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लोकसभा चुनाव 2019: क्या अपने वादे पूरे कर पाई मोदी सरकार
भारत में राजनीतिक पार्टियां अपने चुनावी कैंपेन में ज़ोर-शोर से जुटी हुई हैं. 11 अप्रैल को देश में पहले चरण के मतदान होने हैं. इस चुनाव में 90 करोड़ मतदाता हिस्सा लेंगे.
साल 2014 में बहुमत की सरकार बनाने वाले प्रधानमंत्री मोदी 'फिर एकबार मोदी सरकार' और 'ट्रांसफ़ॉर्म इंडिया' के नारे के साथ मैदान में हैं. वहीं मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस कहती है कि सरकार अपने मुख्य वादों को ही पूरा नहीं कर सकी तो वह आगे ये वादे क्या पूरे करेगी.
बीबीसी रिएलिटी चेक की टीम ने ऐसे ही कई मुद्दों की पड़ताल उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर की है.
सीमा पर देश की सुरक्षा का वादा
फ़रवरी महीने में भारत में सुरक्षा एक बड़ा मुद्दा बन कर सामने आया. 14 फ़रवरी को कश्मीर में सीआरपीएफ़ के क़ाफ़िले पर आत्मघाती हमला किया गया जिसमें 40 से ज़्यादा जवान मारे गए.
इसके जवाब में भारत ने पाकिस्तानी सीमा में दाख़िल होकर एयर स्क्राइक की और चरमपंथी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के ठिकानों को तबाह करने का दावा किया.
लेकिन कांग्रेस मोदी सरकार पर हमला बोलते हुए कहती रही है कि साल 2014 के बाद से कश्मीर में हालात बद से बदतर हुए हैं.
भारत प्रशासित कश्मीर में चरमपंथ से जुड़ी घटनाएं
इन आंकड़ों के मुताबिक़ पिछले साल के अंत तक चरमपंथी गतिविधियां मौजूदा सरकार में भी पिछली सरकार जितनी ही हुई हैं.
लेकिन एक दूसरा सच ये भी है कि साल 2016 से भारत प्रशासित कश्मीर में घुसपैठ के मामले बढ़े हैं.
क्या भारत उत्पादन में सुपरपावर बना?
मोदी सरकार उत्पादन क्षेत्र को आर्थिक वृद्धि का सबसे बड़ा स्त्रोत मानती है. सरकार ने वादा किया कि 'मेक इन इंडिया' की मदद से साल 2025 तक अर्थव्यवस्था में मैन्युफ़ैक्चरिंग का योगदान बढ़कर 25 प्रतिशत हो जाएगा.
सरकार के आंकड़ों के मुताबिक़ मैन्युफ़ैक्चरिंग सेक्टर का जीडीपी में योगदान अब तक 15 फ़ीसदी के लगभग ही है.
क्या अब महिलाएं सुरक्षित हैं?
विपक्षी कांग्रेस पार्टी का कहना है कि महिला की सुरक्षा ने वाले चुनाव में बड़ा मुद्दा होगी.
वहीं, बीजेपी का कहना है कि महिलाओं के ख़िलाफ़ हो रही हिंसा ने निपटने के लिए कड़े क़ानून लाए गए हैं.
आंकड़ों के मुताबिक़ साल 2012 में दिल्ली में हुए निर्भया गैंगरेप मामले के बाद रेप की मामले दर्ज होने की घटना में इज़ाफ़ा हुआ है. लेकिन अदालतों में जाने वाले मामलों में सज़ा की दर में पिछले कुछ सालों से कोई सुधार नहीं आया है.
किसानों से किया वादा कितना निभाया गया
भारत की कुल आबादी का बड़ा हिस्सा आजीवीका के लिए खेती पर निर्भर है. ऐसे में ग्रामीण इलाक़ों के लोग ख़ासकर किसान चुनावों के दौरान हमेशा ही बड़ा मुद्दा होते हैं.
विपक्ष हमेशा ही मोदी सरकार के कार्यकाल में किसानों की दुर्दशा का ज़िक्र करता है, साथ ही केंद्र सरकार पर आरोप लगता है कि ये 'ग़रीब विरोधी सरकार है.'
तीन साल पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वादा किया था कि साल 2022 तक किसानों की आय दोगुनी कर दी जाएगी.
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़ 2016 तक किसानों की आय में काफ़ी इज़ाफ़ा हुआ है. 2016 के बाद किसानों की आय कितनी बढ़ी है इसके सरकारी आंकड़े मौजूद नहीं है. हालांकि केन्द्र सरकार ने किसानों के हित में कई क़दम उठाए हैं.
कांग्रेस की क़र्ज़ माफ़ी योजना को आड़े हाथों लेते हुए मोदी हमेशा ये कहते रहे हैं कि क़र्ज़माफ़ी किसानों की परेशानियों का हल नहीं है.
अपनी पड़ताल में बीबीसी रियलिटी चेक टीम ने भी पाया कि किसानों के लिए की गई क़र्ज़माफ़ी का लाभ हक़ीक़त में किसानों को पूरी तरह मिल नहीं पाता है.
उज्जवला योजना कितनी कामयाब
स्वच्छ भारत अभियान के तहत प्रधानमंत्री मोदी ने कई वादे किए थे. धुआं रहित ईंधन के लिए मोदी सरकार ने उज्जवला योजना शुरू की. साल 2016 में उज्जवला योजना लॉन्च की गई और अब तक करोड़ों लोगों को गैस कनेक्शन देने का सरकार दावा करती है.
सरकार की इस योजना के चलते रसोई गैस (एलपीजी) बड़ी संख्या में आम लोगों के घरों तक पहुंची. लेकिन सिलेंडर को रीफ़िल करने की लागत को देखते हुए लोगों ने इसका इस्तेमाल जारी नहीं रखा और परंपरागत ईंधन की ओर वापस लौट गए क्योंकि वे उन्हें अमूमन मुफ़्त में मिल जाते हैं.
कितने शौचालय बने
स्वच्छ भारत मिशन के तहत केन्द्र सरकार ने एक करोड़ शौचालय बनाने की घोषणा की थी. प्रधानमंत्री मोदी का दावा है कि अब भारत के 90 फ़ीसदी घरों में शौचालय है, जिनमें से तक़रीबन 40 फ़ीसदी 2014 में नई सरकार के आने के बाद बने हैं.
ये बात सही है कि मोदी सरकार के समय घरों में शौचालय बनाने के काम ने रफ़्तार पकड़ी है, लेकिन ये बात भी सही है कि अलग-अलग कारणों से नए बने शौचालयों का इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है.
कितनी साफ़ हुई गंगा?
जब नरेंद्र मोदी साल 2014 में प्रधानमंत्री बने तब उन्होंने देश के नागरिकों से एक वायदा किया था. उन्होंने कहा था कि वो प्रदूषित गंगा नदी को साफ़ करने का काम करेंगे.
साल 2015 में सत्तारूढ़ भाजपा सरकार ने इसके लिए पांच साल के कार्यक्रम की शुरुआत की और 300 करोड़ रुपये भी बजट के लिए रखे.
विपक्ष का ये दावा है कि सरकार इस मामले में अपना वादा पूरा नहीं कर पा रही है.
सच भी यही है कि गंगा की सफ़ाई का काम बेहद धीमी गति से चल रहा है.
हालांकि इस समस्या पर पहले से काफ़ी अधिक धन ख़र्च किया जा रहा है, लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं लगता 1,568 मील लंबी इस नदी को साल 2020 तक पूरी तरह साफ़ किया जा सकेगा.
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