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लोकसभा चुनाव 2019: देश मनमोहन के हाथों में सुरक्षित था या मोदी के
- Author, समीहा नेत्तीकरा
- पदनाम, बीबीसी रियलिटी चेक
भारत में 11 अप्रैल से आम चुनाव शुरू हो रहे हैं. ऐसे में प्रमुख राजनीतिक दलों के बीच इस बात पर खींचतान शुरू हो चुकी है कि किसके शासन में देश सुरक्षित रहेगा?
पिछली सरकार का नेतृत्व करने वाली विपक्षी कांग्रेस पार्टी का कहना है कि मौजूदा बीजेपी सरकार में चरमपंथी हमलों में 260% की बढ़ोत्तरी हुई है जबकि सीमा पार से घुसपैठ के मामले दोगुने हो चुके हैं.
कांग्रेस का ये भी कहना है कि मौजूदा शासन की तुलना में उनकी सरकार के समय में चार गुना ज़्यादा आतंकवादी मारे गए थे. चुनावी अभियान के समय बीबीसी रियलिटी चेक विभिन्न राजनीतिक दलों के दावे और वादों की पड़ताल कर रही है.
भारत सरकार अपनी आंतरिक सुरक्षा को चार कैटेगरी में रखती है-
- भारत प्रशासित कश्मीर में हुई घटना
- उत्तर पूर्व के राज्यों में चरमपंथ
- विभिन्न इलाक़ों में वामपंथी चरमपंथ
- देश के किसी भी हिस्से में आतंकवादी हमला
कांग्रेस पार्टी जो आंकड़े दे रही है उससे ज़ाहिर होता है कि यह केवल भारत प्रशासित कश्मीर क्षेत्र में सच हो सकता है, पूरे देश में नहीं. ऐसे में, सबसे पहले हम भारत प्रशासित कश्मीर के बारे में उपलब्ध जानकारी को ही देखते हैं.
1980 के दशक से ही कश्मीर में भारतीय सेना के जवानों को कश्मीर में सशस्त्र चरमपंथियों का सामना करना पड़ रहा है.
भारत और पाकिस्तान दोनों मुस्लिम बहुल कश्मीर पर अपना दावा जताते हैं लेकिन दोनों देश इसके एक-एक हिस्से पर नियंत्रण रखते हैं.
दोनों देशों के बीच फरवरी महीने में तनाव तब बढ़ गया था जब भारत ने कथित रूप से पाकिस्तान की सीमा में स्थित चरमपंथी कैंपों पर एयर स्ट्राइक की और पाकिस्तान ने इसका जवाब देने की कोशिश की.
भारत सरकार के आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि भारत प्रशासित कश्मीर में 2013 तक चरमपंथी हिंसा के मामले लगातार कम हो रहे थे, लेकिन बीते कुछ सालों में इसमें बढ़ोत्तरी देखने को मिली है.
भारतीय गृह मंत्रालय के मुताबिक, भारत प्रशासित कश्मीर में 2013 में 170 चरमपंथ से जुड़ी घटनाएं हुई थीं जो 2018 में बढ़कर 614 हो गईं- यह 260% की बढ़ोत्तरी है.
यानी कांग्रेस पार्टी जो कह रही है, हक़ीक़त उससे मेल खाती है.
हालांकि, अगर आप मौजूदा बीजेपी सरकार और पिछली कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार को थोड़े विस्तृत संदर्भ में देखें तो चरमपंथी गतिविधियों में एक तरह से समानता देखने को मिलती है.
2009- 2013 के बीच ऐसी 1717 घटनाएं हुईं थीं जबकि 2014 से 2018 के बीच 1708 घटनाएं हुई हैं, जो कि पिछली सरकार के समय से कम हैं.
जहां तक कांग्रेस का दावा है कि मौजूदा बीजेपी सरकार की तुलना में कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के दौरान बड़ी संख्या में चरमपंथी मारे गए थे, तो आंकड़े इसकी भी तस्दीक करते हैं.
दक्षिण एशियाई चरमपंथी पोर्टल (एसएटीपी) एक स्वतंत्र और गैर सरकारी समूह है, जो सरकारी स्रोतों और मीडिया रिपोर्ट्स से आंकड़े एकत्रित करता है.
