देहरादून में स्कूली बच्चे की पीट-पीटकर हत्या मामले की लीपापोती, कौन ज़िम्मेदार: ग्राउंड रिपोर्ट

बच्चा, उत्तराखंड
    • Author, दिनेश उप्रेती
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, रानीपोखरी के भोग गांव से

'एक ही बेटा था मेरा, उसे जान से मार दिया. अब मैनेजर मुझे धमकी दे रहा है.' उत्तराखंड राज्य बाल संरक्षण आयोग की अध्यक्ष ऊषा नेगी के दफ्तर में इंसाफ़ के लिए गिड़गिड़ा रहा ये शख्स सातवीं में पढ़ रहे वासु के पिता झपटू यादव हैं.

12 साल के वासु की 10 मार्च को कथित तौर पर उसके ही स्कूल के दो सीनियर्स ने पीट-पीटकर हत्या कर दी थी.

वासु छुट्टियों में अपने माता-पिता के पास जाने को लेकर बेहद खुश था. बस उसके दो ही पेपर बचे थे. 11 मार्च को गणित का पर्चा होना था और उसके बाद 15 मार्च को विज्ञान का. उसकी दो बहनें भी इसी स्कूल में नौवीं और 11वीं क्लास में पढ़ रही थी.

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इमेज कैप्शन, वासु के पिता झपटू यादव.

लेकिन परीक्षा से कुछ ही घंटों पहले वासु के साथ वो हुआ, जो किसी ने सोचा भी न होगा. बेहद गंभीर हालत में उसे जौलीग्रांट स्थित हिमालयन अस्पताल ले जाया गया, जहाँ तकरीबन एक घंटे तक कोशिशें करने के बाद डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया.

वासु की सबसे बड़ी बहन भी इसी स्कूल में पढ़ती थी, इसलिए पलटू को यकीन था उनका बेटा और बेटियां स्कूल में सुरक्षित हैं.

पलटू उत्तर प्रदेश के हापुड़ में रहते हैं और कुष्ठरोग से पीड़ित हैं. उन्होंने अपने सभी बच्चों को इस संस्था में पढ़ने के लिए भेजा था, जो कुष्ठरोगियों के बच्चों को पढ़ाने और रहने-खाने का मुफ्त में इंतज़ाम करती है.

लेकिन बेटे की नृशंष हत्या ने पलटू और उनके परिवार को बुरी तरह तोड़ दिया है और उन्होंने अपनी दोनों बेटियों को इस स्कूल से निकाल दिया है.

'वासु पढ़ने में औसत था. बहुत ब्राइट स्टूडेंट नहीं था वो. लेकिन चीयरफ़ुल ब्वॉय था. एकदम फ्रेंडली'. वासु के बारे में ये शब्द उसकी वाइस प्रिंसिपल माया बहादुर के हैं.

उन्होंने बताया, ''मेरे पास तो कभी कोई शिकायत नहीं आई कि वासु ने किसी के साथ मारपीट की हो. यहाँ तक कि छोटे-मोटे झगड़े की कंप्लेंट भी नहीं मिली.''

वासु के क्लास टीचर अमित पाल कहते हैं, ''वॉलीबॉल, क्रिकेट में बहुत अच्छा था वासु. पढ़ने में बहुत तेज़ नहीं था, लेकिन कभी ऐसा नहीं हुआ कि उसे बहुत तेज़ डांटने की नौबत आई हो.''

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इमेज कैप्शन, देहरादून का स्कूल जिसमें वासु पढ़ता था.

तो फिर 10 मार्च को ऐसा क्या हुआ कि कथित तौर पर दो सीनियर छात्र वासु से इस कदर नाराज़ हुए कि उन्होंने उसकी इतनी पिटाई कर दी कि उसकी मौत हो गई.

पुलिस ने अब तक जो जाँच की उसमें उसका दावा है कि अभियुक्त छात्र इस बात से नाराज़ थे कि वासु ने दुकान से बिस्कुट चुराया, जिस वजह से स्कूल मैनेजर से सारे छात्रों को डाँट पड़ी और उन्हें यहाँ तक चेतावनी भी मिली कि अब उनका हॉस्टल से बाहर जाने पर रोक लग सकती है.

बीबीसी की इस मामले की पूरी पड़ताल से पहले ये जान लेते हैं कि इस मामले में पुलिस और छात्रावास प्रबंधन का क्या कहना है.

