मध्यप्रदेश में कांग्रेस सरकार के भीतर क्यों मचा घमासान?- नज़रिया

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- Author, गिरिजा शंकर
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
यदि किसी पार्टी में मुख्यमंत्री से उनके ही समकक्ष नेता पत्र लिखकर बात करें और उस पत्र को सार्वजनिक करें तो समझ लीजिए कि उस पार्टी में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है.
ये हाल मध्य प्रदेश कांग्रेस का है जिसके लिए कुछ भी ठीक नहीं चल रहा है, कहना बेहतर रहेगा.
हाल ही में कमलनाथ सरकार के एक मंत्री उमंग सिंघार ने दिग्विजय सिंह की शिकायत पार्टी अध्यक्ष से कर दी कि वे मंत्रियों के काम में दबाव बनाने के साथ-साथ पार्टी को नुक़सान पहुंचाने का काम कर रहे हैं.
दरअसल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने सभी मंत्रियों को पत्र लिखकर उनके द्वारा की गई सिफारिशों के कम्प्लायंस की जानकारी मांगी थी. जिस पर उमंग सिंघार सहित कुछ अन्य मंत्रियों ने आपत्ति की.
उनका कहना था कि वो अपने कामों के लिए मुख्यमंत्री के प्रति उत्तरदायी हैं. अगर हर राज्यसभा सदस्य या अन्य नेता को इस तरह कम्प्यालंस करना पड़े तो काम करना मुश्किल हो जाएगा.

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दिग्विजय पर आरोप, आलाकमान में चुप्पी
उमंग ने तो मीडिया के सामने खुलकर दिग्विजय सिंह पर माफियाओं के साथ मिले होने का आरोप भी लगाया. उमंग सिंघार के इन आरोपों पर मुख्यमंत्री कमलनाथ सहित पार्टी आलाकमान खामोश है.
मंत्रियों को यह हिदायत ज़रूर दे दी गई है कि सार्वजनिक बयानबाज़ी और आरोप-प्रत्यारोप ना करें. इसके बावजूद कांग्रेस से कोई ना कोई विधायक, मंत्रियों पर या तो आरोप लगाते हुए या उन आरोपों का खंडन करते हुए बयान जारी कर रहे हैं.
इस बयानबाज़ी को मध्यप्रदेश में कांग्रेस के तीन दिग्गज नेताओं की आपसी प्रतिद्वंदिता और गुटबाज़ी के तौर पर देखा जा रहा है.
उमंग सिंघार ने जब दिग्विजय सिंह पर आरोप लगाए तो उस पर सभी बड़े कांग्रेसी नेताओं ने चुप्पी साधे रखी. इतना ही नहीं पार्टी के दूसरे दिग्गज नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया ने इन आरोपों को जायज़ तक ठहरा दिया.
ज्योतिरादित्य सिंधिया ने तो मुख्यमंत्री कमलनाथ से आग्रह तक कर दिया कि वो दोनों नेताओं को बैठाकर इस मामले का हल निकाले क्योंकि उमंग द्वारा उठाए गए मुद्दे गंभीर हैं.

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कांग्रेस में गुटबाज़ी
ज्योतिरादित्य के इस बयान को गुटबाज़ी के तौर पर ही देखा जा रहा है.
मध्यप्रदेश में कांग्रेस के मुख्यमंत्री कमलनाथ, पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह और पूर्व केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीच वर्चस्व की लड़ाई विधानसभा चुनाव के वक़्त से ही चल रही है.
चुनाव से पहले प्रदेश अध्यक्ष बनने और चुनाव के बाद मुख्यमंत्री बनने की बाज़ी कमलनाथ के हाथ लगी. ऐसे में बाकी दोनों नेता अपनी-अपनी चालों में लग गए. यही वजह है कि कमलनाथ को भी अपनी चालें चलनी पड़ रही हैं.
ज्योतिरादित्य सिंधिया प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के रास्ते मुख्यमंत्री पद के दावेदार हैं, तो वहीं दिग्विजय सिंह सरकार में अपनी निर्णायक भूमिका बनाए हुए हैं.
इसे देखते हुए मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी यह व्यंग्य करने से नहीं चूकते कि मुख्यमंत्री तो कमलनाथ हैं लेकिन सरकार दिग्विजय सिंह चला रहे हैं. मंत्री उमंग सिंघार के आरोप ने उनके व्यंग्य को धरातल दे दिया.

