मायावती सरकार से जुड़ा चीनी मिलों की बिक्री का मामला क्या है?

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    • Author, अभिजीत श्रीवास्तव
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

उत्तर प्रदेश सरकार ने साल 2010-11 के दौरान 21 सरकारी चीनी मिलों का विनिवेश किया था जिसमें कथित तौर पर राज्य सरकार को 1179 करोड़ रुपये का घाटा हुआ था.

शुक्रवार को सीबीआई ने सात लोगों के ख़िलाफ़ इन चीनी मिलों की ख़रीद फ़रोख्त के मामले में फ़र्ज़ी दस्तावेज़ों का इस्तेमाल करने का मुक़दमा दर्ज किया है.

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जिस वर्ष का यह मामला है तब उत्तर प्रदेश में बसपा की मायावती सरकार थी. शनिवार को दिन भर भारतीय मीडिया में यह ख़बर चलती रही कि सीबीआई की एफ़आइआर से बसपा प्रमुख मायावती की मुश्किलें बढ़ सकती हैं. देर शाम बसपा प्रमुख मायावती ने मीडिया में आकर केंद्र सरकार पर ग़लत हथकंडों का इस्तेमाल करने का आरोप लगाया.

मायावती ने कहा, "बीजेपी ऐसे हथकंडों का इस्तेमाल कर रही है जो आज़ादी के बाद से लेकर अभी तक किसी भी सरकार में होते नहीं देखा गया है."

बसपा प्रमुख ने कहा की केंद्र सरकार जांच एजेंसी का ग़लत इस्तेमाल कर रही है.

उन्होंने कहा, "चुनाव आचार संहिता लागू होने के बाद किसी भी सत्ताधारी पार्टी ने सीबीआइ, ईडी, आईटी आदि का इस्तेमाल किसी भी पूर्व सत्ताधारी पार्टी के ख़िलाफ़ राजनीतिक इस्तेमाल नहीं किया है. बीजेपी पहली ऐसी सत्ताधारी राजनीतिक पार्टी है जिसने उन एजेंसियों का खुल कर इस्तेमाल किया है और अभी भी कर रही है. इन एजेंसियों के बारे में मुझे मीडिया के जरिए ये मालूम हुआ है कि खास कर उत्तर प्रदेश में चीनी मिलों के विक्रय के विषय में भी सीबीआइ द्वारा जांच के मामले को भी राजनीतिक रूप दिया जा रहा है. इतने पुराने मामले में खास कर लोकसभा निर्वाचन के दौरान सीबीआइ जांच की अधिसूचना निर्गत किया जाना सीबीआइ के दुरुपयोग का स्पष्ट उदाहरण है."

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'मेरी कोई भूमिका नहीं'

मायावती ने कहा मुख्यमंत्री के रूप में चीनी मिलों के विक्रय में उनकी कोई भूमिका नहीं थी.

उन्होंने कहा, "इस संबंध में यह भी सर्वविदित है कि चीनी मिलों के विक्रय में मुख्यमंत्री के रूप में मेरी कोई भूमिका नहीं थी. मेरे खुद के स्तर से इस विषय में कोई आदेश या निर्णय पारित नहीं किया गया था बल्कि यह फ़ैसला कैबिनेट ने ही लिया था. लेकिन इसे मीडिया में बढ़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत किया जा रहा है."

मायावती ने कहा कि केंद्र सरकार ने बौखलाहट में यह कदम उठाया है.

उन्होंने कहा, "इससे ऐसा लगता है कि इस चुनाव में हमारे यहां महागठबंधन की सफलता और इसको मिल रहे अपार जनसमर्थन से बौखला कर ही केंद्र सरकार द्वारा चुनाव के दौरान ये सब कार्रवाई की गई है. इस प्रकार से सीबीआई को फिर से यहां एक बार तोते की तरह ही इस्तेमाल किया गया है. जबकि यहां चीनी मिलों की विक्रय की कार्रवाई राज्य की पूर्व की स्थापित नीति के तहत संबंधित विभाग द्वारा की गई थी."

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'जनता को जानबूझ कर भ्रमित किया जा रहा'

मायावती ने कहा कि जांच से उन्हें कोई ऐतराज नहीं है लेकिन जो कुछ भी मीडिया में आया है वो ग़लत और तथ्यों के विपरीत है.

उन्होंने कहा, "यदि इसकी इसकी प्रक्रिया में कमी है, दोष है तो उसकी जांच हो सकती है, इसमें हमें ऐतराज नहीं है. लेकिन चुनाव के दौरान यह जान बूझ कर भ्रम फैलाया जा रहा है कि इस मामले में तात्कालिक मुख्यमंत्री के रूप में मेरी कोई भूमिका थी. यह सरासर ग़लत और तथ्यों के विपरीत है. चुनाव के दौरान यह कार्रवाई करके जनता को भ्रमित किया जा रहा है, जनहित के मुद्दों से भटकाया जा रहा है."

