हमने रिमोट सेंसिंग और सैटेलाइट संचार के उपलब्ध हार्डवेयर और तकनीक की मदद से चंद्रमा पर भेजा जाने वाला मिशन तैयार किया है. इसके लिए हमने उपलब्ध तकनीक में थोड़े बहुत हेर-फेर के साथ अंतरिक्षयान को चंद्रमा पर उतरने के लिए तैयार किया है."
डॉक्टर रामभद्रन अरावमुदन कहते हैं, "अभी तो नहीं, लेकिन, आगे चलकर, शायद आज से 50 साल बाद हमारे पास ऐसी तकनीक होगी जिसकी मदद से हम लोगों को चांद की सैर पर ले जा सकेंगे."
डॉक्टर अन्नादुरै कहते हैं, "हमारे पहले के मिशन यानी चंद्रयान-1 और मंगलयान से बहुत से युवाओं को प्रेरणा मिली है. इससे भारत की कम पैसे और कम समय में स्पेस मिशन बनाने वाले देश की छवि बनती है. इससे हमें उन देशों के अंतरिक्ष मिशन भेजने का मौक़ा मिलता है, जिनके पास ख़ुद की तकनीक और सुविधाएं नहीं हैं."
चंद्रयान-1 मिशन ने चंद्रमा के ध्रुवीय इलाक़े में मून इम्पैक्ट प्रोब को उतारा था. पूर्व राष्ट्रपति डॉक्टर एपीजे अब्दुल कलाम का सुझाव था कि इस पर भारत का तिरंगा लगा होना चाहिए.
चंद्रयान-1 मिशन के दौरान 15 किलो का मून इम्पैक्ट प्रोब ऑर्बिटर से अलग होकर चांद की सतह पर गिरा था.
इस प्रोब में नासा का एम-3 नाम का एक यंत्र था, जिसका पूरा नाम द मून मिनरोलॉजी मैपर था. इसी की मदद से इस बात की पुष्टि हुई थी कि चंद्रमा की मिट्टी पर पानी है.
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