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पेट्रोल, डीज़ल की कीमतें ज़िम्बाब्वे में इतनी क्यों बढ़ाई गईं: रियलिटी चेक
- Author, क्रिस्टोफ़र जाइल्स
- पदनाम, बीबीसी रियलिटी चेक टीम
दावाः काले बाज़ार में मुद्रा विनिमय और पेट्रोलियम के अवैध व्यापार की वजह से ज़िम्बाब्वे में ईंधन संकट अपने चरम पर है.
तथ्य: बीबीसी की जाँच में पता चला कि यह सही है, लेकिन पूरी कहानी नहीं. जिन परिस्थितियों के कारण यह हुआ उसके जड़ में अमरीकी डॉलर को नियंत्रित करने के लिए सरकार की लाई विवादित स्थानीय करेंसी है.
ज़िम्बाब्वे में सरकार ने ईंधन की कीमतें दोगुनी कर दी है. इससे यहां पेट्रोल और डीज़ल की क़ीमतें दुनिया भर में सबसे महंगी हो गई हैं.
ईंधन की क़ीमतें बढ़ने के बाद ज़िम्बाब्वे के बड़े शहरों में व्यापक प्रदर्शन हो रहे हैं.
सरकार ने ऐसा क्यों किया?
सरकार का कहना है कि ईंधन की कमी को दूर करने और इसके अवैध कारोबार पर रोक लगाने के लिए इसकी क़ीमतें बढ़ाई गई हैं.
यहां पेट्रोल की क़ीमतें 88.36 रुपये (1.24 डॉलर) प्रति लीटर से बढ़कर 235.85 रुपये (3.31 डॉलर) हो गई हैं जबकि डीज़ल प्रति लीटर 96.91 रुपये (1.36 डॉलर) से बढ़कर 221.60 रुपये (3.11 डॉलर) हो गई हैं.
राष्ट्रपति एमर्सन मनंगाग्वा ने ईंधन की क़ीमतों में वृद्धि की घोषणा करने के फौरन बाद यूरोपीय दौरे पर चले गए हैं, और उन्हें दावोस में आयोजित वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की बैठक में भाग लेना है. इस सम्मेलन का आयोजन 21 से 25 जनवरी को किया जा रहा है.
ज़िम्बाब्वे में ईंधन की क़ीमत सरकार तय करती है और पेट्रोल स्टेशनों को इसी क़ीमत पर ईंधन बेचना होता है.
ईंधन की कमी आख़िर क्यों हुई?
ज़िम्बाब्वे को अपनी सभी पेट्रोलियम उत्पादों का आयात करना पड़ता है. इसके लिए इसे हार्ड करेंसी (दुर्लभ मुद्रा) की ज़रूरत होती है.
हार्ड करेंसी उस मुद्रा को कहते हैं जिसे पूरी दुनिया में किसी भी मुद्रा के साथ एक्सचेंज किया जा सके. जैसे डॉलर, यूरो, पाउंड, येन, युआन. जिम्बाब्वे में मौजूदा आर्थिक समस्याओं के बीच हार्ड करेंसी की आपूर्ति बहुत कम है.
नवंबर में वित्त मंत्री एम नेक्यूब ने बताया कि दुर्लभ विदेशी मुद्रा को अन्य ज़रूरी क्षेत्रों में आवंटित किए गए हैं, साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि देश के खनन उद्योग में निवेश की जरूरत है.
उन्होंने देश में ईंधन की किल्लत को स्वीकारते हुए इसके अधिक आयात के वित्तीय तरीकों को निकालने का वादा किया. पिछले साल की तुलना में इस साल ईंधन की मांग में इजाफ़े का भी इस कमी में योगदान है.
हालांकि अर्थव्यवस्था की सुस्त रफ़्तार को देखते हुए किया गया यह इजाफ़ा चौंकाने वाला है. इसके पीछे एक तर्क यह भी है कि अभी जिम्बाब्वे में वहां की सबसे महत्वपूर्ण फसल तंबाकू की कटाई का मौसम है.
इसका मतलब है कि इसकी ढुलाई के लिए ट्रैक्टर और मशीनरी के लिए ईंधन की बहुत ज़्यादा मांग है. लेकिन लंबे वक्त तक ईंधन की मांग में बढ़ोतरी का यह कारण नहीं है.
ईंधन की जमाखोरी और तस्करी
सरकार ने लोगों पर ईंधन की जमाखोरी करने और फिर उसे काला बाज़ार में बढ़े दामों पर बेचने का आरोप लगाया है.
और चूंकि ज़िम्बाब्वे में पड़ोसी मुल्कों की तुलना में ईंधन सस्ता रहा है, लिहाजा इसकी तस्करी यहां एक बड़ी समस्या रही है.
इन गतिविधियों की वजह से भी यहां ईंधन की मांग में इजाफ़ा हुआ है और इसकी कमी के पीछे यह एक बड़ा कारण है.
ज़िम्बाब्वे में विवादित मुद्रा व्यवस्था ने भी इस समस्या में अपना बढ़ चढ़ कर योगदान दिया है.
यहां एक स्थानीय मुद्रा चलती है, आधिकारिक तौर पर जिसे अमरीकी डॉलर के बराबर आंका जाता है. लेकिन, वास्तव में काले बाज़ार में इसके बहुत कम कीमत पर कारोबार किया जा रहा है.
इसका मतलब है कि यदि आपके पास हार्ड करेंसी (जैसे कि डॉलर) है तो आप काला बाज़ार में स्थानीय मुद्रा ख़रीद सकते हैं और इसका 1:1 की कीमत पर यहां ईंधन ख़रीदने के लिए उपयोग कर सकते हैं.
