लोकसभा चुनाव 2019: इस चुनाव में क्या लहर के ऊपर लहर थी?

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लोकसभा चुनावों में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए को भारी बहुमत मिला है और बीजेपी ने अकेले दम पर 300 सीटों का आंकड़ा पार कर लिया है.
यह चुनाव कई मायनों में ऐतिहासिक रहा है. ऐसा पहली बार हो रहा है कि पहली ग़ैर कांग्रेसी सरकार पूर्ण बहुमत से लगातार दूसरी बार देश की सत्ता पर काबिज़ होने जा रही है.
लेकिन इस चुनाव में आए नतीजों के क्या मायने हैं?
सी-वोटर्स के यशवंत देशमुख बताते हैं कि देश के सबसे बड़े चुनाव में ये ऐतिहासिक है जीत है.
90 करोड़ मतदाताओं में से 67 फ़ीसदी यानी 60 करोड़ ने वोट किया. इन वोटों में से आधे से अधिक बीजेपी के हिस्से में गए.
हमारे देश में स्प्लिट वोटिंग का तरीका अपनाया गया. ओडिशा जैसे राज्य में, जिसके लिए कहा जाता है कि बहुत पिछड़ा हुआ राज्य है और जहां साक्षरता दर भी कम है, वहां लोगों ने दो तरह के फ़ैसले किए हैं.
निम्न आय वर्ग ने बीजू जनता दल को वोट किया तो मध्यम और उच्च आय वर्ग के लोगों ने बीजेपी को वोट किया. इसके अलावा जिन राज्यों में तीन-चार महीने पहले ही बीजेपी बुरी तरह हारी थी, वहां लोगों ने ज़बरदस्त तरीके से बीजेपी को वोट दिया.

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दिसम्बर में जब तीन राज्यों के एक्ज़िट पोल में ये बात कही जा रही थीं तो किसी को विश्वास नहीं हो रहा था.
ऐसा माना जाता है कि छह महीने के अंतराल में अगर विधानसभा और लोकसभा चुनाव हैं और विधानसभा में जो जीत जाता है तो छह महीने तो उसका हनीमून पीरियड ही होता है.
इसलिए छह महीने के अंदर जो भी चुनाव होगा वो ज़रूर रिपीट होता है. दिसम्बर में जब वो नतीजे आए थे तब भी हमने एक्ज़िट पोल में पूछा था कि अगर विधानसभा चुनाव और लोकसभा चुनाव साथ होते तो आप किसे वोट देते.
हमने तब कहा था कि विधानसभा चुनाव से लोकसभा चुनाव में पंद्रह फीसदी का वोट शिफ़्ट होगा और वही हुआ.
उत्तर प्रदेश के बारे में सबसे ज़्यादा बात हुई. वहां मोदी को हराने के लिए महागठबंधन बनाया गया, उसके फ़ेल होने की कई वजहें रहीं.
हमने एक्ज़िट पोल में कहा था कि बीजेपी को महागठबंधन से तीन फ़ीसदी वोट ज़्यादा मिल रहा है.
यहां कांटे की टक्कर इसलिए मानी जा रही थी क्योंकि राज्य में 10-12 सीटें जो शहरी सीटें हैं वहां बीजेपी का मार्जिन बहुत बड़ा हो रहा था.

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इसलिए ऐसा माना जा रहा था कि हो सकता है कि वोट बीजेपी को ज़्यादा मिले लेकिन सीटों के मामले में महागठबंधन कांटे की टक्कर दे.
लेकिन शायद वोटों का ट्रांसफ़र सही हुआ नहीं और तीसरी चीज़ ये कि कुछ सीटें ऐसी निकल कर आईं जहां पर महागठबंधन का काम कांग्रेस के उम्मीदवारों ने बिगाड़ा.
कांग्रेस की रणनीति
कांग्रेस ने क्या रणनीति बनाई ये तो केवल कांग्रेस जानती है या उसके नेता जानें कि ये चुनाव लड़ा कैसे उन्होंने और क्यों लड़ा.
राजनीतिक विशलेषकों का कहना था कि जो सीटें 2014 में मोदी सरकार को मिली थीं उससे हर राज्य में दो-चार सीट कम होंगी लेकिन बढ़ेंगी नहीं.
लेकिन राजस्थान, मध्यप्रदेश जैसे राज्यों में भी बीजेपी को अच्छी सीटें मिलीं, इन प्रदेशों में एक तरह से देखा जाए तो कह सकते हैं कि लहर के ऊपर लहर चली है और ऐसा देखने को दुर्लभ ही मिलता है.
दो-चार सीटों के हारने की संभावना तो हमारे सर्वे में भी आ रही थी. वोट शेयर का अंतर 15-15 फ़ीसदी था लेकिन ऐसा माना जा रहा था कि तीन सीट राजस्थान में, चार सीट मध्यप्रदेश में या एक सीट हरियाणा में कम होगी, लेकिन बहुत कम अंतर होगा.

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ये भी कुल मिलाकर 25-30 सीटों का अंतर आना था लेकिन वो भी नहीं हुआ.
लहर के ऊपर लहर शायद इसलिए चली क्योंकि तीन विधानसभा चुनावों में शायद लोगों का गुस्सा निकल गया और ऐसी स्थिति आ गई.
जो लोग मोदी को सबक सिखाना चाहते थे वे ये भी नहीं चाहते थे कि कांग्रेस आ जाए या शिवराज को सबक सिखाना था लेकिन हराना नहीं चाहते थे और इसी असमंजस का फ़ायदा बीजेपी को मिला.
पंजाब बेअसर
पंजाब में गुरदासपुर में सनी देओल जीत गए लेकिन अधिकांश सीटों पर बीजेपी पीछे है, जबकि पंजाब भी बॉर्डर स्टेट है.
पंजाब का फ़ैसला इसलिए अलग है क्योंकि वहां अमरिंदर सिंह लोकप्रिय मुख्यमंत्री हैं. दूसरी बात ये कि पंजाब में अकालियों के खिलाफ़ गुस्सा अभी भी बरकरार है.

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स्थानीय पार्टियों को 100 के आस पास सीटें मिली हैं. आंध्र प्रदेश में अकेले वाईएसआर के जगन मोहन रेड्डी को 22 सीटें मिली हैं, लेकिन अब इनकी जीत का कोई मतलब नहीं रह जाएगा.
2004 या 2009 में उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बीएसपी के पास अच्छी ख़ासी सीटें थीं लेकिन फिर भी राष्ट्रीय राजनीति में दस साल तक कोई मतलब नहीं था. वही एक हिस्सा था जहां उत्तर प्रदेश राष्ट्रीय राजनीति में अप्रसांगिक हो गया था, क्योंकि यूपीए को उनकी ज़रूरत नहीं थी.
उत्तर प्रदेश और बिहार की प्रासंगिकता तब वापस आई जब एनडीए या बीजेपी को बहुमत मिला. जैसे उत्तर प्रदेश को झेलना पड़ा वैसे ही बाकी राज्यों के साथ होने जा रहा है.
अगर यही आंकड़ा 345 के बजाय 260 होता तो ये किंगमेकर होते. लेकिन जनता आजकल किंगमेकर बनाने के लिए मौका दे ही नहीं रही.
(बीबीसी हिंदी से बातचीत पर आधारित.)
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