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जिस कश्मीरी पंडित पर गोली चली वो कश्मीर लौटे तो क्या हुआ?
- Author, माजिद जहांगीर
- पदनाम, श्रीनगर से, बीबीसी हिंदी के लिए
श्रीनगर के ज़ियाना कदाल इलाक़े की पतली गलियों में रोशन लाल मावा की दुकान कल से पहले तक 1990 से बंद थी. 90 के चरमपंथ के दौर में लाखों कश्मीरी पंडित कश्मीर से पलायन कर गए. लेकिन अब 29 साल बाद मावा के लिए एक अलग कहानी शुरू हुई है.
बुधवार को मावा ने ज़ियाना कदाल इलाक़े की अपनी दुकान को दशकों बाद खोला है. उनकी दुकान का दोबारा खुलना कोई सामान्य गतिविधि नहीं थी. जब उन्होंने दोबारा अपना सूखे मेवों का व्यापार शुरू किया तो स्थानीय दुकानदारों ने न सिर्फ़ उनका स्वागत किया बल्कि सराहना भी की. मावा के पिता भी इसी इलाक़े में ड्राई फ्रूट ही बेचते थे.
70 साल के मावा ने 1990 में कश्मीर घाटी को छोड़ा था. तब अज्ञात बंदूकधारियों के हमले में वो घायल हो गए थे. उन्हें चार गोलियां लगी थीं. इस हमले ने मावा को कश्मीर घाटी छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया था.
गुरुवार को मावा की दुकान पर बड़ी तादाद में स्थानीय मुसलमान पहुंचे. इनमें उनके दोस्त भी थे और पुराने परिचित भी. वो उन्हें गले लगा रहे थे.
कश्मीर छोड़ने के बाद मावा दिल्ली में बस गए थे और वहां अपना कारोबार चला रहे थे. वो कहते हैं, दिल्ली में रहते हुए मैं एक पल के लिए भी अपने कश्मीर को नहीं भूल पाया.
वो कहते हैं, "दिल्ली में मेरा काम बढ़िया चल रहा है. लेकिन मैं कश्मीर को बहुत मिस कर रहा था. कश्मीर के बिना सब बहुत पीड़ादायक था. फिर मैंने फ़ैसला किया कि मैं अपनी ज़मीन कश्मीर जाऊंगा. कश्मीर जैसी कोई जगह नहीं है."
मावा कहते हैं कि कश्मीर लौटने में सबसे अहम भूमिका उनके बेटे की रही है.
वो कहते हैं, "उसने न सिर्फ़ मुझे प्रेरित किया बल्कि उसने ज़ोर दिया कि मैं वापस कश्मीर लौटूं. मेरे बेटे डॉक्टर संदीप के योगदान को मैं भूल नहीं सकता. मैं दिल्ली में रह रहा था और मेरा दिल कश्मीर में था. उसने मुझे वापस अपनी जड़ों में लौटने के लिए बहुत प्रेरित किया."
मावा कहते हैं,''कश्मीर की जो कमी उन्होंने 29 साल महसूस की उसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता. इतने सालों में कश्मीर कभी मेरे दिलो-दिमाग़ से नहीं निकल पाया. मैं कश्मीर के बाहर रहा तो, लेकिन ख़ुश नहीं रहा. मैं 29 सालों से जिन लोगों के बीच रहा था उनके साथ ऐसे घुल मिल नहीं पाया जैसे यहां घुला मिला था. मैं दिल्ली में माली तौर पर तो अच्छा जीवन जी रहा था लेकिन सांस्कृतिक तौर पर नहीं. दिल्ली में मेरे पड़ोसियों को नहीं पता था कि मैं कौन हूं और ना ही मुझे पता था कि वो कौन हैं और जब मैं यहां लौटा तो सभी मेरे इर्द-गिर्द इकट्ठा हो गए, फूल मालाएं पहनाईं, मिठाई खिलाई. उन्होंने मुझे पगड़ी बांधी और पारंपरिक रूप से सम्मान दिया."
भावुक हुए मावा कहते हैं कि सभी कश्मीरी पंडितों को अपनी मातृभूमि की ओर लौटना चाहिए और अफ़वाहों पर ध्यान नहीं देना चाहिए.
उन्होंने कहा, "मैं सभी कश्मीरी पंडितों को कश्मीर में देखना चाहता हूं. मैं सभी से अपील करता हूं कि अफ़वाहों पर ध्यान न दें और भटके नहीं. मैं ये महसूस करता हूं कि कश्मीर से बाहर रह रहे कश्मीरी पंडित वहां बहुत सहज नहीं है."
जब उनसे पूछा गया कि जब दोबारा दुकान खोली तो कैसा लगा तो उन्होंने कहा, "ये मेरे जीवन का एक अहम पल था. मैं इसे मरते दम तक नहीं भूल सकता. मैं बहुत ख़ुश था और मैं प्यार महसूस कर रहा था. मैं सुबह जल्दी आया और दुकान खोली. दिल्ली में मैं आमतौर पर 12 बजे दुकान खोलता था."
मावा कहते हैं कि उन्हों दोबारा कश्मीर लौटकर डर नहीं लग रहा है. वो कहते हैं कि जीना-मरना ऊपर वाले के हाथ में हैं.
कश्मीर को ज़मीन की जन्नत बताते हुए मावा कहते हैं कि बाहर लोग मिनरल वॉटर पीते हैं लेकिन हम तो कश्मीर में उससे भी साफ़ पानी से अपने दांत साफ़ करते थे.
मावा को उम्मीद है कि कश्मीर में हालात जल्द सुधर जाएंगे. वो कहते हैं, "कश्मीर के हालात से हिंदू-मुसलमान दोनों प्रभावित रहे. जो पंडित यहां से गए वो भी परेशान ही रहे. मैं उम्मीद करता हूं कि अनिश्चितता का दौर जल्द ख़त्म हो जाएगा."
