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IMF ने क्यों घटाया भारत की आर्थिक वृद्धि का अनुमान
- Author, मोनिका मिलर
- पदनाम, एशिया बिज़नेस संवाददाता
भारत में चुनाव के माहौल के बीच एक ऐसी ख़बर आई है जिसे शायद ही कोई राजनेता चुनाव से ठीक पहले सुनना चाहे.
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी आईएमएफ़ ने पिछले साल के मुक़ाबले इस साल भारत की आर्थिक वृद्धि के अनुमान को घटा दिया है.
आईएमएफ़ की सालाना रिपोर्ट के मुताबिक़, भारत की अर्थव्यवस्था मौजूदा वित्त वर्ष में 7.3 प्रतिशत और 2020-2021 के लिए 7.5 प्रतिशत की दर से तरक्की करेगी.
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की इस रिपोर्ट का बाज़ारों पर भी असर देखने को मिला और एशियाई बाज़ारों में गिरावट देखने को मिली.
आईएमएफ़ के सदस्यों के अनुसार यह उम्मीद है कि भारत एशियन डिवेलपमेंट बैंक और रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया के अनुमानों की तुलना में तेज़ी से प्रगति करेगा.
लेकिन रिपोर्ट में चेताया गया है कि भारत को "संरचनागत और वित्तीय क्षेत्र में सुधारों को लागू करना होगा और अर्थव्यवस्था की रफ़्तार में बढ़ोतरी की संभावनाएं बरक़रार रखने के लिए सार्वजनिक ऋण घटाना होगा."
क्या है कारण
पिछले साल भारत की आर्थिक वृद्धि की रफ़्तार को उस समय झटका लगा था जब दिसंबर में ख़त्म हुई तिमाही में यह सिर्फ़ 6.6 प्रतिशत बढ़ी. पिछली पांच तिमाहियों में यह सबसे मंद रफ़्तार थी.
इंडिया रेटिंग्स में चीफ़ इकॉनमिस्ट देवेंद्र कुमार पंत भारत की अर्थव्यवस्था की रफ़्तार में आई कमी के लिए वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों के अनूकूल न होने और आम चुनावों के साथ बनी अनिश्चितता को प्रमुख कारण मानते हैं.
वह कहते हैं, "अल-नीन्यो के बढ़ते प्रभाव, कृषि संबंधित आपदाओं और लघु एवं मध्यम उद्योगों की कठिनाइयों के कारण खपत में कमी आई है. यह बात तब साफ़ हो जाती है जब आप वाहनों की बिक्री घटने, घरेलू उड़ानों के यात्री कम होने, रेलवे से माल ढुलाई में कमी आने और मुख्य बंदरगाहों में कार्गो की संख्या घटने पर नज़र डालते हैं."
आईएमएफ़ का वैश्विक तरक्की का अनुमान भी बहुत अच्छा नहीं है. वैश्विक आर्थिक संगठन ने इसे 3.3 प्रतिशत कर दिया है. 2008 की आर्थिक मंदी के बाद यह पहली बार हुआ है जब यह इस दर पर पहुंचा है.
अनुमान लगाया गया है कि अमरीका और चीन के बीच व्यापार को लेकर पैदा हुआ तनाव, ब्रेग्ज़िट के लकर पैदा हुई अनिश्चितता और यूरोप में उपभोक्ताओं का घटता विश्वास इसके लिए ज़िम्मेदार है.
भारत पर क्या असर
क्या ये अनुमान बताते हैं कि भारत की तेज़ी से बढ़ रही जीडीपी अब मंद पड़ती जा रही है?
सिंगापुर के मिज़ुहो बैंक में सीनियर इकॉनमिस्ट विष्णु वराथन कहते है कि भारत को दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के तौर पर जो पहचान मिली है, उसे खोने का ख़तरा नहीं है.
वह कहते हैं, "यह अनुमान कुछ देखने में बाहरी रूप से ऐसा है मगर इसमें आर्थिक प्रगति का व्यापक हिस्सा नज़रअंदाज़ हो जाता है."
वराथन आईएमएफ़ से सहमत हैं और कहते हैं कि भारत के लिए असली ख़तरा तब होगा जब वो आपूर्ति के क्षेत्र कड़े सुधार करने में नाकाम रहता है. इससे वह अपनी तरक्की की रफ़्तार बढ़ाने की संभावनाओं को खो देगा.
वह कहते हैं, "अर्थव्यवस्था को सार्थक ढंग से आगे ले जाने और व्यापक स्तर पर ग़रीबी का उन्मूलन करते हुए मध्यम आय वर्ग का विस्तार करने की राह में यही मुख्य बाधा हो सकती है."
भविष्य में क्या होगा
भारतीय रिज़र्व बैंक ने कुछ कड़े क़दम उठाए हैं. जैसे कि इस साल दो बार अपने बेंचमार्क इंटरेस्ट रेट घटाए ताकि उद्योगों और कारोबारों आदि के लिए ऋण लेना आसान हो जाए.
आम चुनाव में मुक़ाबला कर रहे प्रतिद्वंद्वियों ने भारत की आर्थिक वृद्धि की रफ़्तार को तेज़ बनाए रखने के लिए महत्वाकांक्षी योजनाएं ज़ाहिर की हैं.
मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने वादा किया है कि नौकरियां पैदा करना उसकी पहली प्राथमिकता होगी.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पार्टी बीजेपी ने भारत की अर्थव्यवस्था को 8 प्रतिशत की दर से बढ़ाने का वादा किया है ताकि भारत 2030 तक दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की राह पर बढ़ता रहे.
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