इस तरह से डॉलर को स्थानीय मुद्रा में तब्दील करने के बाद ईंधन ख़रीदना यहां काफ़ी सस्ता हो गया.
इसका अर्थ यह भी है कि देश में मुनाफ़ाखोरी या ज़िम्बाब्वे के पड़ोसियों जैसे दक्षिण अफ़्रीका में ईंधन की तस्करी की गुंजाइश है.
मुद्रा को लेकर इतना भ्रम क्यों?
तो यदि यह ऐसी समस्या पैदा कर रहा है तो, एक्चेंज रेट तय क्यों किया गया?
इसके पीछे कारण 2008 का है जब वहां महंगाई अपने चरम पर थी और अर्थव्यवस्था में उथल पुथल मची थी.
ज़िम्बाब्वे का डॉलर बेकार हो गया था और लोगों को विदेशी मुद्रा अमरीकी डॉलर और दक्षिण अफ़्रीकी रैंड में बिजनेस करने के लिए मजबूर किया गया.
इसके अगले साल, अर्थव्यवस्था को स्थिर करने के प्रयास में, सरकार ने अमरीकी मुद्रा को लीगल टेंडर (आधिकारिक करेंसी) घोषित कर दिया, यानी मूल्यहीन हो चुके ज़िम्बाब्वे डॉलर पर आधिकारिक रूप से रोक लगा दी गई.
जब कोई सरकार ऐसा करती है तो वो ब्याज दर के निर्धारण और स्थानीय मुद्रा की छपाई करने के अपने अधिकार को छोड़ देती है.
नई मुद्रा प्रणाली
यानी इस स्थिति में सरकार नकद की छपाई कर सार्वजनिक व्यय नहीं कर सकती. इसका मतलब यह है कि सरकार को अपने खर्चों में कटौती करनी पड़ती है और राजस्व के लिए अन्य स्रोतों की तलाश करनी पड़ती है.
2009 में इस नीति को लागू करने के बाद इसने बहुत हद तक गिरती अर्थव्यवस्था को संभाल लिया और इसके बाद 2016 में सरकार ने नई मुद्रा प्रणाली की शुरुआत की.
इसके दो भाग थेः एक बॉन्ड नोट का नकद के रूप में तो दूसरे का इलेक्ट्रॉनिक कारोबार में इस्तेमाल किया जा सकता था.
इस व्यवस्था का लाभ यह हुआ कि अब सरकार बुनियादी और बहुत ज़रूरी विकास कार्यों के लिए मुद्रा की छपाई कर सकती थी.
लेकिन यह भी एक समस्या थी. बाद की सरकारों ने इन पैसों का उपयोग ज़रूरत से ज़्यादा कर दिया जो बाद में मुद्रास्फीति और इसके अवमूल्यन का एक अहम कारण बनी.
ज़िम्बाब्वे के स्वतंत्र अर्थशास्त्री डुमिसानी सिबांदा कहते हैं कि यह नवंबर 2017 में यहां कि सत्ता पर सेना के नियंत्रण के बाद से बढ़ा है.
आधिकारिक रूप से अमरीकी डॉलर के समान दर पर आंकी जाने वाली स्थानीय मुद्रा की व्यावहारिक कीमत बहुत कम है और इसका अवमूल्यन हो रहा है.
लिहाजा लोग हार्ड करेंसी की तरफ ज़्यादा आकर्षित हो रहे हैं और जिनके पास ये हार्ड करेंसी उपलब्ध हैं, वो उसे अपने पास बनाए रखना चाहेंगे.
जॉह्न हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी में हाइपर इन्फ्लेशन के माहिर एप्लाइड इकोनॉमी के प्रोफ़ेसर स्टीव हैंक कहते हैं, "यदि एक के बदले एक की कीमत मिलती रहेगी तो 'ग्रेशम का नियम' लागू होगा. जिसके मुताबिक यदि ख़राब मुद्रा मात्रा में कम नहीं है, तो वह अच्छी मुद्रा को चलन से बाहर कर देती है."
हाइपर इन्फ्लेशन ऐसी स्थिति को कहते हैं जिसमें महंगाई की दर काफी ऊंचे स्तर पर चली जाती है.
अब यह सब ईंधन की कीमतों को कैसे प्रभावित करता है?
अमरीकी डॉलर के बराबर स्थानीय मुद्रा की कीमतें बनाए रखने के सरकारी प्रयास की वजह से ईंधन की काला बाज़ारी और इसका व्यापार करने वालों को व्यापक प्रोत्साहन मिला है.
गंभीर ईंधन संकट इसका परिणाम है. मुद्रा की जमाखोरी के कारण हार्ड करेंसी की कमी हो गई. इससे बाज़ार की मांग की पूर्ति के लिए सरकार की ईंधन आयात की क्षमता बाधित हुई है.
सरकार ने ईंधन की कीमतों को बढ़ाने का फ़ैसला इसलिए किया ताकि इससे तेल की मांग पर अंकुश लगे साथ ही काला बाज़ारी भी रुके.
लेकिन इसका व्यापक विरोध हो रहा है, लोग सड़कों पर उतर आए हैं और सरकार से फ़ैसले को वापस लेने की मांग कर रहे हैं.
पूरे देश में इस हताश आर्थिक माहौल में अपने बने रहने की संघर्ष में लगे कारोबारियों को उनकी लागत में बहुत भारी वृद्धि का सामना करना पड़ रहा है.
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