राहुल गांधी या नरेंद्र मोदी, जोड़-तोड़ किसके लिए आसान?-नज़रिया

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- Author, अरविंद मोहन
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
भले ही एक्ज़िट पोल के नतीजों में एनडीए को बहुमत मिलता नज़र आ रहा है लेकिन ये अगर नतीजों में ना बदले तो..
सियासी दलों ने चाहे वे बड़े हों या छोटे, किसी एक गठबंधन को स्पष्ट बहुमत न मिलने की स्थिति में क्या करना है, इसकी न सिर्फ़ रणनीति बनाने में लगे हैं बल्कि लेन-देन मोलभाव की संभावनाएं सक्रियता से तलाश कर रहे हैं.
मोदी-शाह और राहुल नतीजे आने के बाद ही जोड़ तोड़ में सक्रिय होंगे, ऐसा मानना नासमझी होगी.
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ऐसा नहीं है कि चंद्रबाबू नायडू और के चंद्रशेखर राव जैसे नेता ही सक्रिय हैं, यूपीए की प्रमुख सोनिया गांधी के नाम से ही मिलने-जुलने के न्यौते बंटने लगे हैं.
चंद्रबाबू काफी हद तक कांग्रेस और राहुल गांधी के पक्ष में जोड-तोड़, समीकरण, शासन और सरकार का एजेंडा बनाने की कोशिश कर रहे हैं तो तेलंगाना के मुख्यमंत्री केसीआर साहब अपने लिए अहम भूमिका तलाश रहे हैं. उनको कई जगह से दो टूक जवाब भी मिला है.
कहा तो ये भी जा रहा था कि कांग्रेस ने वाईएसआर कांग्रेस के नेता जगन मोहन रेड्डी से भी सम्पर्क किया जो उस समय विदेश थे.
इन कोशिशों को देखते हुए माना जाने लगा था कि अगली संसद में किसी गठबंधन को साफ़ बहुमत न मिलने की संभावना को भांपकर ये कोशिशें हो रही हैं.

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जनता की नब्ज़
चुनाव में सीधी भागीदारी और जनता की नब्ज़ को बेहतर जानने वाले जब इस तरह का प्रयास करें तो पत्रकार चौंकन्ने हो ही जाते हैं.
जब सोनिया गांधी के नाम से न्योता बंटने और तारीख की अदल-बदल की खबर आई तो इसे त्रिशंकु संसद बनने और आगे की तैयारियों का संकेत ही समझा गया.
देने को तो इस तरह के सिग्नल नरेंद्र मोदी ने भी दिए, पर एक नेता, मजबूत नेता और पाकिस्तान को धूल चटाकर दिग्विजय पर निकले नेता की भी कुछ मजबूरियाँ थीं और हैं.
जब पूरा चुनाव उनके नाम पर लडा गया हो, उसे भी अपने पक्ष और विपक्ष के बंटवारे में मजा आ रहा हो तो वे किस तरह पोस्ट-पोल एलायंस और जुगाड़ की तरफ जा सकते हैं.

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एनडीए नेताओं की परेड
लेकिन जब उनको भी लगा कि चुनाव किस लाइन पर है और यूपी-बिहार का नुकसान शायद बंगाल-ओडिशा की बढ़त से पाटा नहीं जा सकेगा तो उन्होंने कभी एनडीए का हिस्सा रह चुकीं ममता बनर्जी की तरफ़ से कुर्ता और रसोगुल्ला भेजने की बात सार्वजनिक की.
बीजू जनता दल के ख़िलाफ़ आक्रमण को धीमा किया, तूफान राहत के नाम पर नवीन पटनायक के साथ खूब तस्वीरें साझा कीं और जब ममता ने उल्टा सिग्नल देना शुरू किया तो आक्रमण तेज कर दिया.
इस बीच उन्होंने अपने नामांकन के समय एनडीए नेताओं की परेड भी कराई और प्रकाश सिंह बादल के सार्वजनिक तौर पर पैर भी छुए.
नरेंद्र मोदी, एनडीए, भाजपा और उनके लगभग सारे ही उम्मीदवारों को नरेंद्र मोदी की मजबूत नेता वाली छवि से लाभ हुआ.
उनसे नाराज शिव सेना भी इसी बात का लाभ लेने के लिए वापस गठबंधन में आई लेकिन अपनी पसंद का सौदा पटाने के बाद.

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मोदी-शाह की जोड़ी
मोलभाव करके अपने हिस्से में ज़्यादा सीटें लेने के बाद, खुद को पीएम मैटेरियल मानने वाले नीतीश कुमार भी सिर झुकाकर चुनाव में साथ ही रहे लेकिन छठे चरण के करीब आते-आते बिहार को स्पेशल स्टेटस दिलाने की मांग उठाने लगे, जिसकी वजह से लोग पूछने लगे कि क्या वे फिर पलटने वाले हैं?
किसी भी सधे हुए नेता की तरह, नीतीश भी मोल-भाव का कोई मौका नहीं चूकेंगे.
अभी चुनाव खत्म भी नहीं हुआ और नतीजे आए भी नहीं कि मोदी की मज़बूत नेता, दबंग नेता की छवि से दिक्कत होने लगी है, अगर वे उतने मज़बूत साबित नहीं हुए जितने बताए जाते हैं तो पार्टी के अंदर और बाहर, दोनों तरफ़ से उन पर सवाल उठेंगे क्योंकि पूरा चुनाव उन्होंने अपने नाम पर लड़ने का जोखिम उठाया है.
यह तो नतीजे आने पर ही पता चलेगा लेकिन अगर वे अकेले अपने दम पर बहुमत ले आए तो एनडीए के घटक दलों की 2014-19 की तुलना में और भी दयनीय दशा होगी.
हालांकि ये भी कहना चाहिए कि घटक दलों की तमाम शिकायतों के बावजूद मोदी-शाह एनडीए को बनाए रखने में मोटे तौर पर कामयाब रहे.

