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कांग्रेस का अध्यक्ष बनकर भी कोई राहुल-सोनिया से बड़ा हो पाएगा
- Author, रशीद किदवई
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार
कांग्रेस तरह-तरह के अस्तित्व के संकट का सामना कर रही है. इसकी ज़िम्मेदारी लेते हुए राहुल गांधी ने इस्तीफ़े की पेशकश की है.
हालांकि पार्टी के निष्ठावान नेता उत्तराधिकारी के मसले पर बात करने को तैयार नहीं हैं.
राहुल गांधी की मां सोनिया गांधी जो ख़ुद भी पार्टी प्रमुख रही हैं वो इस पसोपेश में हैं कि वो अपने बेटे के पद छोड़ने के फ़ैसले का समर्थन करें या पार्टी नेताओं की निष्ठा का आनंद लें.
मतलब ये है कि आख़िर "बिल्ली के गले में घंटी बांधेगा कौन". गांधी परिवार के प्रति निष्ठा की वजह से कांग्रेस की कार्यसमिति अंतरिम अध्यक्ष का नाम घोषित नहीं कर पा रही है. वहीं राहुल गांधी किसी का नाम लेकर ये नहीं दिखाना चाहते कि उन्होंने 'अपना आदमी' ही अध्यक्ष बनाया है.
क्या कहता है पार्टी का संविधान
कांग्रेस के संविधान के मुताबिक़ पार्टी अध्यक्ष के इस्तीफ़े पर पार्टी की कार्यसमिति की बैठक में जल्द से जल्द चर्चा होनी चाहिए. जब तक नया अध्यक्ष न नियुक्त किया जाए तब तक अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के वरिष्ठतम सदस्य को पदभार संभालना चाहिए.
इसके बाद देश की इस सबसे पुरानी पार्टी के पास सभी पार्टी पैनलों को भंग करके फिर से संस्थागत चुनाव कराने का विकल्प है.
पार्टी में ऐसे नेताओं की कमी नहीं है जो कांग्रेस की सेवा कर सकें. ख़ासकर तब जब सोनिया गांधी रायबरेली और राहुल गांधी वायनाड से सांसद हों और प्रियंका गांधी एआईसीसी की महासचिव हों.
लोगों की कमी नहीं
पार्टी के पास टैलेंट की भी कोई कमी नहीं है. पांच मुख्यमंत्री हैं- कमलनाथ, कैप्टन अमरिंदर सिंह, अशोक गहलोत, भूपेश बघेल और वी नारायणसामी. पार्टी में ग़ुलाम नबी आज़ाद, आनंद शर्मा, पी चिदंबरम, अहमद पटेल, मुकुल वासनिक, पृथ्वीराज चव्हाण, ज्योतिरादित्य सिंधिया, कपिल सिब्बल, दिग्विजय सिंह, मिलिंद देवड़ा, जितिन प्रसाद, शशि थरूर, मनीष तिवारी, शिवकुमार, अजय माकन जैसे अनुभवी नेता भी हैं.
इनमें से कुछ भले ही हाल में हुए लोकसभा चुनावों में हार गए हों लेकिन उनके पास सार्वजनिक पदों पर रहने का बड़ा अनुभव है.
इसके अलावा कांग्रेस के पास डॉ. मनमोहन सिंह, एके एंटनी, वीरप्पा मोइली, मल्लिकार्जुन खड़गे, सुशील कुमार शिंदे, मीरा कुमार, अंबिका सोनी, मोहसिना किदवई, शीला दीक्षित जैसे कई दिग्गज भी हैं जो दशकों के अपने अनुभव के आधार पर सलाह दे सकते हैं.
पार्टी के नए प्रमुख को कांग्रेस संसदीय बोर्ड का गठन करना चाहिए जिसका गठन 1991 से नहीं हुआ है.
किन नामों पर चर्चा
2017-18 में अशोक गहलोत पार्टी के मामलों के एआईसीसी महासचिव थे. इसी साल पार्टी ने गुजरात के विधानसभा चुनावों में अच्छा प्रदर्शन किया था और मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ का चुनाव जीत लिया था.
