बाल ठाकरे को लेकर पीएम मोदी का कांग्रेस पर आरोप फ़र्ज़ी निकला

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- Author, प्रशांत चाहल
- पदनाम, फ़ैक्ट चेक टीम
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसी सप्ताह महाराष्ट्र के लातूर में हुई एक चुनावी जनसभा में शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे और कांग्रेस पार्टी के बारे में एक बयान दिया जो पूरी तरह सही नहीं है.
जनसभा में पीएम मोदी ने कहा, "मैं ज़रा कांग्रेस वालों को कहता हूँ कि दर्पण में जाकर के अपना मुँह देखो. आपके मुँह से मानव अधिकार की बातें शोभा नहीं देती हैं. आप कांग्रेस वालों को हिन्दुस्तान के एक-एक बच्चे को जवाब देना पड़ेगा. हिन्दुस्तान के एक-एक बच्चे को न्याय देना पड़ेगा. आप कांग्रेस वालों ने 'बाला साहेब' ठाकरे की नागरिकता को छीन लिया था. उनके मतदान करने का अधिकार छीन लिया था."

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लातूर की जनसभा में जिस समय नरेंद्र मोदी ने यह बात कही, उस समय बाल ठाकरे के पुत्र और शिवसेना के प्रमुख उद्धव ठाकरे मंच पर ही मौजूद थे.
बीजेपी और शिवसेना, दोनों दलों के बीच 18 फ़रवरी को सीटों पर आपसी सहमति बनने की औपचारिक घोषणा की गई थी.
2019 के लोकसभा चुनाव में महाराष्ट्र की 48 सीटों में 25 सीटों पर बीजेपी और 23 सीटों पर शिवसेना चुनाव लड़ रही है.

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लेकिन शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे के बारे में मंगलवार को पीएम मोदी ने जो कहा उसमें एक तथ्यात्मक ग़लती है.
बाल ठाकरे के चुनाव लड़ने और वोट देने पर प्रतिबंध कांग्रेस पार्टी या कांग्रेस की सरकार ने नहीं लगाया था.
बल्कि देश के राष्ट्रपति के रेफ़र करने पर चुनाव आयोग ने बाल ठाकरे के लिए यह सज़ा तय की थी.
बाल ठाकरे से साल 1995 से लेकर 2001 तक के लिए वोटिंग का अधिकार छीन लिया गया था.
क़ानून के जानकार इस सज़ा को 'किसी की नागरिकता छीन लेना' भी कहते हैं.

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जाने पूरी कहानी
ये मामला क़रीब 31 साल पुराना है.
मुंबई में पड़ने वाली महाराष्ट्र की विधानसभा सीट 'विले पार्ले' पर उप-चुनाव हो रहे थे.
एक तरफ़ कांग्रेस के नेता प्रभाकर काशीनाथ कुंटे थे, तो दूसरी तरफ़ निर्दलीय उम्मीदवार डॉक्टर रमेश यशवंत प्रभु चुनावी मैदान में थे जिन्हें बाल ठाकरे की पार्टी शिव सेना का समर्थन प्राप्त था.
बाल ठाकरे ख़ुद डॉक्टर रमेश प्रभु के लिए वोट मांगने चुनावी सभाओं में जा रहे थे. 13 दिसंबर 1987 के दिन मतदान होना था.
14 दिसंबर 1987 को इस उप-चुनाव का नतीजा आया और कांग्रेसी नेता प्रभाकर कुंटे डॉक्टर रमेश प्रभु से हार गये. इस उप-चुनाव से पहले विले पार्टे विधानसभा सीट कांग्रेस के ही पास थी.