छात्रावास प्रबंधन का क्या कहना है

बच्चों की परीक्षाएं चल रही थी. 10 मार्च को रविवार के कारण स्कूल बंद था. शाम को जब छात्रावास में रह रहे बच्चों को जब स्टडी हॉल में पढ़ने के लिए बिठाया गया तो वासु टेबल पर सिर रखकर बैठा था. वॉर्डन अजय कुमार ने जब वासु से पूछा तो वो कुछ नहीं बोला.

उसकी बगल में बैठे अनीस ने बताया कि वासु की तबीयत ठीक नहीं है. वॉर्डन ने बच्चों की मदद से उसे उठाया तो उसने उल्टियां की. वासु को छात्रावास से कोई 20 किलोमीटर दूर जौलीग्रांट अस्पताल ले जाया गया और साथ ही हापुड़ में रह रहे उसके पिता को भी वासु की हालत के बारे में जानकारी दी गई.

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शाम को सात-सवा सात बजे के करीब वासु को जौलीग्रांट अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में भर्ती कराया गया. इलाज़ कर रहे डॉक्टर ने बताया कि वासु का गला चोक हो गया है और उसे सांस लेने में दिक्कत आ रही है. करीब 8 बजकर 25 मिनट पर डॉक्टरों ने वासु को मृत घोषित कर दिया.

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वासु के पिता झपटू यादव, उनकी पत्नी, सबसे बड़ी बेटी और वासु की नानी रात तकरीबन एक बजे अस्पताल पहुँचे. इस बीच, अस्पताल ने पुलिस को इस मामले की सूचना दी और पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए ऋषिकेश स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान यानी एम्स भिजवा दिया. वासु के पिता शव के साथ एम्स पहुँचे.

वहाँ पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टरों ने शायद झपटू से आशंका जताई कि वासु की मौत बहुत अधिक पिटाई से हुई है. झपटू वासु का शव लेकर जब स्कूल पहुँचे तो उन्होंने आरोप लगाया कि उनके बेटे की हत्या हुई है और उन्होंने छात्रावास प्रबंधन से हत्यारों को उनके हवाले करने की बात कही

तब तक छात्रावास प्रबंधन को पिटाई के बारे में पता नहीं था. वॉर्डन अजय ने भी कोई जानकारी होने से इनकार किया. वासु के पिता और अन्य रिश्तेदारों को समझाने-बुझाने के बाद वे वासु का अंतिम संस्कार ईसाई रीति रिवाज़ से स्कूल परिसर में ही स्थित कब्रिस्तान में ही करने को राज़ी हो गए.

पुलिस क्या कहती है

11 मार्च की सुबह साढ़े आठ बजे हिमालयन अस्पताल जौलीग्रांट से वासु का डेथ मैमो मिलने के बाद पुलिस ने अपनी कार्रवाई शुरू की. वासु के पिता की मौजूदगी में ही पोस्टमॉर्टम की कार्यवाही की गई. उपचार करने वाले डॉक्टर की रिपोर्ट में वासु में निमोनिया, सांस की नली में कोई पदार्थ अटकने, सांस रुक जाने और किसी ज़हरीली वस्तु के प्राथमिक लक्षण पाए गए थे.

14 मार्च को मृतक छात्र के पिता ने हत्या की आशंका जताते हुए स्कूल प्रबंधन, वार्डन और अन्य के ख़िलाफ़ एक तहरीर दी. 23 मार्च को एम्स से पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट मिली, जिसमें पाया गया कि वासु की मौत अंदरूनी चोट और आंतरिक रक्तस्राव से हुई. इसके बाद झपटू यादव की तहरीर पर एफ़आईआर दर्ज की गई और वॉर्डन अशोक और सहायक प्रबंधक प्रवीण मैसी को नामजद किया गया.

तहक़ीक़ात में पता चला कि 10 मार्च को छात्रावास से स्कूल परिसर में स्थित चर्च जाने के दौरान रास्ते की एक किराने की दुकान से बिस्कुट का पैकेट चुराने का प्रयास किए जाने की घटना हुई थी. दुकानदार लेखपाल सिंह रावत ने तुरंत स्कूल जाकर इसकी शिकायत प्रवीण मैसी से की थी. क्योंकि दुकानदार सीधे-सीधे वासु को नहीं पहचान सका था, इसलिए उसने कहा कि जो बच्चा बिस्किट चुरा रहा था, उसने दुकान से दो रुपये का हेयरबैंड भी ख़रीदा था. तलाशी में ये हेयरबैंड वासु की जेब से निकला, जिस पर प्रबंधक ने उसे खूब डांटा था.

