जब कश्मीरियों की आवाज़ ने बदल दी थी हिंदुस्तान की क़िस्मत

    • Author, जुगल पुरोहित
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

जब भारत की संसद में जम्मू और कश्मीर की क़िस्मत का फ़ैसला हो रहा था. तब राजनेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं, दुनिया की बड़ी ताक़तों और विशेषज्ञों, सब की आवाज़ को बड़े ध्यान से सुना जा रहा था.

लेकिन ये विडंबना ही है कि आम कश्मीरी की आवाज़ कहीं नहीं सुनाई दे रही थी. हुकूमत को डर था कि उसके फ़ैसलों से कश्मीर में हंगामा मच जाएगा.

और जैसा कि सरकारी ख़ुफ़िया एजेंसियां दावा कर रही थीं कि कश्मीर के हालात बिगाड़ने की साज़िश के पक्के संकेत मिले हैं, तो आम कश्मीरी को ख़ामोश रह कर अपने घर में बैठने को कह दिया गया.

कश्मीरियों के पास अपनी आवाज़ दुनिया तक पहुंचाने का कोई भी ज़रिया नहीं है. उनकी आवाजाही और कहीं इकट्ठे होकर आवाज़ बुलंद करने पर भी पाबंदियां लगा दी गई हैं.

ऐसे में आम कश्मीरियों की आवाज़ उनके शरीर की तरह ही उनके घरों में क़ैद होकर रह गई हैं. हालांकि इन हालात से बहुत से लोग हैरान नहीं होंगे.

क्योंकि कश्मीर ऐसी पाबंदियों और ऐसे बंद का आदी रहा है. लेकिन कश्मीर का एक ऐसा इतिहास भी है, जिसे सबको जानना ज़रूरी है.

'ऑपरेशन जिब्राल्टर'

गुरुवार को भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी बनाने और जम्मू-कश्मीर को दो केंद्र शासित प्रदेशों में बांटने के फ़ैसले पर देश को संबोधित किया.

इस दौरान उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर की रक्षा के लिए यहां के असंख्य लोगों ने बलिदान दिया है. पीएम मोदी ने राजौरी की रुख़साना कौसर का ज़िक्र किया जिन्होंने एक चरमपंथी को मारा था. उन्होंने पुंछ ज़िले के उस शख़्स का नाम भी लिया, जिसने 1965 की लड़ाई में भारतीय सेना को घुसपैठ की जानकारी दी थी.

कश्मीर के इतिहास में कई बार ऐसे मोड़ आए हैं, जब एक आम कश्मीरी की आवाज़ ने सूबे की क़िस्मत बदल दी.

इतिहास में इसकी कई मिसालें मिलती हैं, जब एक आम कश्मीरी ने इतिहास का रुख़ मोड़ दिया था.

अपनी किताब, '1965 टर्निंग द टाइड, हाऊ इंडिया वन द वार (2015)' में वरिष्ठ पत्रकार नितिन गोखले ने लेफ्टिनेंट जनरल हरबख़्श सिंह के हवाले से ऐसी कई दास्तानें लिखी हैं.

लेफ्टिनेंट जनरल हरबख़्श सिंह, 1965 में पाकिस्तान के साथ हुई जंग के दौरान सेना की पश्चिमी कमान के कमांडर इन चीफ़ थे.

हरबख़्श सिंह ने पाकिस्तान की सेना के 'ऑपरेशन जिब्राल्टर' से पहले की कुछ घटनाओं के बारे में लिखा है.

तब पाकिस्तान, भारत प्रशासित कश्मीर में अपने सैनिकों की घुसपैठ कर, वहां बग़ावत भड़काने की फ़िराक़ में था.

हथियारबंद लोगों की मौजूदगी

लेफ्टिनेंट जनरल हरबख़्श सिंह ने लिखा है, "एक बकरवाल युवक मोहम्मद दीन गुलमर्ग के पास दारा कस्सी में अपने जानवर चरा रहा था. तभी दो हथियारबंद अनजान लोग उसके पास पहुंचे. वो हरी सलवार कमीज़ पहने हुए थे. उन्होंने मोहम्मद दीन को 400 रुपये रिश्वत देकर उससे कुछ जानकारी हासिल करनी चाही."

"उस लड़के को दोनों अनजान लोगों पर शक हो गया. वो दोनों से ये कहकर वहां से निकल आया कि वो उनके कहे मुताबिक़ ज़रूरी जानकारी हासिल करने जा रहा है. वहां से भागकर मोहम्मद दीन पास ही तनमर्ग में स्थित पुलिस थाने पहुंचा और उन अनजान हथियारबंद लोगों की मौजूदगी के बारे में बताया."

