सुषमा स्वराज कैसी विदेश मंत्री थीं?

    • Author, नवतेज सरना
    • पदनाम, पूर्व भारतीय राजदूत

मंगलवार रात जब मुझे सुषमा जी के निधन की ख़बर मिली तो मेरे लिए ये एक झटके की तरह था.

मुझे विश्वास ही नहीं हुआ कि सुषमा जी इस तरह अचानक हमें छोड़कर जा सकती हैं. सुषमा जी के साथ मेरा नाता बरसों पुराना है.

मुझे साल 2000 की वो घटना याद आती है, जब मैं वॉशिंगटन डीसी में 'काउंसलर प्रेस' हुआ करता था.

सुषमा जी, एक कार्यक्रम के सिलसिले में अमरीका आई हुईं थीं. लेकिन उनका सूटकेस कहीं गुम हो गया.

इसके बाद हम लोगों ने एक होटल में उनके ठहरने की व्यवस्था कराई और उनके सूटकेस की खोजने की कोशिश की.

कुछ 10-15 घंटों के बाद हमने एयरलाइंस अधिकारियों से बात करके उनके होटल तक उनका सूटकेस पहुंचा दिया.

इसके 15-16 साल बाद जब वह भारत की विदेश मंत्री बनीं और मैं अपना परिचय देने के लिए उनके कमरे में घुसा तो उन्होंने एक पल में मुझे पहचान लिया.

मेरे लिए ये बहुत बड़ी बात थी क्योंकि विदेश मंत्री की शख्सियत बहुत बड़ी होती है. उनसे मिलने के लिए जब मैं उनके पास पहुंचा तो मैंने अपना परिचय दिया.

इस पर उन्होंने कहा कि सरना जी, आपने तो मेरा सूटकेस खोजा था. ये एक ऐसी घटना थी जिसे मैं भी भूल चुका था लेकिन उन्होंने इतनी सामान्य सी घटना को याद रखा और मुझे उस घटना से पहचान लिया.

मंगलवार को जब उनके निधन की ख़बर आई तो सहसा मुझे उनसे जुड़ी ये घटना याद आ गई.

कैसी विदेश मंत्री थीं सुषमा स्वराज?

राजनयिक होने के नाते हम लोगों को अलग-अलग विदेश मंत्रियों के साथ काम करने का मौक़ा मिलता है.

लेकिन जब सुषमा जी विदेश मंत्री बनी तो उन्होंने भारतीय विदेश मंत्रालय की छवि को बिल्कुल बदल दिया.

वो एक बेहद ही परिपक्व विदेश मंत्री थीं. वो जटिल से जटिल मामले को समझकर अपने सहायकों को ठीक-ठीक बताती थीं कि क्या करना है. हर मुद्दे पर उन्हें गहरी समझ थी.

यही नहीं, विदेश मंत्री के रूप में उन्होंने जिस तरह लोगों के साथ संपर्क स्थापित किया वो बेहद सराहनीय था.

वो हर समस्या को महत्व देती थीं, चाहें विदेश में किसी का पासपोर्ट खो गया हो, या किसी को भारत सरकार की मदद की ज़रूरत है तो वो ऐसे लोगों की परेशानी दूर करने के लिए ज़रूरी क़दम उठाती थीं.

मैंने अपने लंबे राजनियक करियर में ऐसे विदेश मंत्री नहीं देखे हैं, ना ही भारत में और विदेशों में ऐसा कोई नेता नहीं देखा है.

उनके प्रयासों की वजह से आज दुनिया भर में मौजूद भारतीयों के मन में ये भरोसा कायम हुआ है कि किसी भी समस्या में फंसने पर विदेश में मौजूद भारतीय दूतावास उनकी हर संभव मदद करेंगे.

उन्होंने ट्विटर के ज़रिए विदेश मंत्रालय और इसके अधिकारियों के प्रति लोगों में भरोसा कायम किया.

हर रोज़ दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बसे भारतीय उन्हें ट्वीट किया करते थे.

कई बार तो ऐसे लोगों की मदद करने के लिए वह चाहे दिन हो या रात खुद ही विदेशों में तैनात भारतीय अधिकारियों को फोन कर देती थीं.

कई बार वो फोन करके कहती थीं, "नवतेज, अमरीका के इस हिस्से में कोई अपराध हुआ है और आपको तत्काल मुसीबत में फंसे व्यक्ति की मदद करनी है."

ऐसे में उन्होंने विदेश मंत्रालय को एक ख़ास अंदाज़ में चलाया.

और वो हमेशा अपने अधिकारियों के लिए उपलब्ध रहती थीं. मैंने खुद कई बार देर शाम और अलसुबह फोन करके कई स्थितियों से अवगत कराया.

मुझे सुषमा जी के साथ एक लंबे समय तक विदेश यात्राएं करने का मौका मिला.

हमने साथ में अफ़गानिस्तान और अफ़्रीका के देशों की यात्रा की.

ख़ास बात ये है कि वो अंतरराष्ट्रीय संबंधों से जुड़े जटिलतम मामलों की भी समझ रखती थीं.

पाकिस्तान पर सुषमा स्वराज का रवैया

सुषमा स्वराज की राजनीतिक शख्सियत को समझने के लिए आपको उनके पाकिस्तान और पाकिस्तानियों के साथ रिश्तों पर नज़र डालनी चाहिए.

भारत और पाकिस्तान के बीच रिश्तों को लेकर उनका नज़रिया हमेशा भारतीय हितों को ध्यान में रखना था.

लेकिन जब पाकिस्तान के बीमार लोगों को मेडिकल वीज़ा देने की बात आती थी तो वो तुरंत मानवीय आधार पर ऐसे निवेदनों को स्वीकार करती थीं.

विदेश मंत्री रहते हुए उन्होंने कई पाकिस्तानियों की मानवीय आधार पर मेडिकल वीज़ा हासिल करने में मदद की.

वहीं, अगर उनके व्यक्तिगत जीवन की बात करें तो उनके साथ काम करने वाला हर व्यक्ति ये कह सकता है कि उन्होंने हमेशा अपने साथी कर्मचारियों का ध्यान रखा.

वो हमेशा हमसे पूछती थीं कि सभी लोगों ने खाना खा लिया है या नहीं और अगर कोई खड़े-खड़े थक जाता था तो वो खुद उनसे आराम करने को कहा करती थीं.

इसके साथ ही वह अपने रिश्तों को मानवीय आधार पर जीने में यकीन रखती थीं.

यही वजह है कि आज जब वो हमारे बीच में नहीं हैं तो सभी दलों के नेता अपना दर्द बयां कर रहे हैं.

सुषमा स्वराज का पसंदीदा खाना

खाने पीने को लेकर सुषमा स्वराज को सादा खाना पसंद था.

वो दाल, चावल और सब्जी खाना पसंद करती थीं. हालांकि, उन्हें अपने खाने में मसाले का ज़्यादा प्रयोग पसंद नहीं था.

वो लहसुन तक नहीं खाती थीं. लेकिन वो अपने साथी कर्मचारियों के खाने-पीने का बहुत ध्यान रखती थीं.

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