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केरलः 'पानी के बम' अगर फटे तो मच जाएगी तबाही
- Author, सलमान रावी
- पदनाम, केरल से, बीबीसी संवाददाता
थंगमनी पिछले साल की उस बरसात की रात को कभी भूल नहीं सकतीं, जब वो चेंगनुर तहसील से लगभग 10 किलोमीटर दूर अपने गाँव में अपने पिता और पति के साथ थीं.
चेंगनुर दक्षिण भारत के केरल राज्य के अल्लेप्पी ज़िले में आता है, जो 2018 के अगस्त महीने में आई विनाशकारी बाढ़ में सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ था.
उनके इलाक़े में वैसे तो मानसून के महीनों में आस-पास पानी का बढ़ना कोई बड़ी बात नहीं है, लेकिन उस रात चीज़ें तेज़ी से बदल रहीं थीं. बादलों की गरज के बीच तेज़ बारिश रुकने का नाम नहीं ले रही थी. कुछ ही पलों में बरसात का पानी चढ़ने लगा. वो भी काफी तेज़ी के साथ.
पति के साथ मिलकर उन्होंने अपने वृद्ध पिता को किसी तरह घर की छत तक पहुंचाने की कोशिश की, लेकिन पानी घर की पहली मंजिल तक पहुँच चुका था.
उन पलों को याद कर थंगमनी कहती हैं, "हम कई दिनों तक फंसे रहे क्योंकि यहाँ पानी का बहाव भी काफी तेज़ था. कोई राहत नहीं आ रही थी. हम छत पर भीगते रहे. मेरे पिता की तबीयत बिगडनी शुरू हो गयी. कई दिनों तक हम में से किसी ने भी कुछ नहीं खाया था. लेकिन जबतक सेना और राहत कर्मी हम तक पहुँच पाते तब तक मेरे पिता ने दम तोड़ दिया था."
थंगमनी के परिवार को राहत शिविर में भेज दिजा गया जबकि उनके पिता का शव घर की छत पर ही पड़ा रहा. जब पानी उतरा तो फिर उनका अंतिम संस्कार हो पाया.
वो बताती हैं कि राहत शिविर में रहते समय ही उन्हें दस हज़ार रुपए मुआवज़े के तौर पर दिए गए. मगर एक साल होने को है. घर को हुए नुकसान और पिता की मौत के मुआवज़े के लिए अब वो सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगा रही हैं.
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44 नदियों पर 70 डैम
केरल में पिछले साल आई प्रलयंकारी बाढ़ ने 'भगवान का अपना देस' कहे जाने वाले केरल का चेहरा ही बदल कर रख दिया है. इस बाढ़ को आए एक साल होने को है जिसमें 350 से ज्यादा लोग मारे गए थे और बड़े पैमाने पर जान-माल की हानि हुई थी.
जानकारों का कहना है कि इस तबाही के पीछे डैमों का भी बड़ा हाथ है जो राज्य में बहने वाली 44 नदियों पर बनाए गए हैं.
वो इन डैमों को 'एक सुलगता हुआ पानी का बम' मानते हैं, जिनके फटने की स्थिति में पहले से भी ज़्यादा तबाही हो सकती है.
केरल में 70 से ज्यादा डैम हैं, जो यहां बहने वाली 44 नदियों पर बनाए गए हैं. इनमें से कई डैमों के प्रबंधन पर अब सवाल उठने लगे हैं.
साजी चेरियन चेंगनुर के विधायक और राज्य में सत्तारूढ़ वाम गठबंधन के प्रवक्ता भी हैं. बाढ़ के वक़्त साजी चेरियन द्वारा फ़ेसबुक पर मदद के लिए लिखी गई पोस्ट काफी वायरल हुई थी. मदद की गुहार लगाते हुए रो पड़ने वाला उनका वीडियो भी काफी वायरल हुआ था.
खुद चेरियन मानते हैं कि मुल्लापेरियार और इडुक्की जैसे कई डैम हैं, जो कभी भी आपदा ला सकते हैं.
बीबीसी से बातचीत के दौरान उनका कहना था, "मुल्लापेरियार डैम एक संवेदनशील पानी का बम बन गया है जो कभी भी फट सकता है और पहले से भी ज़्यादा तबाही मच सकती है. चिरुन्थोनी और इद्दुकी डैम भी इसी तरह के बमों के रूप में खड़े हैं. तमिलनाडु और केरल की सरकारों को चाहिए कि ज़ल्द से ज़ल्द कोई हल निकलें."
केरल उच्च न्यायालय ने जैकब पी एलेक्स के नेतृत्व में एक जांच समिति की नियुक्ति भी की, जिसने पाया कि ये डैम भारी बारिश का दबाव सह नहीं पाए और अचानक पानी छोड़े जाने की वजह से राज्य को प्रलयंकारी बाढ़ का सामना करना पड़ा.
एलेक्स ने केरल उच्च न्यायालय से विनाशकारी बाढ़ के संबंध में न्यायिक जांच की मांग भी की है. एलेक्स की जांच और उनकी रिपोर्ट से विशेषज्ञ भी सहमत हैं. उनका मानना है कि एक साल के बाद भी सरकार ने डैमों के प्रबंधन पर कोई ठोस क़दम नहीं उठाए हैं.
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सरकार की अनदेखी
नदी और जलाशय प्रबंधन विशेषज्ञ एसपी रवि के अनुसार केरल में कभी भी डैमों के प्रबंधन को लेकर गंभीरता नहीं देखने को मिली जबकि जानकार सरकार का ध्यान इस ओर दिलाते आए हैं.
