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सुषमा जी ने दबाव बनाने का मौक़ा ही नहीं दिया: पीएम मोदी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को कहा कि सुषमा स्वराज ने विदेश मंत्री रहते हुए पूरे मंत्रालय का कायापलट कर दिया था.
नई दिल्ली में सुषमा स्वराज के सम्मान में आयोजित एक श्रद्धांजलि सभा में बोलते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कई यादों को लोगों से साझा किया.
इस सभा में सभी राजनीतिक दलों के अहम नेता मौजूद थे. सुषमा स्वराज की बेटी बांसुरी और उनके पति स्वराज कौशल की मौजूदगी में पीएम मोदी ने कहा कि सुषमा केवल ममता और संवेदना से भरी थीं बल्कि उनमें हरियाणवी ठसक भी थी.
पीएम मोदी ने कहा, ''सुषमा जी ने एक बार और लोकसभा चुनाव नहीं लड़ने का फ़ैसला किया था लेकिन हम वेंकैया जी उनके पास गए और वो तैयार हो गईं. इस बार जब सुषमा जी ने चुनाव नहीं लड़ने का फ़ैसला किया तो पहले ही सार्वजनिक कर दिया ताकि किसी का कोई दबाव चले ही ना. यानी सुषमा अपने विचारों को लेकर पक्की थीं और उसके अनुरूप जीने का प्रयास भी करती थीं.''
6 अगस्त को सुषमा स्वराज का दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया था.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी सुषमा स्वराज को याद करते हुए उनके भारत वासियों के लिए प्रेम, काम के प्रति ईमानदार और समर्पित होने की बात कही. पीएम मोदी ने बताया कि सुषमा स्वराज उम्र में भले ही उनसे छोटी थीं, लेकिन बहुत कुछ सीखने को मौक़ा मिला.
एक घटना को याद करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा, "मैं नया-नया था. संयुक्त राष्ट्र में मेरा भाषण होना था. पहली बार जा रहा था. सुषमा जी पहले से पहुंची थीं. वो गेट पर मुझे रिसीव करने के लिए खड़ी थीं. मैंने कहा चलिए हम अभी बैठ लेते हैं. कल सुबह मुझे बोलना है, बताइए क्या करना है. तो सुषमा जी ने पूछा आपकी स्पीच? मैंने कहा बोल देगें इसमें क्या है. सुषमा जी ने कहा अरे ऐसे नहीं होता है भई. यहां भारत की बात करनी होती है आप अपनी मर्ज़ी नहीं बोल सकते."
"मैंने कहा कि मेरे लिए लिख कर बोलना बहुत मुश्किल होता है. मेरे नवरात्र के उपवास चल रहे थे. यात्रा करके थक गया था, लेकिन रात को ही वो साथ बैठीं और पूछा कि आप क्या कहना चाहते हैं हम उसे लिखते हैं."
"उनका बड़ा आग्रह था कि आप कितने ही अच्छे वक्ता क्यों न हों, आपके विचारों में कितनी साध्यता क्यों न हों लेकिन कुछ संरचना होती है, जिनकी अपनी आवश्यकता होती है. ये सुषमा जी ने मुझे पहला सबक़ सिखाया था."
इस शोक सभा में सुषमा स्वराज की बेटी बांसुरी स्वराज ने वहां मौजूद लोगों का धन्यवाद करते हुए कहा, "आदरणीय प्रधानमंत्री जी, यहां उपस्थित सभी दलों के नेतागण और मां की स्मृति में पधारे बंधुगण. आज आप यहां दल और विचारधारा की भिन्न-भिन्नता को छोड़कर मेरी मां को श्रद्धांजली देने आए इसकी मैं बहुत आभारी हूं.''
बांसुरी ने कहा, ''जीवन के भीषण से भीषण संग्राम में भी मेरी मां संयमित थीं, अनुशासित थीं, मर्यादित थीं. सरकारी पक्ष हो या विपक्ष, संसद की तेज़ तर्रार बहस के बाद सेंट्रल हॉल के बटर टोस्ट और गपशप पर वो अपने राजनैतिक विरोधियों को मोह कर मित्रो में तब्दील करने वाली थीं. व्यक्तिगत रूप से वो बहुत सरल थीं और बहुत ही सुलझी हुईं शख्सियत थीं. मेरे लिए तो वो प्रेम, समझदारी और सीख का भंडार थीं. दुनिया में मेरी सबसे अच्छी दोस्त."
बांसुरी ने कहा, "उनकी 42 वर्ष की राजनीतिक तपस्या में आप सभी का कभी न कभी किसी न किसी रूप में योगदान था. उसके लिए मैं आप सभी की शुक्रगुज़ार हूं."
प्रधानमंत्री का ख़ासतौर पर शुक्रियां करते हुए उन्होंने कहा, "प्रधानमंत्री जी आपने व्यक्तिगत तौर पर मेरी मां को आदर और सम्मान दिया, मेरे परिवार के संकट की घड़ी में आप हमारे साथ खड़े रहे इसके लिए मैं आपकी ऋणि हूं."
