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लोकसभा चुनाव 2019: रवि किशन के लिए कितना आसान होगा गोरखपुर जीतना
- Author, कुमार हर्ष
- पदनाम, गोरखपुर से, बीबीसी हिंदी के लिए
गोरखपुर लोकसभा सीट पर भाजपा का उम्मीदवार कौन होगा, इसे लेकर लगातार अफ़वाहों और अटकलों का दौर जारी था.
आख़िरकार बीजेपी ने उलझन, असमंजस और अनिर्णय की स्थिति से उबरते हुए अभिनेता रवि किशन शुक्ला को अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया.
दशकों तक भाजपा का अभेद्य किला समझी जाने वाली यह सीट पिछले डेढ़ साल में बीजेपी के लिए सबसे उलझाऊ सीट में तब्दील हो गई है. यहां प्रत्याशी का चयन करने में पार्टी को रणनीतिक समीकरणों के दर्जनों सवाल हल करने पड़े.
लगभग तीन दशक तक इस सीट पर प्रसिद्ध गोरक्षापीठ के महंत ही निर्वाचित होते रहे थे. 2017 में पीठ के वर्तमान महंत योगी आदित्यनाथ के उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने के बाद हुए उपचुनाव में यह सीट भाजपा के क़ब्ज़े से निकल गई थी.
तब सपा के टिकट पर लड़ रहे निषाद पार्टी के नेता प्रवीण निषाद ने भाजपा प्रत्याशी उपेंद्र दत्त शुक्ला को हराकर भाजपा के आत्मविश्वास को ऐसी चोट पहुंचाई थी, जिसका असर अब तक कायम है. इसी कारण पार्टी को अपना टिकट तय करने में लंबा वक़्त लग गया.
दरअसल, उपचुनाव की हार न केवल पार्टी के लिए बल्कि ख़ुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के लिए भी झटका देने वाली थी. उस वक़्त मुख्यमंत्री ने कहा था कि यह सीट हम अतिआत्मविश्वास के चलते हारे.
हार से क्या सबक़ लिया?
हार के कारणों पर मंथन की ढेरों कवायदों के बीच कम मतदान और सरकार से पार्टी कार्यकर्ताओं की निराशा के अलावा विपक्षी एकता के जादुई जातीय रसायन को इस हार का ज़िम्मेदार माना गया था. पार्टी ने तब फ़ौरन डैमेज कंट्रोल की कोशिशें भी शुरू कर दी थीं.
ऐसा माना जाता था कि ख़ुद योगी इस सीट को दोबारा हासिल करने के लिए बेचैन होंगे और पार्टी इसके लिए हर संभव रणनीतिक उपाय अपनाएगी. ऐसा दिखा भी.
पार्टी ने कार्यकर्ताओं के बीच लगातार कार्यक्रम तो किए ही, इस इलाक़े के सबसे रसूखदार निषाद घराने की वारिस पूर्व विधायक राजमति निषाद और उनके बेटे अमरेंद्र निषाद को सपा के खेमे से तोड़कर भाजपा में लाने जैसा मास्टरस्ट्रोक भी पेश किया.
गोरखपुर लोकसभा सीट पर साढ़े तीन लाख की संख्या वाली निषाद आबादी निर्णायक हैसियत रखती है. लिहाज़ा समझा जा रहा था कि गठबंधन के संभावित प्रत्याशी और मौजूदा सांसद प्रवीण निषाद के ख़िलाफ़ अमरेंद्र निषाद ही भाजपा के अमोघ अस्त्र होंगे.
लेकिन इस बीच अचानक एक ज़बर्दस्त अप्रत्याशित घटनाक्रम के चलते निषाद पार्टी का सपा-बसपा गठबंधन से रिश्ता टूट गया और 24 घंटे के भीतर उसने भाजपा से रिश्ता जोड़ लिया.
कुछ ही दिनों बाद इलाक़े के दूसरे बड़े निषाद नेता प्रवीण निषाद भी भाजपा के पाले में आ खड़े हुए. यहीं से टिकट की उलझन शुरू हो गई.
दो निषाद दावेदारों के अलावा क़तार में भाजपा के पुराने कार्यकर्ता और क्षेत्रीय अध्यक्ष रहे उपेंद्र दत्त शुक्ल भी थे जो उपचुनाव में भाजपा प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ चुके थे.