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जब दोषी ठहराए गये ठाकरे
उप-चुनाव में हारने के बाद कांग्रेस के नेता प्रभाकर काशीनाथ कुंटे सबूतों के साथ कोर्ट पहुँच गए और उन्होंने आरोप लगाया कि भड़काऊ भाषण देकर डॉक्टर रमेश यह चुनाव जीते हैं.
7 अप्रैल 1989 को बॉम्बे हाई कोर्ट ने डॉक्टर रमेश प्रभु और बाल ठाकरे को 'रीप्रज़ेंटेशन ऑफ़ द पीपल एक्ट, 1951' में परिभाषित चुनाव की 'करप्ट प्रैक्टिस' का दोषी पाया. साथ ही विले पार्ले सीट के उप-चुनाव के नतीजे को रद्द कर दिया.
बॉम्बे हाई कोर्ट के इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ डॉक्टर रमेश यशवंत प्रभु ने सुप्रीम कोर्ट में सिविल अपील दायर की थी.
लेकिन 11 दिसंबर 1995 को सुप्रीम कोर्ट ने यह अपील ख़ारिज कर दी थी और बॉम्बे हाई कोर्ट के फ़ैसले को सुरक्षित रखा था.
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जगदीश सरन वर्मा ने फ़ैसला में लिखा था, "विले पार्ले विधानसभा क्षेत्र में 29 नवंबर, 9 दिसंबर और 10 दिसंबर 1987 को डॉक्टर रमेश प्रभु और बाल ठाकरे द्वारा दिए गए भाषणों को इस मामले में जाँच का आधार बनाया गया. इन सभाओं में बाल ठाकरे ने कहा था कि 'हम हिंदुओं की रक्षा के लिए चुनाव लड़ रहे हैं. हमें मुस्लिम वोटों की चिंता नहीं है. ये देश हिंदुओं का था और उन्हीं का रहेगा'. इन भाषणों के आधार पर दोनों को चुनाव की करप्ट प्रैक्टिस का दोषी पाया जाता है."
सुप्रीम कोर्ट का यह फ़ैसला कोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध है.

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राष्ट्रपति ने चुनाव आयोग से सलाह ली
क़ानून के जानकार और हैदराबाद लॉ यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर फ़ैज़ान मुस्तफ़ा ने हमें बताया कि ऐसे मामले में पेनल्टी क्या हो इसके लिए मामला देश के राष्ट्रपति के पास रेफ़र किया जाता है क्योंकि वोटिंग लिस्ट में बदलाव उन्हीं के अंतिम आदेश से हो सकता है.
उन्होंने बताया, "इसे केस में राष्ट्रपति के आर नारायणन ने सज़ा तय करने के लिए मामला चुनाव आयोग के पास रेफ़र किया था और चुनाव आयोग ने ही डॉक्टर रमेश प्रभु के साथ-साथ बाल ठाकरे के मामले में फ़ैसला लिया था."
चुनाव की 'करप्ट प्रैक्टिस' के दोषी पाये जाने पर कितनी सज़ा हो सकती है, यह जानने के लिए हमने भारत के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टी एस कृष्णमूर्ति से बात की.
उन्होंने बताया कि 6 साल के वोटिंग का अधिकार छीन लिया जाना ऐसे मामलों में अधिकतम सज़ा है.
फ़ैसले के समय बीजेपी सरकार
बाल ठाकरे के मामले में चुनाव आयोग ने 22 सितंबर 1998 को अपने सुझाव राष्ट्रपति दफ़्तर को लिखित में भेज दिए थे.
इस आदेश में चुनाव आयोग के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त डॉक्टर मनोहर सिंह गिल ने लिखा था कि न्यायपालिका द्वारा दोषी पाये जाने के कारण बाल ठाकरे से 6 साल (11-12-1995 से 10-12-2001) के लिए वोटिंग का अधिकार ले लिया जाए.

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राष्ट्रपति के आर नारायणन ने चुनाव आयोग के सुझाव के आधार पर जुलाई 1999 में बाल ठाकरे पर प्रतिबंध लागू कर दिया था.
जिस समय यह सब हुआ, उस समय देश में बीजेपी की सरकार थी और भारत के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी थे.

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'कांग्रेस को कभी दोष नहीं'
शिवसेना के राजनैतिक सफ़र पर क़िताब लिखने वाले वरिष्ठ पत्रकार प्रकाश आकोलकर ने बीबीसी को बताया कि बाला साहेब ठाकरे ने इस फ़ैसले की निंदा ज़रूर की थी लेकिन उन्होंने कभी भी कांग्रेस पार्टी पर इसका आरोप नहीं लगाया.
आकोलकर ने कहा कि इस फ़ैसले के चलते 1999 के लोकसभा और महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में वो वोट नहीं डाल पाये थे. साल 2004 मे बैन हटने के बाद पहली बार बाल ठाकरे ने वोट डाला था.

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