सभी नेताओं और प्रधानमंत्री के साथ-साथ बांसुरी ने अपनी मां सुषमा स्वराज के राजनीतिक सफ़र को याद करते हुए भाजपा का भी शुक्रिया अदा करते हुए कहा, "भारतीय जनता पार्टी की शीतल छाया में मेरी मां ने अपने राजनीतिक सफ़र की पूर्ति की, उनको पहचान देने वाली भारतीय जनता पार्टी की मैं तहे दिले से शुक्रगुज़ार हूं".
मंच पर बोलने वाले वक्ताओं ने मेरी झोली इतनी अच्छी स्मृतियों से भर दी है कि आने वाला कठिन रास्ता मेरा परिवार इन्हीं स्मृतियों सहारे काटने का प्रयास करेगा.
प्रधानमंत्री मोदी ने सुषमा स्वराज की ईमानदारी की मिसाल देते हुए कहा, ''आमतौर पर हम देखते हैं कि कोई मंत्री और सांसद जब मंत्री नहीं रहता या सांसद नहीं रहता है तो सरकार को मकान ख़ाली कराने के लिए सालों तक नोटिस पर नोटिस भेजना पड़ता है. कभी-कभी तो कोर्ट कचहरी के चक्कर लगाने पड़ते हैं. लेकिन सुषमा जी ने सब कुछ समेटने का तय ही कर लिया था. जैसे ही चुनाव नतीजे आए, वो मकान ख़ाली करके अपने निजी निवास पर पर पहुच गईं.''
पीएम ने कहा, ''सार्वजनिक जीवन में वो चीज़ें बहुत कुछ कह जाती हैं. सुषमा जी का भाषण प्रभावी होता था. इतना ही नहीं है प्रेरक भी होता था. सुषमा जी के व्यक्तित्व में विचारों की गहराई हर कोई अनुभव करता था तो अभिव्यक्ति की ऊंचाई हर पल नए मानक पार करती थी. कभी-कभी दोनों में से एक होना तो स्वभाविक है लेकिन दोनों होना बड़ी साधना के बाद होता है. वे कृष्ण भक्ति को समर्पित थीं. उनके मन-मंदिर में कृष्ण बसे रहते थे. हम जब भी मिलते थे वो मुझे 'जय श्री कृष्ण' बोलती थीं मैं उन्हें 'जय द्वारकाधीश' बोलता था.''
प्रधानमंत्री ने कहा, ''लेकिन कृष्ण का संदेश वो जीती थीं. अगर एक पूर्ण रूप से देखें तो लगता है 'कर्मण्यवादी कार्स्ते' क्या होता है सुषमा जी ने जीवन मे दिखाया था.
अब जीवन की विशेषता देखिए एक तरफ़ शायद उन्होंने सैकड़ों घंटो में अलग-अलग मंचों पर जम्मू-कश्मीर को लेकर बोला होगा, अनुच्छेद 370 पर बोला होगा. एक प्रकार से उसके साथ वो जी-जान से भारतीय जनता पार्टी राष्ट्र भक्त के कार्यकर्ताओं से इतना जुड़ाव था.''
पीएम ने कहा, ''जब जीवन का इतना बड़ा सपना पूरा हो, लक्ष्य पूरा हो और ख़ुशी समाती न हो. सुषमा जी के जाने का बाद जब मैं बांसुरी से मिला तो बांसुरी ने मुझसे कहा कि वो इतनी ख़ुशी ख़ुशी गई हैं जिसकी शायद ही कोई कल्पना कर सकता है. एक प्रकार से ख़ुशी भरा हुआ मन उनका नाच रहा था और उस ख़ुशी में ही उस ख़ुशी के पल को जीते-जीते वो श्री कृष्ण को चरणों में पहुंच गईं.''
पीएम मोदी ने श्रद्धांजलि सभा को संबोधित करते हुए कहा, ''व्यवस्था में जो काम मिला, उसमें श्रेष्ठ परंपराओं को बनाते हुए, उसमें समकालीन परिवर्तन क्या लाना है, ये उनकी विशेषता रही है. आमतौर पर विदेश मंत्रालय यानी कोर्ट, पैंट, टाई, प्रोटोकोल इसी के आस-पास रहता था. विदेश मंत्रालय में प्रोटोकॉल सबसे पहले होता है. सुषमा जी इस प्रोटोकोल की पूरी परिभाषा को 'पीपल्स कॉल' में परिवर्तित कर दिया. 'वसुधैव कुटुम्बकम' विदेश मंत्रालय कैसे सिद्ध कर सकता है उन्होंने विश्व भर में फैले हुए भारतीय समुदाय के माध्यम से उनके साथ उस निकटता को जोड़ कर के बताया, उनके सुख-दुख का साथी हिंदुस्तान है. उनके पासपोर्ट का रंग चाहे कोई भी क्यों हो, उनकी रगों में अगर हिंदुस्तानी ख़ून है तो वो मेरा है. उसके सुख-दुख उसकी समस्या मेरी हैं.''
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