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कांग्रेस में 100 से अधिक इस्तीफ़ों की झड़ी के पीछे क्या कारण हैं?
- Author, मोहम्मद शाहिद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी इंडियन नेशनल कांग्रेस में इस समय इस्तीफ़ों की झड़ी लग चुकी है लेकिन सबसे दिलचस्प बात यह है कि इस्तीफ़ा देने वालों में अधिकतर अनजाने नाम ही हैं.
कांग्रेस की विभिन्न राज्य इकाइयों को मिलाकर अब तक 100 से अधिक पदाधिकारी अपना इस्तीफ़ा सौंप चुके हैं. इनमें सबसे बड़ा नाम केवल राज्यसभा सांसद विवेक तनखा का है जो पार्टी के क़ानूनी और मानवाधिकार सेल के चेयरमैन भी हैं.
विवेक तनखा ने ट्वीट कर सुझाव दिया कि सभी को पार्टी के पदों से इस्तीफ़ा दे देना चाहिए ताकि राहुल गांधी को अपनी टीम चुनने के लिए पूरी छूट मिल सके. इससे पहले मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने भी इस्तीफ़ा देने की बात कही थी.
इनके अलावा इस्तीफ़ा देने वालों में दिल्ली प्रदेश कांग्रेस कमिटी के कार्यकारी अध्यक्ष राजेश लिलौठिया और तेलंगाना प्रदेश कांग्रेस कमिटी की कार्यकारी अध्यक्ष पूनम प्रभाकर भी शामिल हैं.
वहीं, शनिवार को उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमिटी के 35 पदाधिकारियों ने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया था. इन्होंने लोकसभा चुनाव में राज्य में पार्टी की हार के लिए ख़ुद को ज़िम्मेदार बताते हुए इस्तीफ़ा दिया.
कहां से शुरू हुआ इस्तीफ़ों का सिलसिला
लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को मिली करारी हार के बाद कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी ने हार की ज़िम्मेदारी लेते हुए अपने इस्तीफ़े की पेशकश की थी लेकिन इसको स्वीकार नहीं किया गया था.
इसके बाद कथित तौर पर गुरुवार को हरियाणा के कांग्रेस नेताओं के साथ हुई बैठक में राहुल गांधी ने कहा कि उन्होंने हार की ज़िम्मेदारी ली लेकिन राज्य इकाइयों में किसी ने हार की ज़िम्मेदारी लेते हुए इस्तीफ़ा नहीं दिया जिसके बाद इस्तीफ़ों की झड़ी शुरू हो गई.
हालांकि, कांग्रेस पर क़रीबी नज़र रखने वाले विश्लेषकों का कहना है कि राहुल गांधी ने ऐसी कोई बात नहीं की थी और मीडिया के द्वारा यह 'अफ़वाह' फैली.
क्या है कांग्रेस की रणनीति
इन इस्तीफ़ों को किस तरह से देखा जाना चाहिए? इस पर वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी कहती हैं कि यह साफ़-साफ़ सिर्फ़ कुछ नेताओं की नौटंकी नज़र आती है.
वह कहती हैं, "इतनी पुरानी कांग्रेस पार्टी में ऐसी हार के एक महीने बाद यह हंगामा हो रहा है और उसे कोई दिशा नहीं दिख रही है. राहुल गांधी ने हार की ज़िम्मेदारी लेकर बड़ी बात कही थी लेकिन अभी भी उनका इस्तीफ़ा नहीं स्वीकार किया गया है. कांग्रेस की स्थिति साफ़-साफ़ नज़र नहीं आ रही है और जो हालिया इस्तीफ़े हो रहे हैं, उससे लग रहा है कि एक नौटंकी सी चल रही है."
ऐसा कहा जा रहा है कि राहुल गांधी कांग्रेस अध्यक्ष का पद छोड़ने का पूरा मन बना चुके हैं. तो अब सवाल यह उठता है कि क्या यह इस्तीफ़े उन्हें अपने फ़ैसले पर सोचने को मजबूर करने के लिए हैं?
