झारखंड: रामचरण मुंडा की मौत भूख या व्यवस्था की चूक से

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- Author, रवि प्रकाश
- पदनाम, लातेहार (झारखंड) से, बीबीसी हिंदी के लिए
कहते हैं कि मौत के साथ ज़िंदगी के सारे सवाल ख़त्म हो जाते हैं लेकिन रामचरण मुंडा के साथ शायद ऐसा नहीं हो पाया.
झारखंड के लातेहार ज़िले के लुरगुमी-कला गांव के 68 वर्षीय रामचरण मुंडा अब इस दुनिया में नहीं हैं.
पिछले हफ़्ते उनकी मौत भूख से हुई या बीमारी से? इस सवाल पर बहस अभी ख़त्म नहीं हुई है.
परिवार वाले कह रहे हैं कि वे बीमार थे, इसलिए मर गए लेकिन गांव वालों का कहना है कि इस मौत का कारण भूख है.
स्थानीय मीडिया में इन्हीं परिवार वालों के हवाले से उनकी मौत भूख से होने की ख़बरें प्रकाशित-प्रसारित की गईं थीं.
इसके वीडियो क्लिपिंग्स मौजूद हैं. पर परिवार वाले अब इससे इनकार कर रहे हैं.
भूख से मौत का मामला?
मुंडा की लाश पोस्टमॉर्टम के बगैर दफना दी गई थी. लिहाजा, प्रमाणिक तौर पर ये नहीं कहा जा सकता कि उनकी मौत की वजह भूख थी या नहीं.
रांची से क़रीब 200 किलोमीटर दूर महुआडांर प्रखंड का लुरगुमी-कला गांव दुरुप पंचायत का हिस्सा है. लातेहार से इसकी दूरी क़रीब 160 किलोमीटर है.
वहां बस से जाने में छह घंटे लग जाते हैं. अपनी गाड़ी हो तो भी ये दूरी तय करने में तीन घंटे का वक्त लेती है.

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शायद यही वजह रही होगी कि ज़िले के आला अधिकारियों ने खुद लुरगुमी-कला आना मुनासिब नहीं समझा होगा.
इस बीच महुआडांर के एसडीओ शशि प्रकाश झा ने कहा है कि पहली नज़र में ये भूख से मौत का मामला नहीं लगता लेकिन अभी इसकी जांच कई और बिंदुओं पर की जाएगी.
अन्न का संकट
रामचरण मुंडा की पत्नी चमरी देवी ने बताया कि उनकी तीन संतानों में से इकलौते बेटे की मौत कुछ साल पहले टीबी से हो गई थी.
उसके इलाज के लिए उन्होंने अपनी ज़मीन गिरवी रखकर कर्ज लिया. उसे चुकता नहीं कर पाने के कारण वे ज़मीन वापस नहीं ले सके.
ऐसे में राशन से मिलने वाले अनाज पर उनकी निर्भरता समझी जा सकती है.
चमरी देवी ने बीबीसी से कहा, "मेरे डीलर ने तीन महीने से राशन नहीं दिया. इसलिए घर में अन्न का संकट था. पांच महीने से वृद्धावस्था पेंशन भी नहीं मिल रहा था."
राशन और मोबाइल नेटवर्क
रामचरण मुंडा के पड़ोसियों को भी दो महीने से चावल नहीं मिला था.
उनके पड़ोसियों के घरों में जाकर उनकी स्थिति जानने की कोशिश की तो पता चला कि गांव मे किसी को भी पिछले दो महीने से राशन नहीं मिला था.
गांव के राम मुंडा और रोएबा बीबी ने बीबीसी से कहा, "हम लोगों को तब चावल मिला, जब रामचरण मुंडा की मौत हो चुकी थी."
"अब एक आदमी मरिए गया, तो चावल लेने का क्या फायदा. सरकार ये बात क्यों नहीं समझती कि जब नेटवर्क ही नहीं रहेगा, तो कोई ऑनलाइन सिस्टम कैसे काम करेगा."
जबकि रुहुल्ला अंसारी का कहना था, "लुरगुमी कला और बरदौनी के बीच एक मोबाइल टावर लगाया गया है लेकिन वह काम नहीं करता."
"फिर भी हमारे डीलर की मशीन ऑनलाइन की गई. हमलोग केंदू पत्ता बेचकर दो पैसा कमा लेते हैं, इसलिए भूखे नही मरे. वरना, सबकी हालत रामचरण मुंडा वाली हो जाती."

