भारत: सिज़ेरियन डिलीवरी बढ़ने की क्या है वजह

सीज़ेरियन डिलीवरी
इमेज कैप्शन, रोमा दुआ
    • Author, गुरप्रीत सैनी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

41 साल की साक्षी अपने पहले बच्चे को जन्म देने वाली हैं. डॉक्टर ने उन्हें 10 अप्रैल की डिलीवरी डेट दी है. लेकिन वो चाहती हैं कि उनका बच्चा 13 तारीख को पैदा हो. ऐसा इसलिए क्योंकि एक पंडित ने उनके बच्चे के जन्म का मुहूर्त 13 तारीख का निकाला है.

साक्षी ने अपनी डॉक्टर को कह दिया है कि वो डिलीवरी मुहूर्त के हिसाब से ही करवाना चाहती हैं और वो इसके लिए सिज़ेरियन डिलीवरी कराने को तैयार हैं.

वहीं 28 साल की रोमा ने तो पक्का फैसला कर लिया है कि वो ऑपरेशन से ही डिलीवरी ही कराएंगी, क्योंकि वो नॉर्मल डिलीवरी के दर्द से नहीं गुज़रना चाहतीं.

स्री रोग विशेषज्ञ डॉ रेणु मलिक का कहना है कि आजकल साक्षी और रोमा जैसी कई महिलाएं हैं, जो नॉर्मल डिलीवरी के बजाए सिज़ेरियन डिलीवरी अपनी मर्ज़ी से कराती हैं. जबकि कई बार मेडिकली सिज़ेरियन की ज़रूरत ही नहीं होती.

जामा नेटवर्क ओपन की एक स्टडी में सामने आया है कि भारत में अमीर तबकों में ज़रूरत से ज़्यादा सिज़ेरियन डिलीवरियां हो रही हैं, जबकि गरीब तबके में कई ज़रूरतमंदों को ऑपरेशन की सुविधा तक नहीं मिल पाती.

वीडियो कैप्शन, भारत में क्यों बढ़ रहे हैं सिज़ेरियन डिलीवरी के मामले?

दस साल में सिज़ेरियन डिलीवरी के मामले दोगुने

नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे -4 के मुताबिक पिछले दस साल में भारत में सिज़ेरियन डिलीवरी की दर दोगुनी हो गई है. एनएफएचएस - 4 के आंकड़ों के आधार पर जामा नेटवर्क ओपन ने एक स्टडी की है.

15 से 49 साल की करीब सात लाख युवतियों और महिलाओं पर ये स्टडी की गई है. इस स्टडी में पाया गया कि 2010 से 2016 तक भारत में सिज़ेरियन डिलीवरी की दर 17.2% थी. जबकि 1988 से 1993 तक भारत में सिज़ेरियन डिलीवरी की दर 2.9% ही थी.

इस अध्ययन में भारत के 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 640 ज़िलों की महिलाओं ने हिस्सा लिया था. स्टडी में पाया गया कि गर्भवती महिलाओं को नॉर्मल डिलीवरी होगी या सिज़ेरियन डिलीवरी ये इस बात पर भी निर्भर होता है कि महिला किस आर्थिक स्थिति कैसी है.

अमीर तबके में बहुत ज़्यादा सिज़ेरियन डिलीवरी हो रही है, जबकि गरीब तबके की महिलाओं को सिज़ेरियन डिलीवरियां कम हो रही हैं. ये फासला 4.4% से लेकर 35.9% तक का हो सकता है.