"कुछ ही देर में सेना की टुकड़ियों को इस घुसपैठ की ख़बर मिल गई और एक गश्ती पार्टी को फ़ौरन वहां भेज दिया गया. बाद में सेना की कार्रवाई में घुसपैठियों को मार भगाया गया. भागते हुए पाकिस्तानी घुसपैठियों ने चार राइफ़लें, 4 स्टेन गन और 9 एलएमजी के अलावा 26 ग्रेनेड छोड़कर भागना पड़ा था."

ब्रिगेड हेडक्वॉर्टर

लेफ्टिनेंट जनरल हरबख़्श सिंह ने एक और स्थानीय कश्मीरी के रोल की भी तारीफ़ की थी.

जनरल सिंह ने लिखा था, "पीर पंजाल की पहाड़ियों में स्थित दक्षिणी मेंढर के धाब्रोट गांव के रहने वाले वज़ीर मोहम्मद अचानक हथियारबंद लोगों की एक जमात से टकरा गया था. उन्हें उन पर शक हो गया. वो उसे गलूथी नाम की जगह पर मिले थे."

"उन लोगों ने वज़ीर मोहम्मद को लुभाने के लिए मीठी-मीठी बातें कीं और जानकारी देने के एवज़ में पैसे देने का लालच भी दिया. वज़ीर मोहम्मद ने भी उन लोगों को जानकारी देने का वादा करके वहां से आकर 120 इनफैंट्री ब्रिगेड हेडक्वॉर्टर को उन अनजान हथियारबंद लोगों के बारे में ख़बर दे दी."

"बाद में सेना ने एक गश्ती टुकड़ी को उस इलाक़े की तरफ़ रवाना कर दिया. घुसपैठियों को सेना ने खदेड़ दिया भागते हुए घुसपैठियों को भारी तादाद में हथियार और गोला-बारूद भारत की सीमा में ही छोड़ना पड़ा था."

भारत-पाकिस्तान युद्ध से भी पहले

इन घटनाओं का ज़िक्र करते हुए नितिन गोखले आख़िर में जनरल हरबख़्श सिंह की बात का ज़िक्र करते हैं, "घुसपैठ के ख़िलाफ़ भारत का अभियान इसलिए क़ामयाब हुआ क्योंकि स्थानीय कश्मीरियों ने घुसपैठियों के साथ सहयोग नहीं किया."

"पाकिस्तान को ये उम्मीद थी कि आम कश्मीरी नागरिक उनका साथ देने के लिए भारत से बग़ावत करेगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ और पाकिस्तान की साज़िश नाकाम हो गई."

हक़ीक़त ये है कि भारत और आम कश्मीरियों के बीच का ये रिश्ता 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध से भी पहले का है.

आज़ादी के बाद भारत ने जब पहला युद्ध लड़ा था तो उस दौरान ब्रिगेडियर प्रीतम सिंह ने 1947-48 में ऑपरेशन ग्रेन के नाम से एक मोर्चा जम्मू के पुंछ इलाक़े में फ़तह किया था.

यहां ये जानना ज़रूरी होगा कि उस वक़्त पुंछ में हिंदुओं की आबादी बहुमत में थी. जबकि बड़ी तादाद में मुसलमान भी वहां के बाशिंदे थे.

दुश्मनों को चकमा देने के लिए..

वहां, पाकिस्तान की सेना का मुक़ाबला करने वाले वो लोग थे, जिन्हें दूसरे विश्व युद्ध के बाद ब्रिटिश सरकार ने सेना से रिटायर कर दिया था.

हालांकि, इस मोर्चे पर सेना की 1 कुमाऊं रेजिमेंट क़स्बे में लड़ते हुए दाख़िल हो गई थी. फिर भी हमलावरों ने क़स्बे की घेराबंदी करने में क़ामयाबी हासिल कर ली थी. ये घेराबंदी क़रीब एक साल तक चली थी.

अर्जुन सुब्रमण्यम अपनी किताब, 'इंडियाज़ वार्स: ए मिलिट्री हिस्ट्री 1947-1971' (2016) में लिखते हैं, "ब्रिगेडियर प्रीतम घेराबंदी करने वाले दुश्मनों को चकमा देने के लिए गश्त के लिए बड़ी तादाद में लोगों को पास की पहाड़ियों की तरफ़ भेज देते थे."

"इसके बाद दुश्मन को गफ़लत में डालकर पास से सेना के लिए ज़रूरी रसद और सब्ज़ियां वग़ैरह ले आते थे. जंग के दौरान जब फ़सल तैयार हो गई, तो सेना की पुंछ ब्रिगेड निगरानी में आम लोगों ने घंटों तक फ़सल की कटाई और मड़ाई का काम किया, ताकि अनाज को क़स्बे में ला सकें."