उनके पैरोकारों का दावा था कि बदली परिस्थितियों में उनकी जीत पक्की है. तर्क यह भी दिया जाता था कि दीगर वजहों से कथित रूप से उपेक्षित महसूस कर रहे ब्राह्मण समुदाय (जिसके तक़रीबन तीन लाख मत हैं) को साथ में बनाए रखने के लिए उपेंद्र को टिकट दिया जाना उचित होगा.
हालांकि, उनकी उम्मीदवारी पर संशय भी लगातार बरक़रार रहा. नाम छिपाने की शर्त पर भाजपा के तमाम नेता यह कहते मिल जाते हैं कि उपेंद्र दरअसल योगी के पसंदीदा प्रत्याशी नही हैं. इस पसंद-नापसंद की जड़ें इलाक़े की पुरानी राजनीति में धंसी हुई हैं. रोचक बात यह कि इस पर कोई बोलने को तैयार भी नहीं.
चुनौतियां कम नहीं
दरअसल, इस सीट पर ढेरों पेच हैं. यह योगी के प्रभुत्व का क्षेत्र है, लिहाज़ा यह तय था कि प्रत्याशी चयन में उनकी बात मानी जाएगी. अमित शाह और जगत प्रकाश नड्डा सहित पार्टी के तमाम बड़े नेताओं ने बीते कुछ हफ़्तों में बार-बार बैठकें कीं, दर्जनों फ़ीडबैक लिए.
पार्टी के नगर विधायक डॉक्टर राधा मोहन दास अग्रवाल, क्षेत्रीय अध्यक्ष धर्मेंद्र सिंह और योगी के क़रीबी विधायक महेंद्र पाल सिंह की शक्ल में रोज़ नए-नए नाम भी उछलते रहे. तभी यह साफ़ हो गया था कि पार्टी कोई बाहरी नाम ला सकती है.
रवि किशन का नाम हालांकि पिछले हफ़्ते भी चला था मगर ख़ुद रवि किशन ने तब अपनी पसंदीदा और पुरानी सीट जौनपुर (जहां से वह एक बार कांग्रेस के टिकट पर लड़ भी चुके हैं) से टिकट की इच्छा जताई थी.
अब जबकि भाजपा यहां से प्रत्याशी चयन के उलझाऊ भँवर से निकल आई है, तब भी उसकी चुनौतियां ख़त्म नहीं हुई हैं.
हालांकि, उसने प्रवीण निषाद को पड़ोस की ख़लीलाबाद संसदीय सीट (जूता कांड से चर्चित) से टिकट दे दिया है मगर अमरेंद्र निषाद को कुछ नहीं मिला है.
शनिवार को अपने समर्थक ग्राम प्रधानों की बैठक में उन्होंने कहा था कि योगी जी ने उन्हें टिकट का आश्वासन दिया है. रोष में भरे समर्थकों का दबाव था कि यदि ये वादा पूरा न हो तो नए सिरे से रणनीति तय की जाए. देखना होगा कि उनकी कैसी प्रतिक्रिया आती है.
रवि किशन को स्वीकार करेगा काडर?
भाजपा को अपने उस काडर को भी समझाना होगा जो एक महीने से इस बात पर दबा छिपा रोष व्यक्त कर रहा है कि पार्टी अपने कार्यकर्ता की जगह कभी किसी निषाद नेता तो कभी अभिनेता के फेर में क्यों घूम रही है.
हालांकि, पार्टी के आला ओहदेदारों को यक़ीन है कि दो-तीन दिन के भीतर सब कुछ 'सेटल' हो जाएगा.
संगठन से जुड़े एक वरिष्ठ पदाधिकारी कहते हैं, " गोरखपुर में ज़बर्दस्त विकास हुआ है और इसका फ़ायदा मिलना तय है. रवि किशन को परंपरागत भाजपा समर्थकों और ब्राह्मण वोटों के अलावा विरोधी गठबंधन के तमाम नौजवानों के वोट भी मिलेंगे, जो उनके प्रशंसक हैं. रवि किशन के आने से मतदान प्रतिशत में भी बढ़ोतरी होना तय है."
काग़ज़ों पर यह योजना ठीक लगती है पर चुनाव और खेल हमेशा काग़ज़ों के मुताबिक़ चलें, यह भी ज़रूरी नहीं. अलबत्ता यह ज़रूर है कि रवि किशन की मौजूदगी इस सीट पर दिलचस्पी ज़रूर बढ़ा देगी.
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