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चुनाव 2019: क्या किसानों की आय 2022 तक दोगुनी हो जाएगी?
- Author, सरोज सिंह
- पदनाम, रियलिटी चेक टीम
दावा: साल 2016 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का वादा किया था.
हकीकत: सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2016 तक किसानों की आय में काफी इज़ाफा हुआ है. 2016 के बाद किसानों के आय कितनी बढ़ी है इसके सरकारी आंकड़े मौजूद नहीं है. हालांकि केन्द्र सरकार ने किसानों के हित में कई कदम उठाए है. पर कृषि क्षेत्र के जानकार मानते हैं कि इन कदमों से 2022 तक किसानों की आय दोगुनी नहीं हो सकती.
मोदी सरकार के पिछले साढ़े चार साल के कार्यकाल में अपनी मांगों को लेकर गुस्साए किसानों ने सड़क से संसद तक कई बार मार्च किया. उनकी मांगों में आमदनी सबसे अहम मुद्दा रहा. उन्होंने सरकार से बेहतर आय की मांग रखी.
दिसंबर 2018 में तीन राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में बीजेपी की हार को कई मीडिया रिपोर्ट्स में किसानों से जोड़ कर देखा. इन मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया की ग्रामीण क्षेत्र में बीजेपी इसी वजह से अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाई.
किसानों के दर्द को दूर करने के लिए उत्तर प्रदेश के बरेली में 'किसान स्वाभिमान रैली' को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने 28 फरवरी 2016 को कहा था, "2022 में जब देश आज़ादी की 75वीं सालगिरह मना रहा होगा, उस वक़्त तक किसान की आय हम दोगुनी कर देंगें. यही मेरा सपना है."
देश में आज भी कृषि क्षेत्र 40 फ़ीसदी लोग को रोजगार देता है.
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क्या किसानों की आय बढ़ रही है?
साल 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने के सरकार के दावे के बीच ये जानना ज़रूरी है कि आख़िर देश में किसानों की आय साल 2016 में कितनी थी.
साल 2016 से पहले देश में किसानों की आय पर केवल एक ही सरकारी आंकड़ा था, जो NSSO (नेशनल सैम्पल सर्वे ऑफिस) के पास मौजूद था. इस रिपोर्ट में कहा गया कि साल 2012-13 में हर कृषि परिवार की औसत मासिक आय 6426 रुपये है.
साल 2016 में प्रकाशित नाबार्ड की रिपोर्ट में कहा गया है कि तीन साल में किसानों की आय में 40 फीसदी बढ़ोतरी हुई है. इस रिपोर्ट में किसानों की आय प्रति माह 8931 रुपये होने का दावा किया गया.
गौरतलब है कि मौजूदा बीजेपी सरकार 2014 में सत्ता में आई थी.
हालांकि 2016 के बाद किसानों की आय में कितनी बढ़ोतरी हुई है, इसका कोई सरकारी आंकड़ा मौजूद नहीं है.
नीति आयोग की मार्च 2017 की रिपोर्ट के मुतबिक सरकार को अगर किसानों की आय साल 2022 तक दोगुनी करनी है तो कृषि क्षेत्र का विकास 10.4 फ़ीसदी की दर से करना होगा.
जाने माने कृषि अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी के मुताबिक, "10.4 फीसदी की कृषि विकास दर दो साल पहले चाहिए थी. सरकार के वादे के बाद दो साल का वक़्त बीत चुका है. आज की तारीख में 13 फीसदी की कृषि विकास दर चाहिए. जो 2030 से पहले तो होता नहीं दिख रहा."
जानकारों की माने तो कृषि क्षेत्र का विकास दर पिछले तीन साल में यूपीए- 1 से कम रही है.
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भारतीय किसानों की समस्या
भारतीय किसान दशकों से सूखा, बिन मौसम बरसात, आधुनिक तकनीक की कमी, फसल रखाव की कमी, सिंचाई की समस्या से जूझ रहा है.
हालांकि मौजूदा सरकार ने किसानों के लिए कई कदम उठाए हैं, जैसे-
- फसल बीमा योजना
- सोयल हेल्थ कार्ड
- फसलों के लिए ऑनलाइन ट्रेडिंग
लेकिन सरकार के कुछ फैसलों से किसान को नुकसान भी पहुंचा. नोटबंदी का किसानों पर बुरा असर पड़ा, इसको लेकर सरकार की आलोचना भी हुई.