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इसके बाद प्रवीण ने ऐसी घटना दोबारा नहीं होने का दुकानदार को आश्वासन दिया और छात्रों को बुरी तरह फटकारा था. साथ ही मौखिक रूप से चेतावनी भी दी थी कि अगर वो नहीं सुधरे तो उन्हें (बच्चों को) छात्रावास से बाहर नहीं जाने दिया जाएगा और किसी स्कूली कर्मचारी की मौजूदगी में ही वे छात्रावास से स्कूल जा सकेंगे.

बाद में छात्रावास के बच्चों से पूछताछ में पता चला कि 12वीं क्लास में पढ़ने वाले दो छात्रों शुभांकर ( पुत्र- गंगाधर, 19 साल, देहरादून) और लक्ष्मण राय ( पुत्र-मदन राय, 19 साल, भटिंडा पंजाब) ने वासु की पहले उसके कमरे में पिटाई की और फिर उसे दो मंजिला छात्रावास की छत पर ले जाकर बैट और विकेट से बुरी तरह पीटा. बाद में इन्हीं लड़कों ने वासु को कुरकुरे और बिस्किट भी खिलाए और उसे ठंडे पानी से नहलाया.

पुलिस ने बैट छात्रावास परिसर में ही रह रहे पीटीआई अशोक सोलोमन के बैड के नीचे से बरामद किया, जबकि अधजला विकेट कूड़ा जलाने वाले स्थान पर मिला. पुलिस ने इस मामले में दोनों छात्रों और पीटीआई अशोक सोलोमन, प्रवीण मैसी और वार्डन अजय को लापरवाही बरतने और जानबूझकर चीजों को छिपाने के आरोप में गिरफ्तार कर जेल भेज दिया.

बीबीसी की पड़ताल और उठते सवाल?

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून से तकरीबन 35 किलोमीटर दूर रानी पोखरी थाने के तहत भोगपुर गांव में होम अकेडमी के नाम से एक स्कूल है. ये स्कूल 1974 से संचालित हो रहा है. इसी स्कूल को चलाने वाली संस्था चिल्ड्रन होम सोसाइटी को अमरीका के मूल निवासी डॉक्टर जोन्सी टेलर ने 1945 में खोला था. स्कूल मुख्य सड़क से काफ़ी अंदर है, और इससे दो किलोमीटर दूर राजाजी नेशनल पार्क का घना जंगल शुरू हो जाता है.

स्कूल के साथ-साथ संस्था एक छात्रावास भी चलाती है जिसमें देशभर के कुष्ठरोगियों के बच्चों की निशुल्क देखभाल की जाती है और उन्हें संस्था के स्कूल यानी होम अकेडमी में पढ़ाया जाता है. छात्रों के लिए दो मंजिला हॉस्टल स्कूल से करीब डेढ़ किलोमीटर दूर है, जबकि क्लास 6 से 12वीं तक की बच्चियों के लिए छात्रावास स्कूल परिसर में ही है. 10 मार्च को लड़कों के हॉस्टल में वासु समेत 43 बच्चे रह रहे थे, जबकि गर्ल्स हॉस्टल में 26 लड़कियां.

स्कूल में आसपास के गांवों के बच्चे भी पढते हैं और कुल मिलाकर अभी स्कूल में छात्रों की संख्या 448 है, जिसमें से 222 छात्राएं और 226 छात्र हैं. स्कूल प्रबंधन का कहना है कि कुष्ठरोगियों के बच्चों के लिए छात्रावास निशुल्क है, लेकिन स्कूली फ़ीस 200 रुपये महीना रखी गई है. अगर कोई बच्चा इस फ़ीस को भी दे पाने में अक्षम है तो संस्था ये ख़र्च उठाती है.

स्कूल में कुल मिलाकर 30 कर्मचारी हैं, जिनमें से 22 अध्यापक/अध्यापिकाएं हैं. जबकि छात्रावास को संभालने के लिए एक वार्डन नियुक्त किया गया है, गेट पर गार्ड और स्कूल पीटीआई भी स्कूल परिसर में ही रहते हैं. इसके अलावा मैस में काम करने वाले कुछ कर्मचारी.