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सिज़ेरियन डिलीवरी की वजहें

भारत में सिज़ेरियन डिलीवरियां बढ़ने की कई वजहें हैं. डॉ रेणु मलिक कहती हैं, "कई महिलाएं दर्द सहन नहीं करना चाहती. कई डरती हैं. आजकल लोग सिर्फ़ एक या दो बच्चे चाहते हैं. इसलिए वो डिलीवरी में रिस्क नहीं लेना चाहतीं . कुछ लोग चाहते हैं कि बच्चे का जन्म किसी खास दिन या वक्त पर हो. बहुत से मेडिकल कारण भी होते हैं. आजकल शादियां लेट होती हैं. कई महिलाएं 30 की उम्र के बाद मां बन रही हैं. ऐसे में कॉम्पलिकेश बढ़ने का ख़तरा भी रहता है. हाइपर टेंशन और डाइबिटीज़ जैसी बीमारियां आम हैं. लाइफस्टाइल एक बड़ा कारण है सिज़ेरियन डिलीवरी का. मोटापा बढ़ रहा है. महिलाएं एक्सरसाइज़ नहीं करतीं."

आम धारणा है कि अस्पतालों और डॉक्टरों पर भी आरोप लगते हैं कि वो पैसा बनाने के लिए और वक़्त बचाने के लिए नॉर्मल डिलीवरी के बजाए सिज़ेरियन डिलीवरी ज़्यादा करते हैं.

लेकिन डॉ रेणु मलिक इससे इत्तेफ़ाक नहीं रखतीं. उनका कहना है कि कई जगह नार्मल डिलीवरी और सिज़ेरियन डिलीवरी की फीस लगभग एक जैसी कर दी गई है, ताकि लोगों को ये मंहगा ना लगे.

डॉ रेणु के मुताबिक, "नॉर्मल डिलीवरी में दर्द को कम करने के लिए एपिडुरियल एनस्थीसिया भी दिया जाने लगा है. इससे महिला को प्रसवपीड़ा तो होती है, लेकिन उसे पता नहीं चलता."

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स्टडी के मुताबिक उत्तर भारत के बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे ज़्यादा आबादी वाले राज्यों में अब भी 30% से ज़्यादा बच्चे घर पर पैदा होते हैं. वहीं दक्षिण भारत के सभी राज्यों और महाराष्ट्र, पंजाब जैसे आर्थिक रूप से बेहतर राज्यों में 90% से ज़्यादा बच्चे अस्पतालों में पैदा होते हैं.

स्टडी के मुताबिक राजस्थान, बिहार और झारखंड जैसे कम विकसित राज्यों में सिज़ेरियन डिलीवरी का रेट 10% से कम है. इनमें भी खासकर पहाड़ी इलाकों या जंगल वाले ज़िलों जैसे उत्तर पूर्व भारत, उत्तराखंड, दक्षिण छत्तीसगढ़ और दक्षिण पश्चिम ओडिशा शामिल हैं. वहीं दिल्ली और दक्षिण भारत के राज्य जैसे तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु में सिज़ेरियन डिलीवरी का रेट 30% से 60% प्रतिशत तक है.

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WHO की गाइडलाइन

विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक सिज़ेरियन डिलीवरी की रेंज 10 से 15% तक रहनी चाहिए. लेकिन भारत में ये इससे ज़्यादा है.

दुनिया में कई देश ऐसे हैं जहां सिज़ेरियन डिलीवरी के मामले बहुत ज़्यादा हैं. नेशनल सेंटर फॉर बॉयोटेक्नोलॉजी इंफोर्मेशन (एनसीबीआई) के 1990 से 2014 के आंकड़ों के मुताबिक लैटिन अमरीका और कैरिबियाई देशों में सबसे ज़्यादा सिज़ेरियन डिलीवरी होती हैं. यहां इसका प्रतिशत 40.5% है.

सिज़ेरियन डिलीवरी की दर उत्तरी अमरीका में 32.3% है जबकि यूरोपीय देशों में ये दर 25% फीसदी है.

भारत के शहरी इलाकों में और मीडिल क्लास लोगों में सिज़ेरियन डिलीवरी ज़रूरत से ज़्यादा हो रही हैं. स्टडी के अंत में कहा गया है कि भारत में गैर ज़रूरी सिज़ेरियन डिलीवरी को रोकने के लिए महिलाओं और हेल्थ केयर प्रोफेशनलों को टारगेट करते हुए पॉलिसी बनाए जाने की ज़रूरत है.

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