"इस दौरान आम लोगों की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी सेना की टुकड़ियों की होती थी."

हवाई रास्ते से रसद

इतना ही नहीं, सुब्रमण्यम लिखते हैं, "हमलावरों ने चारों तरफ़ से पुंछ की घेराबंदी कर रखी थी. ऐसे हालात में बचने का एक ही तरीक़ा था कि पुंछ में हवाई पट्टी बनाई जाए, ताकि हवाई रास्ते से रसद पहुंचाई जा सके."

"ब्रिगेडियर प्रीतम सिंह ने 6000 स्थानीय लोगों की मदद से दिसंबर 1947 के मध्य तक ये काम पूरा कर लिया था... लेकिन, जब पुंछ के लोगों को कहा गया कि वो हवाई जहाज़ से पास के शरणार्थी कैंप में चलें, तो उन्होंने अपने घर छोड़कर जाने से मना कर दिया था और वहीं डटे रहे थे."

इसी युद्ध के दौरान, जिस दिन भारत की सेनाएं श्रीनगर पहुंची थीं, उस दिन के बारे में इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने अपनी किताब 'इंडिया आफ्टर गांधी' (2007) में हालात को इस तरह बयां किया है, "महाराजा अपनी राजधानी छोड़कर पहले ही जा चुके थे. श्रीनगर में उनकी हुकूमत का कोई ख़ास नामो-निशां नहीं दिखता था."

बंटवारे के दौरान...

रामचंद्र गुहा ने लिखा है, "पुलिस का अमला भी नहीं दिखता था. उनकी जगह नेशनल कांफ्रेंस के स्वयंसेवक संभाले हुए थे. वो शहर की गलियों और पुलों की निगरानी कर रहे थे. नेशनल कांफ्रेंस के स्वयंसेवक ही लोगों और सामान की आवाजाही पर भी नज़र रखे हुए थे."

"बंटवारे के दौरान पंजाब में रिपोर्टिंग कर चुके एक पत्रकार को श्रीनगर के हालात देखकर भी यक़ीन नहीं हुआ था. उसने लिखा था कि वो ये मानने को तैयार ही नहीं था कि यहां हर फ़िरक़े के लोग एक-दूसरे के साथ पुरअमन तरीक़े से रह रहे थे."

"हिंदू और सिख, कश्मीर के बहुसंख्यक मुसलमानों के साथ बड़े आराम से रह रहे थे. वो भारतीय सेना के सैनिकों के साथ क़दम से क़दम मिलाकर श्रीनगर की गलियों से गुज़रते थे. सारे स्वयंसेवक आपसी तालमेल के साथ काम कर रहे थे."

"एक और रिपोर्टर ने नेशनल कांफ्रेंस के कार्यकर्ताओं और सेना के बीच दोस्ती की तारीफ़ करते हुए लिखा था कि शेख अब्दुल्ला और डिविज़नल कमांडर मेजर जनरल थिमैया के साथ जीप में साथ बैठकर गश्त के लिए निकलते थे."

कारगिल युद्ध

मुस्लिम सैनिकों के भारतीय सेना छोड़कर घुसपैठियों के साथ जा मिलने की आशंकाओं को ख़ारिज करते हुए अर्जुन सुब्रमण्यम ने उस वक़्त सेना के ब्रिगेडियर एल.पी. सेन के एक लेख का हवाला दिया है, "लोगों को ये लग रहा होगा कि जम्मू और मुज़फ्फ़राबाद में आम मुस्लिम लोग अपनी सरकार के ख़िलाफ़ बग़ावत करके पाकिस्तान के साथ मिलना चाहते हैं."

"लेकिन, इससे बड़ा झूठ कोई और नहीं हो सकता. आज हज़ारों मुस्लिम सरकारी कर्मचारियों, राज्य के मुस्लिम सुरक्षाबलों और शेख़ अब्दुल्ला की पार्टी के मुस्लिम कार्यकर्ताओं की मदद से ही हमने इस हमले को नाकाम किया है."

हाल ही में भारत ने कारगिल युद्ध में अपनी जीत की बीसवीं सालगिरह मनाई थी.

इस युद्ध से पहले पाकिस्तानी सैनिकों की घुसपैठ की पहली ख़बर जम्मू-कश्मीर राज्य के स्थानीय नागरिकों से ही मिली थी.

कारगिल के करीब स्थित बटालिक के ताशी नामग्याल जैसे सतर्क नागरिकों ने ही भारत को पहाड़ों पर पाकिस्तानी सैनिकों की मौजूदगी की जानकारी मिली थी.

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