मायावती ने कहा, "वैसे भी चीनी मिलों के विक्रय के संबंध में ऑडिट आपत्तियों में अथवा लोक आयुक्त की रिपोर्ट में भी मुख्यमंत्री के संबंध में कोई विपरीत टिप्पणी नहीं की गई है."

उन्होंने कहा, "इससे यह स्पष्ट है कि केंद्र सरकार सीबीआई के माध्यम से एक सोची समझी रणनीति और साजिश के तहत चुनाव प्रभावित करने के उद्देश्य से यह सब कर रही है. केंद्र सरकार अपने इस षड्यंत्र में सफल नहीं होगी."

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क्या है मामला?

2010-11 में चीनी निगम की 10 चालू और 11 बंद पड़ी चीनी मिलों को बेचा गया था. उस दौरान उत्तर प्रदेश में मायावती के नेतृत्व में बीएसपी सरकार का शासन था. मायावती 13 मई 2007 से 15 मार्च 2012 तक उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री थीं.

पीटीआई के मुताबिक 8 अप्रैल, 2017 को उत्तर प्रदेश सरकार ने बीएसपी सरकार के शासनकाल में 2010-11 के दौरान 21 चीनी मिलों की बिक्री में अनुमानित 1100 करोड़ रुपये के घोटाले के संदेह को लेकर जांच की घोषणा की थी. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मार्च 2017 में मुख्यमंत्री बनने के क़रीब एक महीने के भीतर ही गन्ना विकास विभाग की एक बैठक में यह फ़ैसला किया था.

राज्य सरकार ने इस मामले की जांच सीरियस फ्रॉड इंवेस्टिगेशन आर्गनाइजेशन (एसएफआइओ) से इस मामले की जांच करवाई थी.

भारत सरकार के कॉरपोरेट अफेयर्स मंत्रालय के तहत आने वाले एसएफआइओ की रिपोर्ट के मुताबिक उत्तर प्रदेश में देवरिया, बरेली, लक्ष्मीगंज, हरदोई, रामकोला, चितौनी और बाराबंकी में सात बंद चीनी मिलों के खरीदार द्वारा जाली दस्तावेज प्रस्तुत किए गए थे.

इसके मुताबिक, नम्रता मार्केटिंग प्राइवेट लिमिटेड नामक एक कंपनी ने 11 अक्तूबर 2010 को देवरिया, बरेली, लक्ष्मीगंज (कुशीनगर) और हरदोई की मिलें ख़रीदने के लिए एक्सप्रेशन ऑफ़ इंटरेस्ट कम रिक्वेस्ट फॉर क्वालिफिकेशन पेश किया था. एक अन्य गिरियाशो कंपनी प्राइवेट लिमिटेड ने भी यही प्रक्रिया अपनाई थी. आरोप है कि नियमों को दरकिनार कर समिति ने दोनों कंपनियों को आगे की प्रक्रिया के लिए योग्य घोषित कर दिया था जबकि दोनों कंपनियों की बैलेंस शीट और अन्य दस्तावेज़ों में भारी अनियमितता थी.

सीरियस फ्रॉड इंवेस्टिगेशन आर्गनाइजेशन से जांच के बाद राज्य चीनी निगम के प्रबंध निदेशक की ओर से गोमतीनगर थाने में धोखाधड़ी का एफ़आइआर दर्ज कराया गया था.

इसके बाद उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने 2018 में चीनी मिल विनिवेश की सीबीआई से जांच की सिफारिश की थी.

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सीबीआई की एफ़आइआर में क्या है?

अब लोकसभा चुनाव 2019 के दौरान सीबीआई की ऐंटी करप्शन ब्रांच ने अपने केस में 2010-11 में बंद सात चीनी मिलों को बेचने में हुई अनियमितता को लेकर एफआईआर दर्ज़ की है.

सीबीआई ने यह एफ़आइआर लखनऊ के गोमतीनगर थाने में 7 नवंबर 2017 को दर्ज़ प्राथमिकी को आधार बनाते हुए 12 अप्रैल 2018 को राज्य के मुख्य गृह सचिव के अनुरोध और केंद्र सरकार की 22 फ़रवरी को जारी अधिसूचना पर दर्ज की है.

एफ़आइआर में सात लोगों के ख़िलाफ़ कंपनी अधिनियम 1956 के प्रावधानों का उल्लंघन, ग़लत दस्तावेजों को प्रस्तुत करने और जालसाजी करने का मामला दर्ज़ किया गया है.

इन सात लोगों में दिल्ली के रोहिणी में रहने वाले राकेश शर्मा और उनकी पत्नी सुमन शर्मा, उत्तर प्रदेश के गाज़ियाबाद स्थित इंदिरापुरम के रहने वाले धर्मेंद्र गुप्ता और राज्य के सहारनपुर ज़िले के रहने वाले चार अन्य लोगों सौरभ मुकुंद, मोहम्मद जावेद, मोहम्मद नसीम अहमद, और मोहम्मद वज़ीद को अभियुक्त बनाया गया है.

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