उनका कहना था, "पिछले साल जून महीने से ही बारिश शुरू हो गई थी और जुलाई के अंत तक कई बार प्रदेश को बाढ़ का सामना करना पड़ा. इन तीन महीनों के अंतराल में हर बार बाढ़ का स्तर बढ़ता रहा. जल का स्तर बढ़ता रहा. ये ख़तरे की घंटी थी मगर किसी ने ध्यान नहीं दिया."
रवि के अनुसार आख़िरकार 16 अगस्त को इतनी बारिश हुई कि चीज़ें हाथों से निकल गयीं. तब तक सभी डैम लबालब भरे हुए थे.
वो कहते हैं, "पेरिन्ग्गलकुट्टी डैम पर पानी दो मीटर की ऊँचाई से बहता रहा. डैम को काफ़ी नुक़सान हुआ. मगर एक साल होने को है, आज तक सरकार ने ये वैज्ञानिक तरीके से ये पता लगाने की कोशिश नहीं की कि डैम को कितना नुक़सान पहुंचा है."
एन सुकुमारन नायर पर्यावरणविद् हैं और डैम और नदियों पर उन्होंने खासा शोध भी किया है. अल्लेपी के पूवाथूर के रहने वाले नायर कहते हैं कि राज्य में जितनी भी सरकारें रही हैं, उन्होंने न तो नदियों के डूब क्षेत्रों पर ध्यान दिया और न कभी डैमों के प्रबंधन पर.
वो कहते हैं कि केरल में हर साल अच्छी-खासी बारिश होती है और डैमों का प्रबंधन भी उसी के अनुसार होना चाहिए. अगर औसत से ज़्यादा बारिश होती है तो फिर डैमों में जमा पानी को सिलसिलेवार छोड़ते रहना चाहिए ताकि अचानक जमा पानी डैमों के लिए ख़तरा ना बन जाए. पिछले साल ऐसा ही हुआ.
बाढ़ ने केरल को काफी पीछे धकेल दिया है क्योंकि जो नुकसान राज्य को झेलना पड़ा है उसकी भरपाई में कई साल लग सकते हैं.
वैसे तो राज्य सरकार ने 'बेहतर केरल के पुनर्निर्माण' का नारा दिया है, मगर जिन लोगों के घर बाढ़ में बर्बाद हुए या जिन लोगों ने अपनों को खो दिया, वो आज भी अपने मकानों को बनाने के लिए सरकारी मुआवज़े का इंतज़ार कर रहे हैं.
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दावे और हक़ीक़त
हालांकि सरकार के प्रवक्ता साजी चेरियन ने बीबीसी से बात करते हुए दावा किया कि बाढ़ के दौरान केरल के सभी राज्य मार्ग और राष्ट्रीय उच्च मार्ग ध्वस्त हो गए थे जिनका एक साल के अन्दर पुनर्निर्माण कर लिया गया है.
वो कहते हैं, "पूरी दुनिया में ऐसा कहीं नहीं हुआ कि किसी आपदा के बाद इतनी जल्दी पुनर्निर्माण हो गया हो. एक लाख से ज़्यादा लोग विस्थापित हुए थे, जिनके लिए महीनों तक खाने का इंतज़ाम सरकार करती रही. चालीस हज़ार परिवारों को मुआवज़ा दिया गया."
मगर विधानसभा में चेरियन जिस इलाक़े का प्रतिनिधित्व करते हैं वो बाढ़ में सबसे ज़्यादा प्रभावित हुआ था.
उन्हीं के विधानसभा क्षेत्र की एक पंचायत है पंडानाड़ पंचायत, जहाँ 200 परिवार बाढ़ की चपेट में आ गए थे और यहाँ के 40 घर पानी में बह गए थे. यहाँ की मन्नारथरा कॉलोनी में आज भी लोग सामुदायिक केंद्र में रहने को मजबूर हैं.
इन्हीं में से एक हैं राधाकृष्णन जो सामुदायिक भवन के ठीक बगल में स्थित एक कंप्यूटर सेंटर में रहते हैं क्योंकि एक साल के बाद भी उनका ध्वस्त मकान नहीं बन पाया है. उनके जैसे कई और लोग भी हैं जैसे सूमा, जो विधवा हैं.
सूमा कहती हैं कि राहत शिविर में उन्हें दस हज़ार रुपए मुआवज़े के तौर पर मिले, लेकिन उसके बाद उन्हें एक पैसा भी नहीं मिला. "क्या दस हज़ार रूपए में आप अपना मकान बना लेंगे साहब?"
सूमा के पड़ोस में 75 वर्षीय जानकी का भी आधा-अधूरा घर है. वो कहती हैं, "पहले हमारे घर में फ्रिज था, टीवी था, बिस्तर और अलमारियां थीं. सब ख़तम हो गया. अब दस हज़ार रुपए मिले. इसमें क्या मकान बनाएं और क्या सामान खरीदें."
केरल की साक्षरता का दर भारत में सबसे ज़्यादा क्यों नो हो, मगर ये एकमात्र ऐसा राज्य है, जहाँ न तो बाढ़ की पूर्व चेतावनी की कोई प्रणाली काम कर रही है, न डैमों के प्रबंधन की और न ही बाढ़ डूब क्षेत्र के प्रबंधन की.
ऐसे में यह आशंका लगाई जा रही है कि 2018 की तरह फिर से बारिश हुई और उस जैसे हालात बने तो इस साल बड़ी तबाही मच सकती है.
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