ऐसा मालूम होता है कि कांग्रेस ने इसी स्रोत से ये आंकड़े लिए हैं जो बताते हैं कि कांग्रेस के शासन काल में बीजेपी के शासन काल की तुलना में चार गुना चरमपंथी मारे गए थे.
गृह मंत्रालय की ओर से प्रकाशित सरकार के आधिकारिक आकंड़ों भी ऐसा ही पैटर्न बताते हैं लेकिन वहां संख्या कम ज़रूर है.
हालांकि, यह देखना महत्वपूर्ण है कि कांग्रेस नेतृत्व वाली सरकार के दो कार्यकालों की तुलना बीजेपी के एक कार्यकाल वाली सरकार से की जा रही है.
ऐसे में कांग्रेस का दावा पूरी तरह से ग़लत साबित होता है.
अगर आप मौजूदा बीजेपी सरकार के आंकड़ों की तुलना कांग्रेस नेतृत्व वाली सरकार के दूसरे कार्यकाल (2009 से 2014) तक करें तो आपको मालूम होगा कि बीजेपी सरकार के दौरान ज़्यादा चरमपंथी मारे गए हैं.
घुसपैठ की कोशिश
भारत अपने यहां होने वाली घुसपैठ की कोशिशों की भी निगरानी करता है. जब किसी चरमपंथी समूह का कोई व्यक्ति भारत प्रशासित कश्मीर में घुसने की कोशिश करता है तो उसे घुसपैठ की घटना कहते हैं.
विपक्षी कांग्रेस पार्टी का कहना है कि बीजेपी सरकार के दौरान घुसपैठ की कोशिश दोगुनी हो गई है.
आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक 2011 से 2014 के बीच हर साल नियंत्रण रेखा को पार करने की करीब 250 कोशिशें हुई. 2016 के बाद से इनकी संख्या बढ़ी है. हालांकि, कई कोशिशों को नाकाम भी किया गया है.
भारत के दूसरे हिस्सों का हाल?
उत्तर-पूर्वी राज्यों में दशकों से नस्लीय और अलगाववादी संघर्ष चल रहा है, जिसमें कुछ लोगों का समूह स्वायत्तता चाहता है तो कुछ लोग पूरी तरह से आज़ादी चाहते हैं.
2012 को अपवाद मान लें तो इलाके में हिंसक घटनाओं में कमी ही आई है. आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक़ 2015 के बाद से आम नागरिक और सशस्त्र जवानों की मौत में भी कमी आई है.
गृह मंत्रालय के मुताबिक 1997 से लेकर अब तक में सबसे कम हिंसक घटनाएं, 2017 में हुई हैं.
जहां तक माओवादी विद्रोहियों की बात है, तो वो कई पूर्वी और मध्य राज्यों में सक्रिय हैं. वे साम्यवादी शासन और आदिवासी-ग़रीब लोगों के लिए ज़्यादा अधिकार के नाम पर संघर्ष कर रहे हैं.
लेकिन, बीजेपी का कहना है कि हाल के सालों में वामपंथी चरमपंथी हिंसा कम हुई है. बीजेपी के मुताबिक 2014 से 2017 के बीच 3,380 माओवादियों ने आत्मसमर्पण किया है. इस आंकड़े का ज़िक्र नरेंद्र मोदी ने बीते साल अपने एक इंटरव्यू में किया था.
दक्षिण एशियाई चरमपंथी पोर्टल में सरकारी और स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर आंकड़ा 4,000 से ज़्यादा पहुंचता है.
संसद में आधिकारिक बयान में कहा गया है कि 2014 से मध्य नवंबर, 2018 तक 3,386 कैडरों ने आत्मसमर्पण किया है.
वामपंथी हिंसक घटनाओं में 2014 के बाद से लगातार कमी देखने को मिली है. लेकिन गृह मंत्रालय का ख़ुद ही कहना है कि ये ट्रेंड 2011 से शुरू हुआ था जब कांग्रेस पार्टी सत्त्ता में थी.
ज़ाहिर है कि भारत प्रशासित कश्मीर में आतंकी घटनाएं बीते कुछ सालों में बढ़ी हैं लेकिन ऊत्तरी पूर्व में अलगाववादी और देश के दूसरे हिस्सों में वामपंथी हिंसा में कमी हुई है.
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