इस सवाल पर कांग्रेस पर बारीकी से नज़र रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार विनोद शर्मा कहते हैं कि राहुल गांधी पद नहीं लेंगे यह पूरा तय है.
वह कहते हैं, "कुछ दिनों पहले कांग्रेस संसदीय समिति की बैठक में राहुल गांधी ने साफ़ कर दिया था कि वह अब और अध्यक्ष बने नहीं रहेंगे. लेकिन वह राजनीति में सक्रिय रहेंगे. इस्तीफ़ा देने वाले कोई बड़ा नाम नहीं है और जनता उनके नाम तक नहीं जानती है और यह केवल नेता बनने की कोशिश है."
कांग्रेस के आगे अब क्या है रास्ता
2014 में पार्टी की हार के बाद कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने भी पार्टी के पदों से इस्तीफ़े की पेशकश की थी लेकिन उसे नहीं माना गया. इससे पहले शरद पवार के पार्टी छोड़ने पर सोनिया गांधी ने इस्तीफ़े की पेशकश की थी लेकिन वह भी स्वीकार नहीं किया गया.
तो क्या अभी भी राहुल गांधी का पार्टी अध्यक्ष पद पर बने रहना चाहिए? विनोद शर्मा कहते हैं कि कांग्रेस को अपना अंतरिम अध्यक्ष चुनना चाहिए जो एक साल तक कामकाज चलाए इसके बाद वह अपना अध्यक्ष चुने.
विनोद शर्मा कहते हैं, "वक़्त की अगर ज़रूरत है कांग्रेस पार्टी को नया नेता चुनने के लिए तो वह एक अस्थाई अध्यक्ष बना दें ताकि पार्टी का कामकाज चलता रहे और पार्टी महासचिव का पद प्रियंका गांधी को दे दें और इससे उनकी मुसीबतें सुलझ जाएंगी."
प्रियंका गांधी के संगठन में अहम पद पर बने रहने से कांग्रेस की मुश्किलें कैसे हल होंगी? इस पर विनोद शर्मा कहते हैं, "कांग्रेस के सामने बड़ी दुविधा यह है कि उसके नेता यह सोचते हैं कि गांधी परिवार के बिना पार्टी एकजुट नहीं रहेगी और इस बात में काफ़ी हद तक सच्चाई भी है. इस सच्चाई के चलते उन पर वंशवाद का आरोप भी लगता है. नया अध्यक्ष अगर प्रियंका को महासचिव पद पर बनाए रखता है तो वह संगठन को मज़बूती दे सकती हैं."
वहीं, नीरजा चौधरी का मानना है कि कांग्रेस को अगर फिर से जीवित होना है तो उसे अध्यक्ष बदलने के अलावा भी बहुत कुछ करना होगा.
वह कहती हैं, "गांधी-नेहरू परिवार के किसी सदस्य के अध्यक्ष पद पर न बने रहने से भी कांग्रेस अच्छा कर सकती है. लेकिन इसमें इन लोगों का समर्थन होना ज़रूरी है. नई ऊर्जा अगर पार्टी में लानी है तो उन लोगों को आगे लाना होगा जिनको जन समर्थन प्राप्त है. ज़मीनी नेताओं को आगे लाना होगा."
विनोद शर्मा कांग्रेस पार्टी में पुरानी जान डालने के लिए काडर को महत्वपूर्ण बताते हुए. वह कहते हैं कि पार्टी में इस समय नए काडर की भर्ती की ज़रूरत है.
वह कहते हैं, "इस पार्टी में अगर नए रक्त का संचार करना है तो इसको बड़े स्तर पर सदस्यता अभियान शुरू करना होगा. इसके लिए सिर्फ़ केंद्र और राज्यों में सिर्फ़ नेताओं को बदलने से काम नहीं चलेगा. उसके साथ-साथ पार्टी को जनता से जुड़े हुए मुद्दों को लेकर काम करना होगा और सड़कों पर उतरना होगा."
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