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महीने से राशन नहीं
जन वितरण प्रणाली (पीडीएस) के तहत एक रुपये प्रति किलो मिलने वाला चावल रामचरण मुंडा को तीन महीने से नहीं मिल रहा था.
क्योंकि, उनके गांव की राशन वितरण व्यवस्था दो महीने पहले अचानक ऑनलाइन कर दी गई. गांव में इंटरनेट की कनेक्टिविटी नहीं है.
मोबाइल का नेटवर्क भी नहीं मिलता. इस कारण पीडीएस डीलर मीना देवी अपने कोटे का राशन नहीं बांट पा रही थीं.

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दुरुप की मुखिया उषा खलखो ने बीबीसी से कहा, "महुआडांर प्रखंड के अधिकतर गांवों में नेटवर्क की समस्या है."
"इस कारण पहले यहां ऑफ़लाइन सिस्टम से राशन वितरण की व्यवस्था थी. तब गांव के लोगों को नियमित तौर पर राशन मिलता था."
"कुछ महीने पहले गांव के डीलर की मौत हो गई. तब ये काम उनकी पत्नी को मिल गया. तभी से व्यवस्था ऑनलाइन हो गई और राशन वितरण बंद हो गया."
कार्रवाई क्यों नहीं हुई
झारखंड सरकार के खाद्य एवं आपूर्ति मंत्री सरयू राय का इस बारे में कहना है कि राशन वितरण व्यवस्था ऑफ़लाइन कराने से जुड़ा आवेदन विभाग की वेबसाइट पर दिया जा सकता है.

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"इससे 24 घंटे में ही संबंधित डीलर की मशीन ऑफ़लाइन करा दी जाती. लेकिन अधिकारियों ने इस मामले में चूक की. लिहाजा, उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है."
मंत्री सरयू राय ने ये भी कहा, "भूख से मौत के मामले में सरकार ने कुछ प्रोटोकॉल तय किए हैं. इसके तहत संबंधित व्यक्ति के शव का पोस्टमॉर्टम कराया जाता है."
"इस मामले में वो नहीं हो सका. इसलिए मैंने परिवार वालों की रजामंदी के बाद रामचरण मुंडा की लाश कब्र से खुदवा कर उसका पोस्टमॉर्टम कराने का निर्देश भी दिया है.

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झारखंड में मोबाइल नेटवर्क
'राइट टू फूड कैंपेन' से जुड़े बलराम कहते हैं, "ये एक तरह से क्रॉनिक स्टारवेशन है, क्योंकि रामचरण मुंडा को भरपेट और पौष्टिक भोजन नहीं मिल पा रहा था."
"एक-एक आदमी तीन-तीन, चार-चार सिम लेकर घूम रहा है. फिर भी नेटवर्क नहीं मिलता. ऐसे में ऑनलाइन राशन वितरण की व्यवस्था समझ से परे है."
नेटवर्क के कराण राशन वितरण में दिक्कतों का मामला सिर्फ सुदूर लातेहार तक सीमित नहीं है. इसका असर राजधानी रांची से सटे गांवो में भी है.

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रांची से महज 38 किलोमीटर की दूरी पर बसे चान्हो प्रखंड के चलियो गांव की कई महिलाओं को भी राशन नहीं मिल रहा है.
इस गांव की शीला देवी ने बताया कि उनके गांव के डीलर का तर्क है कि उनका कार्ड उसकी मशीन में नहीं दिख रहा है, इसलिए वे राशन नही दे सकते.
एक डीलर की कहानी
रांची ज़िले के एक राशन डीलर ने पहचान गोपनीय रखने की शर्त पर बताया कि नेटवर्क अक्सर गायब हो जाता है.
"कई बार हमलोग नेचवर्क खोजते-खोजते अपनी दुकान से एक-एक किलोमीटर दूर तक जाते हैं वहां कार्डधारकों के अंगूठे का निशान (बायोमीट्रिक) लेने के बाद दोबारा दुकान पर आकर राशन बांटना पड़ता है. कभी-कभी तो चार-चार दिन तक नेटवर्क नहीं मिलता. तब कार्डधारक बगैर राशन वापस लौटते रहते हैं. यह बहुत खराब स्थिति है."
"नेटवर्क नहीं रहने पर अगर हम अपवाद रजिस्टर से किसी को राशन देना चाहें, तो इसके लिए पांच गवाहों को खोजना पड़ता है."
"उसकी इतनी जांच होती है कि हमलोग अपवाद रजिस्टर से राशन देने में डरते हैं. हमारे लिए यह अपवाद नहीं विवाद रजिस्टर है."
फैक्ट फाइल
झारखंड में कार्ड धारकों की कुल संख्या - 5,701,944
लाभान्वित होने वाले परिवारों की संख्या - 26,270,430
डीलरों की कुल संख्या -26,135
कुल हैंड होल्ड डिवाइस - 24,153
(स्रोत - खाद्य व आपूर्ति विभाग)
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