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मध्यप्रदेश कांग्रेस में खींचतान का इतिहास
ऐसा नहीं माना जाना चाहिए कि मध्यप्रदेश में कांग्रेस के बड़े नेताओं के बीच वर्चस्व की यह लड़ाई इसलिए है कि कांग्रेस में राष्ट्रीय स्तर पर नेतृत्व का संकट है.
ऐसा खुला संघर्ष मध्यप्रदेश कांग्रेस में तब भी हुआ था, जब जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी जैसे ताकतकवार नेता पार्टी अध्यक्ष हुआ करते थे.
1965 के विधानसभा चुनाव में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष मूलचंद देशधारा ने पार्टी के भीतर घमासान कर अपनी ही पार्टी के मुख्यमंत्री कैलाशनाथ काटजू को चुनाव हरवा दिया. इसकी वजह यह थी कि देशधारा नेहरू विरोधी थे और काटजू को नेहरू ने चुना था.
इसके बाद देशधारा को अध्यक्ष पद से हटा दिया गया और इस गुट के नेता तखतमल जैन को राज्य की राजनीति से बाहर करते हुए दिल्ली में कांग्रेस का महासचिव बनाया गया था.
1980 में अर्जुन सिंह को संजय गांधी की पसंद पर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया गया तो उन्हें पूरा कार्यकाल शुक्ल बंधुओं, प्रकाश चंद सेठी, मोतीलाल वोरा और माधवराव सिंधिया से जूझना पड़ा.
अलबत्ता दिग्विजय सिंह को इस तरह के झंझटों से थोड़ा राहत इसलिए रही क्योंकि शीर्ष स्तर पर कमज़ोर नेतृत्व रहा दूसरी तरफ हवाला कांड के चलते अर्जुन सिंह, माधवराव सिंधिया और कमलनाथ को पार्टी ने किनारा कर दिया था. उस समय माधवराव सिंधिया और अर्जुन सिंह कांग्रेस छोड़कर ही चले गए थे.
श्यामा चरण शुक्ल हालांकि तीन बार प्रदेश के मुख्यमंत्री बनाए गए लेकिन दबावों के चलते वो एक बार भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए.

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कमलनाथ पर दबाव
कांग्रेस के ताज़ा हालात की बात करें तो कमलनाथ सरकार में दिग्विजय सिंह निर्णायक भूमिका में हैं. ऐसा लगता है कि कमलनाथ उनके दबाव में काम कर रहे हैं.
इसकी तीन वजह समझ आती हैं. पहली, मध्यप्रदेश की राजनीति से कमलनाथ बहुत वाकिफ नहीं हैं और ऐसे में दिग्विजय सिंह उनके लिए मददगार बन सकते हैं.
दूसरा, ज्योतिरादित्य सिंधिया को अलग-थलग करने में भी उन्हें दिग्विजय सिंह की ज़रूरत है. और तीसरा, तकनीकि रूप से कमलनाथ सरकार के पास बहुमत का पूरा आंकड़ा नहीं है ऐसे में सरकार पर आने वाले संकट से बचाने में दिग्विजय सिंह उनके लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं.
हालांकि इन ज़रूरतों के बावजूद कमलनाथ वक़्त वक़्त पर दिग्विजय सिंह को झटका देने में भी पीछे नहीं रहते.
मसलन, दिग्विजय सिंह को उनकी मर्ज़ी के बिना भोपाल सीट से लोकसभा चुनाव का प्रत्याशी बनाया गया, जिसमें उन्हें हार मिली.

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सिंधिया की चुनौती
दिग्विजय सिंह से कमलनाथ को वैसी चुनौती नहीं है जैसी सिंधिया से है. सिंधिया प्रदेश अध्यक्ष पद और मुख्यमंत्री पद दोनों के दावेदार हैं.
जबकि दिग्विजय सिंह किंगमेकर की भूमिका में रहना पसंद करते हैं.
ऐसा लगता है कि पार्टी नेतृत्व में सिंधिया को प्रदेश की राजनीति में रखने की इच्छा नहीं है.
लोकसभा चुनाव के वक़्त गुना लोकसभा सीट से सिंधिया की उम्मीदवारी की घोषणा आखिर में की गई थी. जबकि इस परंपरागत सीट से किसी और नाम पर विचार करने का सवाल ही नहीं था.
वहीं चुनाव से पहले उन्हें आधे उत्तरप्रदेश की कमान सौंप दी गई. इसके बाद जब मध्यप्रदेश में वो प्रदेश अध्यक्ष के मुख्य दावेदार थे तो उन्हें महाराष्ट्र चुनाव स्क्रीनिंग कमेटी का अध्यक्ष बना दिया गया.
इन्हीं सब के चलते ऐसी ख़बरें भी आने लगी थीं कि ज्योतिरादित्य सिंधिया अपनी दादी की तर्ज़ पर कांग्रेस से बगावत कर भाजपा में शामिल तो नहीं हो जाएंगे.

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दिग्विजय सिंह और सिंधिया के रिश्ते कभी मधुर नहीं रहे, फिर चाहे वो माधवराव सिंधिया हों या ज्योतिरादित्य सिंधिया. ऐसे में दोनों के बीच वर्चस्व की लड़ाई स्वाभाविक है.
दोनों अपने-अपने तरीकों से मुख्यमंत्री कमलनाथ पर दबाव बनाते रहते हैं. और अलग-अलग मुद्दों पर पत्र लिखकर उसे सार्वजनिक भी कर दिया जाता है.
गैरबहुमत की सरकार होने के कारण कमलनाथ को भाजपा से ख़तरा होना चाहिए था लेकिन वह ख़तरा दूर-दूर तक नहीं दिखता. अलबत्ता वो अपनी ही पार्टी की कलह से जूझ रहे हैं.
कमलनाथ सरकार बनने के दिन से ही सभी यह मान रहे थे कि अमित शाह अपने ट्रैक रिकॉर्ड के आधार पर लोकसभा चुनाव होते ही इस सरकार को गिराने की कोशिशें करेंगे. लेकिन अभी तक ऐसे कोई संकेत देखने को नहीं मिले हैं.
कांग्रेस में जो सार्वजनिक घमासान मचा हुआ है उसे बड़े नेता हवा देने में लगे हुए हैं. यदि इस पर पार्टी हाईकमान कोई निर्णायक रुख अख्तियार नहीं करती है तो मुख्यमंत्री कमलनाथ की मुश्किलें और बढ़ती जाएंगी.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)
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