कश्मीरी पंडित जब घाटी छोड़कर गए तो उनमें से बहुत से लोगों ने अपनी ज़मीन-जायदाद बेच दी लेकिन मावा अपनी संपत्ति नहीं बेच पाए. वो कहते हैं, यहां की संपत्ति बेचना ऐसा ही था जैसे मां को बेचना.
वो कहते हैं, "जब हम घाटी छोड़कर जा रहे थे मेरे बेटे ने कहा था कि हम अपनी संपत्ति बेच दें लेकिन मैंने मना कर दिया. उस समय हमें अच्छे पैसे का प्रस्ताव दिया गया था. मैंने अपने बेटे से कहा था कि पैतृक संपत्ति को बेचना मां को बेचने जैसा है. मैं उस समय अपने दिल की बात कह रहा था. मैंने अपने बेटे से ये भी कहा था कि मैं बहुत दिनों तक अपनी ज़मीन से दूर नहीं रह पाउंगा."
मावा कहते हैं कि 90 के दशक से पहले कश्मीर में पंडित और मुसलमान एक परिवार की तरह रहते थे. वो कहते हैं, "मुसलमान और पंडित अपना दुख-दर्द बांटते थे. शादी हो या अंतिम संस्कार हम सब मिलजुलकर करते थे. हम दुख भी बांटते थे और ख़ुशी भी."
मावा के लौटने से उनके पड़ोसी दुकानदार रियाज़ बजाज बहुत ख़ुश हैं. वो कहते हैं, "अपने पंडित भाई को वापस देखकर हम बहुत ख़ुश हैं. वो तीन दशक बाद अपनी दुकान इस गली में खोल रहे हैं. इससे हमारा बाज़ार और रोशन होगा. इतने साल बाद हमारे बाज़ार में कुछ नया हो रहा है. सभी पंडितों को वापस अपनी ज़मीन पर लौटना चाहिए. ये ज़मीन उनकी भी है. हमारे बीच गहरा भाई चारा है. जो सुविधाएं हम लोगों के पास हैं वो सब उन्हें भी मिलनी चाहिए."
मावा के बचपन के दोस्त अब्दुल सलाम उन्हें बाज़ार में देखकर बहुत ख़ुश हैं. वो कहते हैं, "हम एक हैं. जब मावा पर गोली चली थी तब ये हम सबके लिए त्रासदी थी. ये हमारा दुर्भाग्य था कि ऐसी घटना हुई. हम हिंदू-मुसलमान मिलकर सड़क पर सोते थे. कभी हमें डर नहीं लगता था."
मावा के बेटे डॉक्टर संदीप ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि वो जब भी अपने पिता से बात करते थे तो वो बस कश्मीर की ही बातें करते थे.
वो कहते हैं, "वो 13 अक्तूबर 1990 का दिन था जब मेरे पिता पर गोली चली थी. उस घटना के बाद हम दिल्ली आ गए थे. बीते तीन दशकों में जब भी हमने बात की, मेरे पिता ने कश्मीर की कमी ही ज़ाहिर की. मुझे लगता था कि एक बेटे के तौर पर ये मेरी नैतिक ज़िम्मेदारी है कि मैं अपने पिता को वापस कश्मीर भेजूं. मैं उन्हें वापस कश्मीर भेजने के सभी विकल्प तलाश रहा था. मेरे पिता की अंतिम इच्छा अपने अंतिम दिन कश्मीर में बिताने की ही थी."
वो कहते हैं, "बीते कुछ सालों से मैं अपने पिता की दुकान को ठीक कराने का सोच रहा था. मैंने अपने पिता से कहा कि आप 15 दिन कश्मीर में रहिए और 15 दिन दिल्ली में. वो कश्मीर लौटे हैं लेकिन पूरी तरह से नहीं. जब वो यहां आए तो हज़ारों लोग उनसे मिलने आए. ये ही असली कश्मीरियत है. जो हुआ उसे भूलकर हमें आगे बढ़ना चाहिए. मैं सिर्फ़ अपने परिवार की ही नहीं बल्कि सभी कश्मीरी पंडितों की वापसी चाहता हूं. अगर कश्मीर के हालात अच्छे नहीं है तो उन्हें सुधारना किसी और की नहीं बल्कि कश्मीर के ही मुसलमानों, सिखों और पंडितों की ज़िम्मेदारी है. तब ही कश्मीर के हालात बेहतर होंगे."
संदीप जम्मू-कश्मीर सुलह फ़्रंट के चेयरमैन भी हैं और वो सभी समुदायों के बीच सांप्रदायिक सौहार्द स्थापित करने के लिए काम करते हैं.
1990 के दशक में जब कश्मीर में हिंसा का दौर था तब कश्मीरी पंडितों पर बड़ी तादाद में हमले हुए थे और उनकी आबादी यहां से पलायन कर गई थी. कश्मीरी पंडित कश्मीर घाटी को छोड़कर देश केअलग अलग हिस्सों में बस गए थे.
साल 2008 में भारत सरकार ने कश्मीर में 6,000 पद कश्मीरी पंडितों के लिए आरक्षित किए थे. इन कर्मचारियों के लिए सरकार ने कई स्थानों पर ट्रांज़िट कैंप बनाए थे.
सरकार कश्मीरी पंडितों के लिए अलग से कॉलोनी विकसित करने के प्रस्ताव भी दे चुकी है. लेकिन कश्मीर के अलगाववादियों ने सरकार की इस मंशा पर शक़ ज़ाहिर किया था. उन्होंने कहा था कि ऐसा करके सरकार कश्मीर की आबादी के चरित्र को बदलना चाहती है.
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