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गठबंधन की सरकार
तेलुगू देशम पार्टी (टीडीपी) को छोड़कर गठबंधन मोटे तौर पर 2014 जैसा ही है, जेडीयू और शिवसेना को रियायत देकर मना लिया गया, यहां तक कि अलग हो गए असम गण परिषद को भी दोबारा जोड़ा गया.
ये सभी सीट बँटवारे में रियायत और भविष्य की संभावनाओं के मद्देनज़र साथ आए हैं लेकिन नतीजे आने के बाद मोलभाव में कसर नहीं छोड़ेंगे.
इसकी तुलना में ढीली-ढाली छवि के राहुल को काफी सुविधा होगी और गठजोड़ बनाने के सूत्रधार गुलाम नबी आज़ाद ने तो ये भी कह दिया है कि गठबंधन की सरकार बनाने के लिए प्रधानमंत्री पद का दावा भी छोड़ा जा सकता है. पहले यह बात गुपचुप भी की गई होगी.
ज़ाहिर तौर पर भाजपा और नरेंद्र मोदी की तरफ से एकदम मजबूरी न हो जाए ऐसी घोषणा की ही नहीं जा सकती.
नरेंद्र मोदी के नेतृत्व और दावे को भाजपा नीचे कर ले यह मुमकिन नहीं लगता है. ऐसे करने से तो उसका सारा चुनावी ही नहीं, राजनीतिक कथानक ही धूल-धूसरित हो जाएगा.
गैर-कांग्रेसी दलों के नेता
ऐसे में उसे गठबंधन के नाम पर पालकी ढोने वाले या कुछ लाभ ले-देकर पट जाने वाले साथी मिलने की संभावना ज्यादा है.
किसी को बड़ा पद या मनचाहा विभाग और अनुपात से ज्यादा प्रतिनिधित्व देने जैसे तरीकों से सहयोगी जोड़े जा सकते हैं, पर वास्तविक अर्थ में वह न गठबन्धन की राजनीति होगी न उसका कोई अलग एजेंडा होगा.
कभी कोई रामविलास पासवान एकाध मसले पर देर से मुंह खोल लें या नीतीश कुमार मंच पर वन्देमातरम् पर चुप्पी लगा लें यही उपलब्धि बच जाएगी.
इस मामले में कांग्रेस या गैर-भाजपा गैर-कांग्रेसी दलों के नेता बेहतर स्थिति में हैं.
कांग्रेस अगर अभी से प्रधानमंत्री पद का दावा छोड़ने को तैयार है तो इसे राहुल के लिए 'खतरा' न मानकर एक रणनीति ही माना जा रहा है.
दूसरी ओर, गडकरी या राजनाथ सिंह कुछ भी ऐसा बोल देते हैं जिसका मतलब खींच-तानकर भी मोदी विरोध निकाला जाता है तो मोदी जी के कान तो खड़े होते ही हैं, खुद गडकरी जैसों को सफाई देते-देते मुश्किल हो जाती है.

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गठबंधन की ज़रूरत
यहाँ अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी का किस्सा भी लाना दिलचस्प होगा.
मंदिर आंदोलन के बाद सारी पार्टी आडवाणी की बनाई थी, सांसदों में ज्यादातर लोग उनके खेमे के थे, पार्टी पर उनकी जबरदस्त पकड़ थी.
दूसरी तरफ, वाजपेयी थे जो मंदिर आंदोलन से दूरी बनाए हुए थे.
23 दिसंबर की रात तो वे अकेले रायसीना रोड के अपने मकान में थे पर जैसे ही गठबंधन की ज़रूरत पड़ी भाजपा को एक मिनट की देर न लगी आडवाणी को दरकिनार करने में क्योंकि उनके नाम पर दूसरे दल साथ आते नहीं, समर्थन करते नहीं.
अकेले दम पर पूर्ण बहुमत न मिलने की हालत में भाजपा दोबारा ऐसा नहीं करेगी ऐसी भविष्यवाणी करना मुश्किल है, नतीजा आने से पहले सब कुछ कयास ही होगा, लेकिन मोदी की छवि जैसी ही उन्हें दोबारा दूसरों का समर्थन जुटाने में आडवाणी से ज़्यादा ही दिक्कत होगी, कम नहीं.

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नतीजों को लेकर भविष्यवाणी करना मुश्किल है लेकिन हम देख रहे हैं कि राजनीति नतीजों के इंतज़ार में नहीं बैठी है. वे सारे खिलाड़ी पर्याप्त सक्रिय हो गए हैं जो अगली सरकार के गठन में भूमिका निभा सकते हैं.
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