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अनुच्छेद 370: क्या कश्मीर में अब बढ़ सकता है तनाव
- Author, एंड्र्यू व्हाइटहेड
- पदनाम, पूर्व बीबीसी संवाददाता
संविधान के अनुच्छेद 370 के तहत मिला जम्मू-कश्मीर को विषेश दर्जा कई कश्मीरियों के लिए वो आधार है जिसके बल पर साल 1947 में ये रियासत भारत की हिस्सा बन गई थी.
उस दौरान भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और कश्मीर के राजनेताओं के बीच बातचीत के लंबे दौर चले जिसके बाद ही जम्मू कश्मीर भारत में शामिल हुआ.
अब मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी सरकार ने इस विशेषाधिकार को ख़त्म करने का फ़ैसला किया है. 1950 के दशक के बाद ये जम्मू कश्मीर के संवैधानिक दर्जें में आया सबसे बड़ा बदलाव है.
सही मायनों में इससे बहुत अधिक लाभ नहीं होने वाला है. बीते दशकों में अनुच्छेद 370 के तहत मौजूद प्रावधानों को कमज़ोर कर दिया गया है.
जम्मू कश्मीर का अपना खुद का अलग संविधान और अलग झंडा ज़रूर है, लेकिन देश के दूसरे राज्यों की तरह इसे कोई अधिक स्वायत्तता नहीं मिली हुई है.
अनुच्छेद 370 के तहत दूसरे राज्यों के लोग जम्मू कश्मीर में ज़मीन नहीं ख़रीद सकते. अगर 370 को हटा दिया जाए- जैसा कि केंद्र सरकार ने किया है - तो इससे एक डर पैदा होता है कि कश्मीर घाटी का स्वरूप इस कारण बदलेगा. लेकिन ऐसा नहीं है कि इसका असर जल्द दिखने लगेगा.
भारतीय सरकार के लिए इस फ़ैसले का प्रतीकात्मक महत्व अधिक है.
अपने चुनावी मेनिफेस्टो में हिंदु राष्ट्र की बात करने वाली भारतीय जनता पार्टी ने कश्मीर के विशेष दर्जे को ख़त्म करने की बात कई बार की है.
पार्टी का मानना है कि पूर्ण रूप से देश का हिस्सा बनने के बाद यहां विकास को बढ़ावा मिलेगा. बीजेपी का ये भी मानना है कि जम्मू कश्मीर को मिला विशेष दर्जा सिर्फ इस कारण बरकरार नहीं रखा जाना चाहिए कि ये मुसलमान बहुल राज्य है या फिर पाकिस्तान भी इस इलाके पर अपना दावा करता है.
इसी साल मई में मोदी के नेतृत्व में बीजेपी को भारी बहुमत से जीत मिली. इससे हिंदू राष्ट्रवादियों की कुछ मांगों को मानने का उसे साहस मिला जैसे कश्मीर का विशेष दर्जा ख़त्म करना. पार्टी के भीतर इस फ़ैसले को काफी समर्थन भी मिला है.
लेकिन अपने फ़ैसले को सबके सामने रखने से पहले जिस तरह के कदम केंद्र सरकार ने उठाए उससे ये स्पष्ट ज़ाहिर है कि इस ख़बर पर कश्मीर में प्रतिक्रिया को लेकर सरकार तनाव में थी.
आनन-फानन में जम्मू-कश्मीर में हज़ारों की संख्या में सैन्यबलों को तैनात किया गया. अमरनाथ यात्रा पर गए तीर्थयात्रियों को तुरंत लौटने के लिए कहा गया. स्कूलों और कॉलेजों को बंद करने के आदेश दे दिए गए. पूरी घाटी में इंटरनेट और फ़ोन सेवाओं पर रोक लगा दी गई. धारा 144 लागू की गई और कश्मीर के कई नेताओं को नज़रबंद कर लिया गया.
भारत सरकार ने जम्मू कश्मीर का विषेश दर्जा तो ख़त्म किया ही, साथ ही प्रदेश के पुनर्गठन का भी प्रस्ताव दिया है.
इसके अनुसार जम्मू-कश्मीर अब राज्य नहीं रहेगा बल्कि इसकी जगह अब दो केंद्र शासित प्रदेश होंगे - जम्मू कश्मीर को और लद्दाख. जम्मू-कश्मीर की विधायिका होगी जबकि लद्दाख में कोई विधायिका नहीं होगी और दोनों प्रदेशों का शासन लेफ़्टिनेंट गवर्नर के हाथ में होगा.
उम्मीद है कि सरकार के इस फ़ैसले का जम्मू और लद्दाख में तो स्वागत होगा लेकिन कश्मीर घाटी में इसका विरोध होगा.
ये भी हो सकता है कि आज़ादी के बाद से लगातार हिंसा की चपेट में रहने वाले इस इलाके में एक बार फिर अशांति का दौर शुरु हो जाए.
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