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इमेज कैप्शन, किराने की दुकान

छात्रावास दो मंजिला है और इसके आसपास खेत हैं और लगभग 200 मीटर दूर तक कोई दूसरी इमारत नहीं है. पुलिस की थ्योरी कहती है कि पहले बच्चे की कमरे में पिटाई हुई और फिर इसके बाद उसे छत पर ले जाया गया. जहाँ उसकी बैट और डंडे से फिर पिटाई की गई. तो क्या उसके चिल्लाने की आवाज़ किसी ने नहीं सुनी.

इस मामले की जाँच कर रहे रानी पोखरी थाना प्रभारी पीडी भट्ट कहते हैं, ''किसी बच्चे ने कुछ नहीं बताया. छात्रावास प्रबंधन तो यही कह रहा है. हमने बच्चों से अलग-अलग पूछताछ की. बाद में बच्चों ने बताया कि वासु की पिटाई हुई थी. वो ये बात किसी को न बताए, इसलिए अभियुक्तों ने उसे कुरकुरे और बिस्कुट खिलाए और उसे नहलाया भी.''

लेकिन वासु को मारने के पीछे का मोटिव क्या था? क्या वाकई ये अभियुक्त इस बात से परेशान हो गए थे कि वासु की वजह से छात्रावास से उनके निकलने पर पाबंदी लग सकती है?

इस सवाल के जवाब में पुलिस और छात्रावास प्रबंधन के बयान अलग हैं. थाना प्रभारी भट्ट कहते हैं, "पहले तो वो साफ़ मुकर रहे थे कि उन्होंने कुछ नहीं किया. हमने खूब पूछताछ की तब अभियुक्तों ने यही कबूल किया. वो चश्मदीद भी मौजूद हैं, जिन्होंने वासु की पिटाई होते हुए देखी थी."

छात्रावास प्रबंधक केलेब राम इस बात से इनकार करते हैं कि छात्रों को छात्रावास से बाहर नहीं निकलने की कोई चेतावनी दी गई थी. केलेब कहते हैं, "वार्डन अजय कुमार ने तो हमें ऐसा कुछ नहीं बताया. न ही प्रवीण मैसी ने दुकानदार की शिकायत पर ऐसी कोई चेतावनी देने की बात बताई."

दुकानदार लेखपाल रावत बताते हैं, "मैं तो अपनी शिकायत कहकर चला आया. इस तरह की चेतावनी की कोई बात तो मेरे सामने नहीं हुई."

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छात्रावास प्रबंधन भी कुछ बातों पर लार-लपेट करता हुआ नज़र आया. हमने जब छात्रावास प्रबंधक केलेब राम और बिज़नेस प्रबंधक संतोष कुमार से ये पूछा कि वासु के पिता के ये इल्ज़ाम लगाने के बाद कि उनके बेटे की हत्या हुई है, उन्होंने वार्डन अजय कुमार के ख़िलाफ़ क्या कोई कार्रवाई की. दोनों के पास इसका कोई जवाब नहीं था.

कार्रवाई के लिए वक़्त भी बहुत कम नहीं था. 11 मार्च को वासु के पिता ने हत्या की आशंका जताई थी और 23 मार्च तक (पोस्टमॉर्टम की रिपोर्ट आने तक) अजय को एक मैमो तक जारी नहीं किया गया और वो ही वॉर्डन बने रहे.

स्कूल के ख़िलाफ़ रोज अलग-अलग तरह की ख़बरें छपने से स्कूल के स्टाफ़ में गुस्सा भी है. दो साल से इस स्कूल में वाइस प्रिसिंपल माया बहादुर कहती हैं, "अब कोई कह रहा है कि स्कूल में कुछ साल पहले एक लड़की के साथ रेप हुआ, कोई कुछ कह रहा है और कोई कुछ....मैं तो इसी स्कूल में पढ़ी हूँ और अब यहीं पढ़ा भी रही हूँ. कभी कुछ ऐसा हुआ ही नहीं."

वो कहती हैं, "ऐसा नहीं करना चाहिए. वासु का मामला संस्था के छात्रावास से जुड़ा है और स्कूल से इसका कोई लेना-देना नहीं है. फिर भी मीडिया में स्कूल के नाम पर अनाप-शनाप छापा जा रहा है."

तो क्या इस घटना से उनके स्कूल में एडमिशन पर कोई असर पड़ा है. माया कहती हैं, "मुझे तो नहीं लगता. पिछले साल 35 नए एडमिशन हुए थे. इस साल अभी तक 23 नए रजिस्ट्रेशन हो चुके हैं और 11वीं में अभी एडमिशन की प्रक्रिया शुरू नहीं हुई है, दसवीं का रिजल्ट आने के बाद ही होगी."

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