वो सामाजिक रूप से पिछड़े वर्ग से आते हैं और राजस्थान के बाहर भी कांग्रेस के नेताओं में उनकी स्वीकार्यता है. उन्हें अंतरिम अध्यक्ष बनाया जा सकता है.
लेकिन पार्टी के भीतरी लोग दलित होने के आधार पर मुकुल वासनिक और साफ़ छवि के कारण एके एंटनी के नाम भी ले रहे हैं.
कांग्रेस को ये समझना चाहिए कि दलित आधार पर मीरा कुमार या मुकुल वासनिक जैसे सांकेतिक संदेशों ने काम करना बंद कर दिया है और ऐसे में इस आधार पर नियुक्ति करने से उसे कोई फ़ायदा नहीं होगा.
इसी तरह एके एंटनी राजनीतिक तौर पर अप्रसांगिक हो चुके हैं और उनकी मौजूदगी से पार्टी के लिए मुसीबतें ही बढ़ेंगी. पार्टी को इस समय निर्णायक नेतृत्व की ज़रूरत है.
पार्टी को पुनर्जीवित करना होगा
कांग्रेस पार्टी को अब फिर से मूल्यों पर लौटकर अपने आप को एक नए दौर की पार्टी के तौर पर पुनर्जीवित करना होगा.
नेहरू गांधी परिवार पर निराशाजनक निर्भरता पार्टी के सामने पहली चुनौती है लेकिन किसी वजह से पार्टी अब भी आगे की दिशा में बड़ा क़दम उठाने से कतरा रही है.
पार्टी के नेता ये बुनियादी बात ही नहीं समझ पा रहे हैं कि गांधी न उन्हें छोड़ रहे हैं और न ही राजनीति को. वो बस अटल बिहारी वाजपेयी की तरह भूमिका निभाना चाहते हैं, जो दशकों तक पार्टी में किसी पद पर नहीं रहे लेकिन पार्टी के अहम नेता और प्रमुख चुनाव अभियान संचालक बने रहे.
23 मई के बाद की कांग्रेस ने ऑस्टरिच जैसा रवैया अपना लिया है. कार्यसमिति की एक बैठक के अलावा पार्टी के नेताओं ने एआईसीसी का कोई सत्र या ज़मीनी आवाज़ों को सुनने के लिए कोई कार्यकर्ता सम्मेलन नहीं किया है.
लोकसभा में पार्टी अपने 52 सांसदों का नेता चुनने के लिए चुनाव तक नहीं कर सकी है बल्कि पार्टी ने सोनिया गांधी को संसदीय दल का नेता चुनने के लिए अधिकृत किया, जिन्होंने अधीर रंजन चौधरी को संसदीय दल का नेता चुना.
कांग्रेस के लिए सबसे बुरा यही होगा कि कोई प्रॉक्सी अध्यक्ष पार्टी के बजाय गांधी परिवार के लिए काम करे. 1997 में जब सोनिया गांधी ने औपचारिक तौर पर पार्टी की सदस्यता ली तो सीताराम केसरी कुछ भी नहीं रहे, भले ही वो उस समय पार्टी के अध्यक्ष थे.
जनवरी से लेकर मार्च 1998 के बीच, जब केसरी को पद से हटाया गया था, तब ऑस्कर फ़र्नांडीज़ और वी जॉर्ज को उनके घर फ़ाइलों पर दस्तख़त कराते हुए देखा जाना आम बात थी. वो पार्टी के अहम पदों पर नियुक्तियों के दस्तावेज़ केसरी से हस्ताक्षर कराने आते थे.
हमेशा से ही दब्बू रहे केसरी, जॉर्ज या फर्नांडीज़ के कहने पर बताई गई जगह हस्ताक्षर करने पर कुछ परेशान ही रहते थे. गहलोत या उन जैसा कोई भी जिसे पार्टी अध्यक्ष बनाया जाए उसके साथ केसरी जैसा व्यवहार न किया जाए.
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