अब भी घाटी में रह रहे कश्मीरी पंडितों की उम्मीदें और चिंताएं

    • Author, माजिद जहांगीर
    • पदनाम, श्रीनगर से, बीबीसी हिंदी के लिए

अगस्त महीने के पहले सप्ताह में केंद्र की भाजपा सरकार ने अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी बनाने की घोषणा की. उसके पहले से ही जम्मू कश्मीर में सेना की भारी तैनाती की गई और मोबाइल और इंटरनेट संपर्क बंद कर दिया गया.

इसके बाद से बीबीसी ने अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी किए जाने को लेकर कश्मीरी पंडितों का नज़रिया जानने की कोशिश की मगर वे बार-बार इस मामले पर बात करने से इनकार करते रहे.

लेकिन सितंबर के महीने में हमें कुछ हमें कुछ लोगों से बात करने में सफलता मिली.

उनसे मुलाक़ात करने के लिए श्रीनगर शहर से दूर हम ऐसी जगह पर पहुंचे जहां कश्मीरी मुस्लिम और कश्मीरी पंडित कई दशकों से एक साथ रह रहे हैं. मगर इस इलाक़े में चारों तरफ़ बेचैन कर देने वाली शांति पसरी हुई थी.

इस इलाक़े में अपनी गाड़ी खड़ी करने के बाद हम पारंपरिक शैली में बने एक मकान में रह रहे कश्मीरी पंडित परिवार से मिलने के लिए आगे बढ़े.

इस परिवार के घर के पास खड़ी पड़ोस की कुछ मुसलमान महिलाएं हमें संदेह भरी निगाहों से देख रही थीं. उनके सवाल थे कि हम कौन हैं और उनसे मिलने क्यों आए हैं.

हमने आगे बढ़ कर दरवाज़े पर दस्तक दी. एक महिला ने घर का मुख्य दरवाज़ा खोला. हमने उन्हें अपना परिचय दिया.

इस बीच लगभग 70 साल के एक बुज़ुर्ग पंडित अपने कमरे से बाहर निकले. उन्होंने मेरे साथ आए शख़्स को पहचान लिया और फिर बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ और उन्होंने ज़ोर दिया कि हम घर के अंदर आएं.

"माहौल अच्छा है"

पहले उन्होंने हमें पानी और फिर चाय पेश की. हमने उनसे हालचाल पूछा और फिर 370 को हटाए जाने का ज़िक्र छेड़ा.

उन्होंने इस पर बात करने यह कहते हुए इनकार कर दिया कि आप बाक़ी पंडितों से पूछिए.

हमने उनसे वादा किया कि न तो हम उनकी पहचान ज़ाहिर करेंगे और न ही यह बताएंगे कि वे कहां रहते हैं. इस आश्वासन के बाद वे हमसे बात करने के लिए राज़ी हुए.

अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी बनाने को लेकर आपके क्या विचार हैं, यह पूछे जाने पर उन बुज़ुर्ग ने कहा, "इस पर मेरे क्या विचार हो सकते हैं? यह कहा जा रहा है कि कश्मीरी संपन्न हो जाएंगे, विकास होगा, नौकरियां मिलेंगी. कोई बेरोज़गार नहीं रहेगा और सबकुछ ठीक हो जाएगा. सरकार तो यही बता रही है."

उसके बाद हमने उनसे पूछा कि यह कहा जा रहा है कि 370 को लेकर उठाए गए इस क़दम से तनाव पैदा हो गया है. इस पर उन्होंने कहा, "हां, इससे बेचैनी पैदा हो गई है. कश्मीर लगातार बंद है, स्कूल बंद हैं. बच्चे घरों में बैठे हैं जबकि परीक्षाएं नज़दीक हैं. इन सबसे समस्याएं तो बढ़ी हैं."

उन्होंने कहा कि 370 को निष्प्रभावी किए जाने के बाद "पंडितों और मुसलमानों के बीच कोई तनाव नहीं है."

वह कहते हैं, "हम उन्हीं हालात में रह रहे हैं जो 370 को हटाने से पहले थे. किसी मुसलमान ने पंडितों के ख़िलाफ कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है. दोनों समुदायों के बीच सांप्रदायिक सद्भाव बना हुआ है."

कैसे हैं हालात

पांच अगस्त 2019 को भारत सरकार ने जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले संविधान के अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को ख़त्म कर दिया था. इससे इलाक़े में तनाव पैदा हो गया था.

इसके बाद से भारत प्रशासित कश्मीर में संचार व्यवस्था पर पूरी तरह रोक लग गई, कर्फ़्यू समेत कई पाबंदियां लग गईं और स्कूल, कॉलेज और व्यापारिक संस्थान बंद हो गए.

370 के प्रावधानों को ख़त्म किए जाने के साथ-साथ भारत सरकार ने जम्मू-कश्मीर को दो केंद्र शासित प्रदेशों में भी बांट दिया है. एक जम्मू-कश्मीर और दूसरा लद्दाख. इससे पहले जम्मू, कश्मीर और लद्दाख एक ही राज्य के भाग थे. इन तीनों इलाक़ों में कश्मीर ही मुस्लिम बहुल है.

भारत सरकार ने यह क़दम उठाने से पहले ही घाटी में बड़ी संख्या में अतिरिक्त सुरक्षा बल तैनात कर दिए थे.

'उलझन में हैं सब'

इसके बाद हम पड़ोस के अन्य कश्मीरी पंडितों के घरों में गए. पहचान ज़ाहिर न किए जाने की शर्त पर हमसे बात करने के लिए एक कमरे में पांच कश्मीरी पंडित इकट्ठा हुए थे.