किसान के लिए किए गए अच्छे और बुरे फैसलों के बीच, एक सच ये भी है कि मध्यप्रदेश में कई फसलों का उत्पादन राज्य में बीजेपी के आने के बाद बढ़ा है.
बरेली की ही रैली में प्रधानमंत्री मोदी ने कृषि क्षेत्र में मध्य प्रदेश राज्य की तारीफ करते हुए कहा, "कुछ साल पहले तक कृषि के क्षेत्र में मध्यप्रदेश का नाम कोई नहीं लेता था. लेकिन जबसे वहां भारतीय जनता पार्टी की सरकार आई है, पिछले तीन साल से कृषि में सभी राज्यों में नंबर एक बना हुआ है. तीन साल से कृषि कर्मण अवार्ड भी जीत रहा है."
मध्य प्रदेश में कृषि विकास दर निश्चित तौर पर पिछले दस साल (2005 से 2015) में 3.6 फीसदी से बढ़कर 13.9 फीसदी हो गई है. इसका सीधा मतलब ये है कि उत्पादन बढ़ा है. लेकिन ये भी उतना ही सच है कि 2013 से 2016 में मध्यप्रदेश में किसानों की खुदकुशी का मामला भी तेजी से बढ़ा है.
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किसान ज़्यादा क्यों नहीं कमा पा रहे हैं?
हजारों की संख्या में किसान हर साल आत्महत्या करते हैं, जिसके पीछे कई तरह क कारण होते हैं.
संसद में साल 2018 के मार्च महीने में दिए गए जवाब में सरकार ने ये भी माना है कि किसानों की आत्महत्या के ज्यादतर मामले कर्ज की वजह से हैं. इससे ये साफ है कि मध्यप्रदेश में उत्पादन बढ़ने का मतलब ये नहीं कि किसानों की आय भी बढ़ी है.
फसलों की कम लागत मिलने की वजह से भी किसान अकसर अपना कर्ज नहीं चुका पाते.
किसी भी सीज़न में अच्छी फसल होने की वजह से भी कभी कभी फसल के दाम गिर जाते हैं.
किसानों को फसल की सही कीमत मिले, इसलिए सरकार ने 24 फसलों की न्यूनतम समर्थन मूल्य तय किया है जिनमें गेंहू और सोयाबीन शामिल है.
सरकारी आंकड़ो के मुताबिक जिन फसलों का समर्थन मूल्य तय किया गया, उनकी कीमत में साल दर साल इजाफा भी हो रहा है.
हालांकि 2016 में एक आधिकारिक रिपोर्ट में न्यूनतम समर्थन मूल्य पर सवाल भी उठाए गए. कहा गया कि न तो किसानों को इसके बारे में ज्यादा मालूम है और न ही सही तरीके से इसे लागू किया गया है. और प्याज जैसी फसलों पर ये लागू भी नहीं होता.
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ये मुद्दा उस वक्त और सुर्खियों में आया जब महाराष्ट्र के नासिक में रहने वाले किसान संजय साठे ने विरोध में प्रधानमंत्री मोदी को अपने प्याज की कमाई का चेक वापस भेज दिया था.
जानकार मानते हैं कि न्यूनतम समर्थन मूल्य के बजाए मोदी सरकार को ऐसी योजना बनानी चाहिए जिससे सीधे तौर पर किसानों की आय दोगुनी हो जाए. कुछ- कुछ राहुल गांधी के तर्ज पर.
2019 के चुनाव के मद्देनजर, कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष राहुल गांधी ने गरीबों के लिए न्यूनतम आधारभूत आय की घोषणा की है. उन्होंने कहा, "कोई भूखा नहीं रहेगा, कोई गरीब नहीं रहेगा"
इसी क्रम में केन्द्र सरकार ने दो हेक्टेयर तक वाले किसानों के खाते में सालाना छह हज़ार रुपये देने का वादा इस बजट में किया है. सरकार ने इसे किसान सम्मान निधि का नाम दिया गया है. देखना होगा कि इस योजना से देश में किसानों की आय दोगुनी हो पाएगी या नहीं.
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