इनमें से एक 50 साल के शख़्स थे जो 370 पर बात करने को तैयार हुए मगर उन्होंने बार-बार गुज़ारिश की कि उनके नाम का ज़िक्र न किया जाए. उन्होंने कहा कि यहां रहने वाले कश्मीरी पंडित इस मामले पर खुलकर नहीं बोलना चाहते.

उन्होंने बीबीसी से कहा, "इस बार स्थिति बहुत गंभीर है और इस विषय पर टिप्पणी करना बहुत मुश्किल है. मगर जहां तक हमारे समुदाय की बात है, हम यहीं रह रहे हैं और हम कहीं नहीं गए. हम ख़ुद उलझन में हैं कि क्या करें, क्या नहीं. हमें नहीं पता कि 370 के हटने के बाद भविष्य में क्या होगा. मुझे लगता है कि हर कश्मीरी कन्फ़्यूज़ है."

उन्होंने कहा, "यह अनुच्छेद 370 जम्मू और कश्मीर का बाक़ी भारत के साथ एक समझौता था और हमारे लिए यह बहुत अहम था. सभी को लगता था कि इस अनुच्छेद के कारण ही हम भारत से जुड़े हुए हैं. अब यह अनुच्छेद नहीं है तो मुझे लगता है कि बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक, दोनों समुदाय उलझन में हैं कि इसका उनके भविष्य पर क्या असर होने वाला है. मगर आम धारणा यह है कि इसका कश्मीर की अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा."

"स्कूल नहीं जा पा रहे बच्चे"

जब कश्मीर घाटी में रह रहे कश्मीरी पंडितों की 370 के निष्प्रभावी होने से पैदा चिंताओं और डर को लेकर हमने उनसे सवाल किया तो उन्होंने कहा, "बात यह है कि हम यहां बहुंसख्यक समुदाय के साथ कई दशकों से रह रहे हैं. हम एकदम आराम से हैं. लेकिन जो अल्पसंख्यक समुदाय के लोग घाटी से बाहर रहते हैं, उनके पास अपने विकल्प और अपने विचार हैं. वे बेहतर जानते हैं."

"सच कहूं तो इस समय मैं इस विषय पर टिप्पणी करने की स्थिति में नहीं हूं. बस एक ही बात है कि अभी हम घाटी में सुरक्षित महसूस कर रहे हैं और बहुसंख्यक समुदाय हमारी रोज़मर्रा की ज़रूरतें पूरा करने में हमारी मदद कर रहा है."

घाटी में रहने वाले और यहां से जा चुके पंडितों के बीच किसी तरह के विरोधाभास को लेकर जब उनसे पूछा गया, तो उन्होंने कहा, "एक महीने से हमारा किसी से कोई संपर्क नहीं है. न तो उनकी हमसे बात हुई न हमें मालूम है कि उनके इस विषय पर क्या विचार हैं. और जहां तक मीडिया की बात है तो अलग-अलग चैनल अलग-अलग बातें दिखा रहे हैं. लोग भी अलग-अलग बातें कर रहे हैं."

"मैं फिर कहूंगा कि मैं पक्ष या विपक्ष में कुछ नहीं कह सकता. लेकिन जहां तक बहुसंख्यक समुदाय की बात है, हम यहां साथ रहते हैं और उनमें से अधिकतर इस फ़ैसले के पक्ष में नहीं हैं."

इन कश्मीरी पंडित ने कहा, "लॉकडाउन की वजह से हम भी प्रभावित हो रहे हैं. हमारे बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहे. हर कोई भविष्य को लेकर आशंकाओं से भरा हुआ है."

"सबकुछ ठीक हो जाएगा"

इसी इलाक़े में रहने वाली एक कश्मीरी पंडित महिला ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि 370 को हटाना अच्छा क़दम है और इससे कश्मीर के विकास का रास्ता खुलेगा.

उन्होंने कहा, "हमारा सोचना है कि हम लोगों और बाक़ियों के लिए यह अच्छा रहेगा. इससे हमारे बच्चों का भविष्य बनेगा, नौकरियां मिलेंगी. लेकिन हम सभी चाहते हैं कि हालात में तनाव पैदा न हो."

जब उनसे कहा गया कि घाटी के मुसलमान इसे लेकर नाराज़ हैं, तो उन्होंने कहा, "हां वे नाख़ुश हैं. मगर ये नाख़ुशी ज़्यादा समय तक नहीं रहेगी. ये हमारे और उनके लिए अच्छा हुआ है. हमें लगता है कि सबकुछ ठीक हो जाएगा. हमें सरकार पर पूरा भरोसा है. हमें अच्छा माहौल बनाने में सरकार की मदद करनी चाहिए."

1989 में कश्मीर के बहुसंख्यक मुस्लिम समुदाय की ओर से भारतीय शासन के ख़िलाफ़ सशस्त्र संघर्ष शुरू हुआ था. इसके बाद 1990 में चरमपंथियों और अज्ञात बंदूकधारियों के हाथों बड़ी संख्या में कश्मीरी पंडितों की जान जाने के बाद लाखों कश्मीरी पंडितों को घाटी छोड़नी पड़ी थी.

कश्मीर से विस्थापित हुए अधिकतर कश्मीरी पंडित जम्मू और भारत के अन्य हिस्सों में रह रहे हैं.

साल 2008 में भारत सरकार ने विस्थापित कश्मीरी पंडितों के लिए विशेष पैकेज का एलान किया था और कश्मीर घाटी में अस्थायी कैंप बनाए थे.

वर्तमान में कश्मीर घाटी में सैकड़ों कश्मीरी पंडित परिवार रह रहे हैं जो अपने घरों को छोड़कर कहीं नहीं गए.

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